बिहार की 74 वर्षीय अंबिका देवी नीम, गुलाब और कालिख से बचा रहीं पारंपरिक मधुबनी पेंटिंग की विरासत मधुबनी की वरिष्ठ कलाकार अंबिका देवी बीते तीन दशकों से बिना रासायनिक रंगों के पूरी तरह प्राकृतिक रंगों से लोककला रच रही हैं और युवाओं को प्रशिक्षित कर रही हैं। बिहार के मधुबनी जिले की पहचान लोक संस्कृति और पारंपरिक कला के लिए पूरी दुनिया में है, और इस विरासत को सहेजने में वरिष्ठ कलाकारों का योगदान सबसे अहम रहा है। इसी कड़ी में 74 साल की कलाकार अंबिका देवी पिछले 30 वर्षों से लगातार मधुबनी पेंटिंग बनाने में जुटी हैं। जीवन के इस पड़ाव पर भी उनका समर्पण और उत्साह पहले की तरह बना हुआ है। वह सिर्फ अपनी कलाकृतियां तैयार करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एक अनुभवी शिक्षिका के तौर पर नई पीढ़ी के युवाओं और बच्चों को भी इस पारंपरिक विधा के सूक्ष्म पहलू सिखा रही हैं। उनके लिए यह काम केवल आजीविका कमाने का साधन नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी साधना और दिली जुनून बन चुका है। फूलों, पत्तियों और कालिख से तैयार होते हैं कुदरती रंग अंबिका देवी के काम की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि उनकी कलाकृतियों में किसी भी प्रकार के रासायनिक या बाजारू पेंट का उपयोग नहीं होता। वह रंगों के निर्माण के लिए पूरी तरह से कुदरती संसाधनों पर निर्भर रहती हैं। लाल रंग तैयार करने के लिए गुलाब की पंखुड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि हरा रंग नीम की हरी पत्तियों से निकाला जाता है। इसी तरह रेखाओं और आकृतियों को गहरा काला रंग देने के लिए दीपक की कालिख का प्रयोग किया जाता है। कागज़, मिट्टी और विभिन्न पारंपरिक आधार सामग्रियों पर जब ये प्राकृतिक रंग उतरते हैं, तो वे प्रकृति और मनुष्य के गहरे रिश्ते को दर्शाते हैं। बचपन की सीख और एक साल के औपचारिक प्रशिक्षण से निखरी कला इस विधा के प्रति उनके जुड़ाव की शुरुआत बचपन में ही हो गई थी। जब उनकी मां घर में मधुबनी पेंटिंग बनाती थीं, तब अंबिका देवी घंटों उनके पास बैठकर रंगों और आकृतियों को ध्यान से देखा करती थीं। मां के काम को देखते-देखते उन्होंने खुद भी हाथ आजमाना शुरू किया। आगे चलकर उन्होंने एक साल का बाकायदा प्रशिक्षण लिया, जिसके बाद उन्होंने अपनी मौलिक कल्पना और वर्षों के अनुभवों को जोड़कर नए-नए डिजाइन और रूप तैयार करने शुरू किए। उनका मानना है कि कोई भी पेंटिंग केवल हाथों से नहीं बनती, बल्कि उसमें दिल की भावना और दिमाग की सोच दोनों का तालमेल जरूरी होता है। कला के क्षेत्र में इसी अप्रतिम योगदान को देखते हुए साल 2021 में उन्हें बिहार राज्य पुरस्कार (स्टेट अवॉर्ड) से भी नवाजा गया था। एक कलाकृति में कई हफ्तों का समय और मूल्य निर्धारण मधुबनी पेंटिंग धैर्य और एकाग्रता की मांग करती है, जिसमें एक-एक बारीक रेखा खींचने में भारी वक्त लगता है। आकार में छोटी दिखने वाली पेंटिंग को पूरा करने में करीब 10 से 15 दिन का समय लग जाता है। वहीं दूसरी ओर, बड़े आकार की और अत्यंत बारीक काम वाली पेंटिंग को तैयार करने में 