बहराइच में 14 नवंबर 1883 को स्थापित लाइल लाइब्रेरी का वजूद खतरे में, दीमक और बारिश से अमूल्य ग्रंथ तबाह बहराइच स्थित ऐतिहासिक लाइल लाइब्रेरी देखरेख के अभाव में बेहद खराब स्थिति में पहुंच चुकी है। 14 नवंबर 1883 को स्थापित इस पुस्तकालय की जर्जर इमारत, टपकती छत और दीमक के प्रकोप से दुर्लभ पुस्तकों का अस्तित्व खत्म होने की कगार पर है। उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में स्थित एक अमूल्य ज्ञान केंद्र आज प्रशासनिक अनदेखी और वक्त की मार के कारण अपने वजूद की आखिरी सांसें गिन रहा है। दीवानी कचहरी के समीप पुराने मौसम विभाग परिसर में बनी ऐतिहासिक लाइल लाइब्रेरी की हालत वर्तमान में बेहद चिंतानजक बनी हुई है। कभी देश और दुनिया के साहित्य प्रेमियों तथा शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र रही यह लाइब्रेरी आज स्वयं अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर है। यदि समय रहते इसके संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भारत की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी। लाइब्रेरी का गौरवशाली इतिहास और इसकी स्थापना लाइल लाइब्रेरी की स्थापना 14 नवंबर 1883 को भिनगा के राजा उदय प्रताप सिंह ने की थी। राजा उदय प्रताप सिंह को अध्ययन और दुर्लभ पुस्तकों के संग्रहण का गहरा शौक था। उन्होंने भारत के कोने-कोने से भ्रमण करके अत्यंत दुर्लभ, प्रामाणिक और बेशकीमती ग्रंथों का संकलन किया था और उन्हें इस पुस्तकालय में सहेज कर रखा था। इस ऐतिहासिक अध्ययन केंद्र का निर्माण बेहद भव्य तरीके से किया गया था। इसमें बेहद मजबूत स्तंभ, खूबसूरत लकड़ी की नक्काशीदार अलमारियां और पारदर्शी कांच के दरवाजे लगाए गए थे। उस दौर में इस पुस्तकालय परिसर के अंदर एक साथ 100 से अधिक पाठकों के बैठकर शांतिपूर्वक अध्ययन करने की समुचित व्यवस्था की गई थी। जर्जर भवन और दीमक के प्रकोप से पुस्तकों की बर्बादी समय बीतने के साथ-साथ इस ऐतिहासिक इमारत की ओर ध्यान न दिए जाने के कारण इसकी स्थिति बेहद खतरनाक हो चुकी है। पुस्तकालय का पूरा ढांचा अब जर्जर हो चुका है। बारिश के मौसम में इमारत की छत से लगातार पानी टपकता है, जिससे पूरी लाइब्रेरी में सीलन फैल जाती है। इसके अलावा, भवन की मुख्य दीवारों में जगह-जगह गहरी और चौड़ी दरारें आ चुकी हैं। सबसे अधिक नुकसान लकड़ी के उन नक्काशीदार फर्नीचरों को पहुंचा है जो कभी इस लाइब्रेरी की शोभा बढ़ाते थे। कीमती अलमारियों में दीमकों ने अपना स्थायी डेरा जमा लिया है। इन दीमकों के कारण सैकड़ों साल पुरानी दुर्लभ और अप्रत्याशित किताबें तेजी से नष्ट हो रही हैं। अनेक अति-दुर्लभ ग्रंथ तो पूरी तरह से धूल में बदल चुके हैं और जो कुछ किताबें बची हैं, वे भी समुचित रखरखाव न मिलने से धीरे-धीरे खत्म होने की दिशा में बढ़ रही हैं। पुस्तकालय अध्यक्ष अनीस अहमद का निष्ठावान संघर्ष इस अनमोल साहित्यिक खजाने की रक्षा के लिए पुस्तकालय अध्यक्ष अनीस अहमद पिछले कई दशकों से अकेले ही मोर्चा संभाले हुए हैं। सन 1971 से अपनी पीढ़ियों की विरासत को संभाल रहे अनीस अहमद हर विपरीत परिस्थिति में इन पुस्तकों की सुरक्षा के लिए प्रयासरत हैं। जब मानसून के दौरान छत से पानी टपकना शुरू होता है, तो वे दिन-रात एक करके किताबों को पानी से भीगने से बचाने का प्रयास करते हैं। बारिश थमने के पश्चात, वे सीलन भरी पुस्तकों को सुखाने के उद्देश्य से बाहर धूप में फैलाते हैं। हालांकि, बाहर धूप में रखने पर इन दुर्लभ किताबों को आवारा पशुओं द्वारा फाड़े जाने या नुकसान पहुंचाए जाने का निरंतर खतरा मंडराता