# बस्तर के गोंचा पर्व की अनूठी सौगात: 'मीत' बनकर जीवनभर का साथ निभाने की अद्भुत परंपरा

> छत्तीसगढ़ के बस्तर में मनाए जाने वाले गोंचा पर्व में 'मीत' बनाने की एक बेहद खास परंपरा है, जहां खून का रिश्ता न होने के बावजूद दो लोग भगवान के सामने जीवनभर सुख-दुख में साथ निभाने की कसम खाते हैं।

**Type:** article · **Category:** कल्चर · **Published:** 2026-07-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/culture/bastar-ke-goncha-parva-ki-anuthi-saugata-meet-banakara-jivanabhara-ka-satha-nibhane-ki-adbhuta-parnpara-9022 · **Language:** Hindi
**Tags:** गोंचा पर्व, बस्तर की परंपरा, मीत प्रथा, छत्तीसगढ़ की संस्कृति, भगवान बलदेव

छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाके बस्तर में इन दिनों पारंपरिक गोंचा पर्व पूरे उत्साह और उमंग के साथ मनाया जा रहा है। इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक उत्सव की पहचान केवल पूजा-पाठ और मेलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर कई अनूठी और सदियों पुरानी परंपराओं को समेटे हुए है जो आज भी प्रासंगिक हैं। इनमें सबसे खास, भावुक और चर्चित है 'मीत' बनाने की प्रथा। यह एक ऐसा अद्भुत सामाजिक रिवाज है जहां खून का कोई भी रिश्ता या पारिवारिक बंधन न होने के बावजूद, दो लोग एक-दूसरे के साथ जीवनभर का अटूट बंधन जोड़ लेते हैं। इस अनोखी रस्म में भगवान बलदेव और देवी सुभद्रा को सीधा साक्षी मानकर दो व्यक्ति आपसी सहमति से ताउम्र एक-दूसरे का सुख-दुख साझा करने और हर कदम पर साथ निभाने की कसम खाते हैं।

## सात जन्मों की तरह सात बार आदान-प्रदान की रस्म

मीत बनाने की यह प्रक्रिया पूरी तरह से आध्यात्मिक और गहरे भावनात्मक जुड़ाव वाली होती है। जब दो लोग आपस में यह गहरी मित्रता कायम करने का पक्का फैसला करते हैं, तो वे एक विशेष पारंपरिक रस्म से गुजरते हैं। इसके लिए एक सजी हुई थाली में पवित्र गंगाजल, भगवान का खास महाप्रसाद और एक साबुत नारियल रखा जाता है। इस पावन थाली को दोनों व्यक्तियों के बीच पूरे सात बार विधि-विधान के साथ आदान-प्रदान किया जाता है। हिंदू धर्म में जिस तरह विवाह के सात फेरे होते हैं, उसी तरह सात बार किए जाने वाले इस लेन-देन के बाद, वे एक-दूसरे को खुशी-खुशी गले लगाते हैं। प्रेम, आदर और भाईचारे के इस स्पष्ट प्रतीक स्वरूप गले मिलने के तुरंत बाद दोनों एक-दूसरे को सम्मान के रूप में नए कपड़े भेंट करते हैं। इसके ठीक बाद, वे मंदिर में भगवान के दर्शन कर उनका आशीर्वाद लेते हैं और उसी ऐतिहासिक दिन से वे आधिकारिक रूप से एक-दूसरे के 'मीत' यानी परम मित्र बन जाते हैं। गोंचा पर्व के दौरान ही गजमुख की परंपरा में भी बिल्कुल इसी तरह के कड़े नियमों और रीतियों का पालन किया जाता है।

## एक-दूसरे को अपना दिल सौंपने और सम्मान देने का नाम है मीत

गोंचा पर्व की इसी पावन बेला में बस्तर के निवासी केदारनाथ पांडे और विजय पांडे ने भी इस प्राचीन रस्म को पूरी श्रद्धा के साथ निभाते हुए एक-दूसरे को अपना मीत चुना। दोनों ने पूरे विधि-विधान से एक-दूसरे के साथ ताउम्र मजबूती से खड़े रहने और हर कठिन परिस्थिति में साथ देने का संकल्प लिया। इस रिश्ते की वास्तविक गहराई को समझाते हुए केदारनाथ पांडे ने बताया कि मीत उस विशेष व्यक्ति से ही बांधा जाता है जिससे आपके विचार पूरी तरह मिलते हों, जो आपका कोई पुराना और भरोसेमंद परिचित हो और जिससे आपके आपसी संबंध बेहद मधुर हों। उन्होंने बहुत ही सरल शब्दों में कहा, "मीत का मतलब अपना दिल दूसरे को दे देना है।"