15 से 20 दिन तक की मेहनत लगती है। इस मेहनत और बारीकी के अनुसार ही उनकी कीमत तय होती है। उनकी बनाई सबसे छोटी पेंटिंग 350 रुपये से शुरू होती है, जबकि सबसे विस्तृत और बारीक काम वाली सबसे महंगी पेंटिंग का मूल्य लगभग 15,000 रुपये तक पहुंचता है। मौसम और प्रदर्शनियों पर टिकी कमाई इस पारंपरिक कार्य में आर्थिक आमदनी कभी एक समान या तय नहीं रहती। गर्मियों के दिनों में बिक्री का ग्राफ काफी नीचे गिर जाता है, जिससे आय सीमित हो जाती है। इसके विपरीत, सर्दियों के मौसम और विभिन्न हस्तशिल्प प्रदर्शनियों के दौरान काम में तेजी आती है और बिक्री अच्छी होती है। कभी महीने में 10 हजार रुपये तो कभी 20 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती है। अंबिका देवी का कहना है कि आय का पूरा दारोमदार बाजार की स्थिति और ग्राहकों की मांग पर रहता है। उतार-चढ़ाव के बावजूद 74 वर्ष की उम्र में भी वह हर दिन पेंटिंग बनाती हैं और उनका संकल्प है कि जब तक उनके हाथ सक्षम रहेंगे, वह इस लोककला को जीवित रखने के लिए निरंतर काम करती रहेंगी। इसका आप पर असर पारंपरिक हस्तशिल्प और पर्यावरण-अनुकूल कला को समझने और अपनाने के लिए यह यात्रा सीधे व्यवहार्य विकल्प प्रस्तुत करती है। • भारत में: देश भर के कला प्रेमियों और खरीदारों के लिए यह पर्यावरण-अनुकूल और प्रामाणिक कलाकृतियों के संरक्षण का सीधा अवसर है। 350 रुपये से शुरू होकर 15,000 रुपये तक की ये पेंटिंग्स प्राकृतिक विकल्पों के प्रति लोगों का रुझान बढ़ाती हैं। • बिहार में: राज्य के पारंपरिक कलाकारों और नए शिक्षार्थियों के लिए यह संदेश है कि स्थानीय विरासत से नियमित आजीविका कमाई जा सकती है। युवा कारीगर 10 हजार से 20 हजार रुपये प्रति माह तक कमाते हुए अपनी सांस्कृतिक पहचान को आगे बढ़ा सकते हैं। • पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली: घरों में सजावट के लिए केमिकल वाले सिंथेटिक रंगों की जगह फूलों और पत्तियों से बने प्राकृतिक रंगों को बढ़ावा मिलता है। इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना टिकाऊ और शुद्ध कला को समर्थन दिया जा सकता है। • पारंपरिक कौशल विकास: नई पीढ़ी के शिक्षार्थी केवल एक वर्ष के बुनियादी प्रशिक्षण के बल पर अपनी रचनात्मक क्षमताओं को रोजगार में बदल सकते हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और युवाओं के लिए आत्मनिर्भरता के रास्ते खुलते हैं। ऐसा क्यों हुआ अंबिका देवी का यह सफर बचपन के पारिवारिक माहौल, व्यक्तिगत लगन और रासायनिक विकल्पों के मुकाबले प्राकृतिक परंपरा को तरजीह देने का सीधा परिणाम है। • पारिवारिक पृष्ठभूमि: बचपन में अपनी मां को घर पर मधुबनी चित्र बनाते देखने के कारण उनके भीतर कला के प्रति स्वाभाविक रुचि जगी। इसी शुरुआती प्रेरणा ने उन्हें इस विधा को अपनाने की दिशा दी। • पारंपरिक ज्ञान का चयन: उन्होंने बाजार के सिंथेटिक और जहरीले केमिकल रंगों के बजाय नीम, गुलाब और कालिख जैसी प्राकृतिक सामग्रियों को चुना। यह पारंपरिक ज्ञान पीढ़ियों से लोककला का आधार रहा है और उन्होंने इसे बिना बदले जारी रखा। • संस्थागत