रहता है। अपनी जिंदगी के इस पड़ाव पर पहुंचने के बावजूद अनीस अहमद पूरी लगन से काम में जुटे हैं, लेकिन संसाधनों के अभाव और प्रशासनिक सहायता न मिलने के कारण अब उनका हौसला भी टूटने लगा है। तत्काल संरक्षण और जीर्णोद्धार की मांग लाइल लाइब्रेरी के इस गिरते अस्तित्व को बचाने के लिए स्थानीय नागरिकों, बुद्धिजीवियों और साहित्य प्रेमियों द्वारा इसके नवीनीकरण की मांग लगातार बुलंद की जा रही है। लोगों का कहना है कि यदि बहराइच की इस ऐतिहासिक इमारत का जीर्णोद्धार नहीं कराया गया और दीमक रोधी आधुनिक संरक्षण पद्धतियों को नहीं अपनाया गया, तो आने वाली नस्लें इस अनमोल धरोहर का लाभ उठाने से वंचित रह जाएंगी। इस अनूठे ज्ञान केंद्र के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए तत्काल प्रशासनिक संरक्षण, वित्तीय सहायता और वैज्ञानिक पुस्तकालय जीर्णोद्धार की सख्त आवश्यकता है, ताकि ज्ञान की यह सदियों पुरानी धारा आने वाले समय में भी निरंतर बहती रहे। इसका आप पर असर बहराइच की ऐतिहासिक लाइल लाइब्रेरी का जीर्णोद्धार न होने से स्थानीय शोधकर्ताओं, छात्रों और देश की साहित्यिक विरासत को सीधे तौर पर नुकसान पहुंच रहा है। • भारत में: देश भर के इतिहासविदों और साहित्य प्रेमियों के लिए 1883 की दुर्लभ पुस्तकों का संकलन हमेशा के लिए नष्ट होने का खतरा है। यदि इन प्राचीन ग्रंथों का डिजिटलीकरण और संरक्षण नहीं हुआ, तो भारतीय इतिहास से जुड़े कई दुर्लभ शोध आधार खत्म हो जाएंगे। • बहराइच में: स्थानीय छात्रों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं से एक समृद्ध सार्वजनिक अध्ययन स्थल छीन गया है। जीर्णोद्धार होने पर जिले के 100 से अधिक पाठकों को फिर से एक शांत और सुसज्जित लाइब्रेरी का लाभ मिल सकेगा। • बहराइच में: बहराइच जिले की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को भारी क्षति पहुंच रही है। प्रशासन द्वारा तुरंत बजट जारी करने पर ही इस 140 साल से भी पुरानी इमारत को ढहने से बचाया जा सकता है। • भारत में: अन्य राज्यों की पुरानी और उपेक्षित लाइब्रेरी समितियों के लिए भी यह एक चेतावनी है कि दुर्लभ पांडुलिपियों को दीमक से बचाना अनिवार्य है। यदि संरक्षण में देरी हुई, तो देश के अन्य क्षेत्रीय अभिलेखागारों की पुस्तकें भी इसी तरह बर्बाद हो जाएंगी। सवाल-जवाब 1. बहराइच की लाइल लाइब्रेरी की स्थापना कब और किसने की थी? लाइल लाइब्रेरी की स्थापना 14 नवंबर 1883 को भिनगा के राजा उदय प्रताप सिंह द्वारा की गई थी। 2. यह ऐतिहासिक लाइब्रेरी बहराइच में कहां स्थित है? यह पुस्तकालय बहराइच जिले में दीवानी कचहरी के पास स्थित पुराने मौसम विभाग परिसर में बना हुआ है। 3. लाइल लाइब्रेरी की इमारत और किताबों की क्या स्थिति है? इमारत की छत से बारिश का पानी टपकता है, दीवारों में दरारें आ चुकी हैं और दीमकों के कारण कई दुर्लभ किताबें व अलमारियां नष्ट हो रही हैं। 4. पुस्तकालय अध्यक्ष अनीस अहमद कब से इस लाइब्रेरी की देखरेख कर रहे हैं? अनीस अहमद सन 1971 से अपनी पीढ़ियों की विरासत के रूप में इस पुस्तकालय की पुस्तकों की सुरक्षा में जुटे हुए हैं। 5. इस लाइब्रेरी को बचाने के लिए किन मुख्य कदमों की मांग की जा रही है? स्थानीय स्तर पर इमारत की तत्काल मरम्मत, प्रशासनिक संरक्षण और आधुनिक दीमक रोधी पद्धतियों से किताबों के संरक्षण की मांग की जा रही है। https://trendkia.com/culture/bahraich-men-14-navnbara-1883-ko-sthapita-lyle-library-ka-vajuda-khatare-men-dimaka-aura-barisha-se-amulya-grntha-tabaha-22829 TrendKia — Har trend, sabse pehle.