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  "title": "बगावत की वो पंक्तियां जिन्हें गाकर सुल्तानपुर के बैजनाथ सिंह चढ़ गए अंग्रेजों की नज़रों में",
  "summary": "1931-32 के दौर में सुल्तानपुर के युवा आंदोलनकारी बैजनाथ सिंह ने बगावत भरी पंक्तियां गाईं, जिनकी कीमत उन्हें ब्रिटिश हुकूमत से मिली सजा के रूप में चुकानी पड़ी।",
  "content": "उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर की मिट्टी में आज़ादी की लड़ाई के कई अनसुने किस्से दबे पड़े हैं। इन्हीं में से एक है बैजनाथ सिंह का, जिनकी कुछ पंक्तियों ने अंग्रेजी हुकूमत को बेचैन कर दिया था और इसकी कीमत उन्हें सजा के तौर पर चुकानी पड़ी। यह 1931-32 का वह दौर था जब इस जिले में क्रांति की लहर तेज हो चुकी थी और देशभक्ति के गीत तथा कविताएं लोगों की ज़ुबान पर चढ़ने लगी थीं। आइए जानते हैं वे कौन सी पंक्तियां थीं।\n\nलगान बंदी आंदोलन ने बदली फिज़ा\nसुल्तानपुर के इतिहासकार और लेखक राजेश्वर सिंह अपनी किताब 'सुल्तानपुर इतिहास की झलक' में लिखते हैं कि साल 1931-32 में जिले में लगान बंदी आंदोलन का गहरा असर था। कांग्रेस की गतिविधियों पर लगाम कसने के लिए अंग्रेजों ने पूरे जिले में धारा 144 लागू कर दी। लेकिन कार्यकर्ता कहां रुकने वाले थे, उन्होंने धारा 144 तोड़कर आंदोलन को आगे बढ़ाया। 9 सितंबर 1931 को जब पंडित जवाहर लाल नेहरू यहां पहुंचे और किसानों से लगान न चुकाने की अपील की, तो इस आंदोलन को एक नई धार मिल गई।\n\nकिसान सभा और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार\nवरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह बताते हैं कि 1931 में सुल्तानपुर में किसान सभा के दो सत्र चले, जिनमें हजारों किसानों ने हिस्सा लिया। इससे पहले विदेशी कपड़ों की होली जलाने और उनके बहिष्कार ने जिले के आंदोलन में जान फूंक दी थी।\n\nबाबू संगमलाल, ठाकुर रामनरेश सिंह, अनन्त बहादुर सिंह, रामहर्ष सिंह, चन्द्रबली पाठक, सुन्दरलाल गुप्त, देवकली दीन शर्मा, विद्याधर बाजपेयी और मो. नाजिम समेत तमाम कांग्रेसजनों के सक्रिय सहयोग से यह आंदोलन और तेज होता गया। विदेशी कपड़ों के बहिष्कार के दौरान कांग्रेसी कार्यकर्ता दुकानों के बाहर पिकेटिंग किया करते थे।\n\nवो पंक्तियां जो बन गईं बगावत की पहचान\nबैजनाथ सिंह अंग्रेजों और सामंतों से लगातार लोहा लेने वाले युवा आंदोलनकारी थे। 1930 के दशक में वे जवान थे। जैसे ही उन्होंने यह गीत गाया, उनका नाम अंग्रेजी हुकूमत की नज़रों में चढ़ गया। उनकी पंक्तियां थीं, \"अगर जालिम हुकूमत को हटाना ही बगावत है तो मैं भी एक बागी हूं मेरा मजहब बगावत है।\" इन्हीं पंक्तियों को गाने की वजह से ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें सजा सुना दी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. बैजनाथ सिंह कौन थे?\nवे सुल्तानपुर के एक युवा आंदोलनकारी थे जो अंग्रेजों और सामंतों से लगातार संघर्ष करते रहे और बगावत भरी पंक्तियां गाने पर उन्हें ब्रिटिश हुकूमत से सजा मिली।\n\n2. वे कौन सी पंक्तियां थीं जिन पर उन्हें सजा हुई?\nउनकी पंक्तियां थीं, 'अगर जालिम हुकूमत को हटाना ही बगावत है तो मैं भी एक बागी हूं मेरा मजहब बगावत है।'\n\n3. यह घटना किस समय की है?\nयह 1931-32 के दौर की है, जब सुल्तानपुर में क्रांतिकारी गतिविधियां तेज हो चुकी थीं।\n\n4. जिले में धारा 144 क्यों लगाई गई थी?\nकांग्रेस की गतिविधियों पर लगाम कसने के लिए अंग्रेजों ने पूरे जिले में धारा 144 लागू कर दी थी, जिसे कार्यकर्ताओं ने तोड़ दिया।\n\n5. जवाहर लाल नेहरू का इस आंदोलन से क्या नाता था?\n9 सितंबर 1931 को नेहरू सुल्तानपुर पहुंचे और किसानों से लगान न चुकाने की अपील की, जिससे आंदोलन को नई दिशा मिली।\n\n6. लगान बंदी आंदोलन क्या था?\nयह किसानों का लगान न चुकाने वाला आंदोलन था, जिसका 1931-32 में सुल्तानपुर जिले में गहरा असर रहा।\n\nप्रेरणा और सबक\n• आवाज़ ही सबसे बड़ा हथियार: बैजनाथ सिंह ने बंदूक नहीं, बल्कि कुछ पंक्तियों के ज़रिए हुकूमत को चुनौती दी, जो दिखाता है कि शब्दों में भी क्रांति की ताकत होती है।\n• डर के आगे डटे रहना: सजा की आशंका के बावजूद उन्होंने अपने विचार नहीं बदले और बगावत की बात कहते रहे।\n• गलत नियमों का विरोध: कार्यकर्ताओं ने धारा 144 तोड़कर दिखाया कि अन्यायपूर्ण कानून के आगे झुकना ज़रूरी नहीं।\n• एकजुटता में दम: हजारों किसानों और तमाम कार्यकर्ताओं के साथ आने से ही आंदोलन को असली ताकत मिली।",
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  "publishedAt": "2026-06-24",
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    "बैजनाथ सिंह",
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    "क्रांतिकारी इतिहास"
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