प्रशिक्षण और निरंतरता: मां से सीखने के बाद एक साल का औपचारिक प्रशिक्षण लेने से उनके कौशल को तकनीकी मजबूती मिली। इसी अभ्यास ने उन्हें 30 साल तक बिना रुके कला में बने रहने में सक्षम बनाया। • प्रदर्शनी आधारित बाजार व्यवस्था: हस्तशिल्प के बाजार में सर्दियों के मेलों और प्रदर्शनियों की व्यवस्था के कारण कलाकारों को सीधे खरीदार मिलते हैं। इसी चक्र से उनकी 10 से 20 हजार रुपये की आय संभव हो पाती है। सवाल-जवाब 1. अंबिका देवी कौन हैं और वह किस क्षेत्र से जुड़ी हैं? अंबिका देवी बिहार के मधुबनी जिले की 74 वर्षीय वरिष्ठ कलाकार हैं, जो पिछले 30 वर्षों से प्राकृतिक रंगों से पारंपरिक मधुबनी पेंटिंग बना रही हैं। 2. उनकी पेंटिंग्स में रंग कैसे तैयार किए जाते हैं? वह किसी भी केमिकल का उपयोग नहीं करतीं; लाल रंग गुलाब की पंखुड़ियों से, हरा रंग नीम की पत्तियों से और काला रंग दीपक की कालिख से तैयार करती हैं। 3. एक पेंटिंग को पूरा करने में कितना समय लगता है? छोटी पेंटिंग बनाने में 10 से 15 दिन लगते हैं, जबकि बड़ी और बारीक पेंटिंग तैयार करने में 15 से 20 दिन तक का समय लगता है। 4. अंबिका देवी की पेंटिंग्स की कीमत कितनी है? उनकी छोटी पेंटिंग्स 350 रुपये से शुरू होती हैं, जबकि सबसे बारीक और महंगी पेंटिंग की कीमत लगभग 15,000 रुपये है। 5. उन्हें कौन सा प्रमुख पुरस्कार मिल चुका है? मधुबनी कला में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें साल 2021 में बिहार राज्य पुरस्कार (स्टेट अवॉर्ड) से सम्मानित किया गया था। 6. इस कला से उनकी मासिक कमाई कितनी होती है? कमाई मौसम और मांग पर निर्भर करती है; गर्मियों में बिक्री कम होती है जबकि सर्दियों और प्रदर्शनियों में 10 हजार से 20 हजार रुपये तक कमाई हो जाती है। प्रेरणा और सबक अंबिका देवी का जीवन यह साबित करता है कि सच्ची लगन, सादगी और पर्यावरण के प्रति सम्मान से किसी भी उम्र में विशिष्ट पहचान बनाई जा सकती है। • उम्र केवल एक संख्या है: 74 वर्ष की आयु में भी रोजाना नई पेंटिंग बनाकर उन्होंने साबित किया है कि सीखने और सृजन करने का कोई अंत नहीं होता। कोई भी व्यक्ति जीवन के किसी भी पड़ाव पर अपने जुनून को जिंदा रख सकता है। • जड़ों और परंपरा पर गर्व: आधुनिक केमिकल रंगों की होड़ में भी उन्होंने अपनी पारंपरिक विधियों को नहीं छोड़ा। अपनी विरासत पर अडिग रहकर ही उन्होंने साल 2021 में राज्य स्तरीय पुरस्कार प्राप्त किया। • ज्ञान को आगे बांटना: केवल खुद कला बनाने तक सीमित न रहकर उन्होंने नई पीढ़ी को सिखाना अपना कर्तव्य माना। अपने हुनर को दूसरों के साथ साझा करना ही किसी भी विद्या को अमर बनाता है। • धैर्य और साधना का मूल्य: एक पेंटिंग पर 15 से 20 दिन का समय लगाकर उन्होंने दिखाया कि जल्दबाजी के बजाय एकाग्रता और गुणवत्ता ही असली पहचान दिलाती है। सच्चा काम हमेशा समय और समर्पण मांगता है। https://trendkia.com/culture/bihar-ki-74-varshiya-ambika-devi-nima-gulaba-aura-kalikha-se-bacha-rahin-parnparika-madhubani-pentinga-ki-virasata-53209 TrendKia — Har trend, sabse pehle.