केदारनाथ के अनुसार, इस पवित्र रिश्ते में बंधने के बाद किसी भी तरह का बुरा बर्ताव करने, दूरी बनाने या चुभने वाली तीखी बात करने की सख्त मनाही होती है। यह एक ऐसा आजीवन बंधन है जहां आपको अपना पूरा जीवन अपने मीत के साथ पूरा सामंजस्य बिठाकर जीना होता है। इसमें एक-दूसरे से हमेशा वैचारिक और भावनात्मक रूप से जुड़े रहने और किसी भी सुख या दुख की घड़ी में एक सगे परिवार की तरह ढाल बनकर खड़े रहने की शर्त होती है। इस पवित्र दोस्ती को कभी न तोड़ने की कसम ही समाज में इसे इतना खास और सम्मानजनक बनाती है।

## कृष्ण-सुदामा की तरह अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक

बस्तर की इस मीत परंपरा की जड़ें हमारे भारत के इतिहास और पौराणिक कथाओं से बहुत गहराई से जुड़ी हुई हैं। इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व पर रोशनी डालते हुए विजय पांडे ने बताया कि यह कोई हाल-फिलहाल में शुरू हुई प्रथा नहीं है, बल्कि आदिकाल से लगातार चली आ रही है। उन्होंने इस बेदाग रिश्ते की सीधे तौर पर तुलना भगवान कृष्ण और उनके बाल सखा सुदामा की अमर मित्रता से की। जिस तरह कृष्ण और सुदामा ने बिना किसी निजी स्वार्थ, लालच और ऊंच-नीच के अपना रिश्ता पूरी ईमानदारी से निभाया था, ठीक उसी तरह इस मीत परंपरा के जरिए लोग आज भी जीवनभर उसी आदर्श मित्रता को जीने का प्रयास करते हैं। तीज-त्योहारों के खास मौकों पर मीत बनाने का यह संकल्प लिया जाता है। बस्तर की यह खूबसूरत परंपरा आज के आधुनिक दौर में भी लोगों के बीच आपसी प्रेम, अटूट विश्वास और सामाजिक रिश्तों की मजबूती का सबसे बड़ा और जीवंत उदाहरण बनी हुई है।

## इसका आप पर असर
- **भारत के लोगों के लिए:** यह खबर याद दिलाती है कि हमारी प्राचीन संस्कृति में दोस्ती और सामाजिक बंधनों का कितना गहरा महत्व था, जो आज के अकेलेपन वाले डिजिटल युग में कहीं खोता जा रहा है।
- **छत्तीसगढ़ में:** बस्तर और आसपास के क्षेत्रों के युवाओं को अपनी इस अनूठी विरासत को सहेजने और आपसी भाईचारे को मजबूत करने की प्रेरणा मिलेगी।

## सवाल-जवाब

### 1. गोंचा पर्व मुख्य रूप से कहां मनाया जाता है?
गोंचा पर्व मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर क्षेत्र में बहुत ही धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

### 2. बस्तर में 'मीत' बनाने की परंपरा क्या है?
'मीत' बनाने की परंपरा में दो व्यक्ति बिना किसी खून के रिश्ते के भगवान बलदेव और सुभद्रा के सामने जीवनभर एक-दूसरे का सुख-दुख में साथ देने का संकल्प लेते हैं।

### 3. मीत बनाने की रस्म कैसे पूरी की जाती है?
इस रस्म में पवित्र गंगाजल, महाप्रसाद और नारियल को एक थाली में लेकर दो लोग आपस में 7 बार इसका आदान-प्रदान करते हैं, जिसके बाद वे गले मिलते हैं और एक-दूसरे को नए कपड़े भेंट करते हैं।

### 4. विजय पांडे ने मीत परंपरा की तुलना किससे की है?
विजय पांडे ने मीत परंपरा की तुलना भगवान कृष्ण और उनके बाल सखा सुदामा की ऐतिहासिक, अमर और निःस्वार्थ मित्रता से की है।

### 5. मीत बनने के बाद किन विशेष बातों का ध्यान रखना होता है?
मीत बनने के बाद एक-दूसरे के साथ बिल्कुल परिवार जैसा व्यवहार करना होता है, कोई चुभने वाली बात नहीं कहनी होती और यह दोस्ती किसी भी परिस्थिति में कभी नहीं तोड़नी होती है।

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