चित्रदुर्ग के खेत से निकला 16वीं सदी का अनोखा पत्थर, जमीन कब्जे पर दिया गया था काशी में गौहत्या का अभिशाप कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में खेत की जुताई के दौरान 450 साल पुराना ऐतिहासिक शिलालेख मिला है। 17 पंक्तियों के इस कन्नड़ अभिलेख में सार्वजनिक तालाब निर्माण के बदले कर मुक्त भूमि और उसे हड़पने वालों को काशी में गौहत्या के बराबर पाप मिलने का उल्लेख है। कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले स्थित एक शांत गांव में कृषि कार्य के दौरान अचानक 16वीं सदी की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर सामने आ गई। किसानों को अपनी जमीन की जुताई करते समय एक भारी काला पत्थर मिला, जो शुरू में तो मिट्टी से ढका एक सामान्य पत्थर प्रतीत हुआ, लेकिन सफाई के पश्चात उस पर उकेरी गई 17 पंक्तियों ने पुरातत्वविदों और इतिहासकारों का ध्यान आकर्षित कर लिया। यह प्राचीन शिलालेख करीब साढ़े चार सौ साल पुराना है और मध्यकालीन भारत की शासन प्रणाली, जल संरक्षण के प्रयासों तथा सामाजिक व्यवस्था पर गहरा प्रकाश डालता है। राजा द्वारा दिए गए भूमि अनुदान की पुष्टि करने वाले इस पत्थर में दर्ज सबसे चौंकाने वाली बात वह चेतावनी है, जो जमीन पर अवैध कब्जा करने वालों के लिए लिखी गई थी। जावगोंडनहल्ली गांव में सर्वे नंबर 85 से मिली ऐतिहासिक धरोहर यह ऐतिहासिक खोज चित्रदुर्ग जिले के हिरियूर तालुक में स्थित जावगोंडनहल्ली गांव में हुई है। ग्रामीण किसान जब सर्वे नंबर 85 वाली जमीन पर जुताई का काम कर रहे थे, तभी यह प्राचीन शिलाखंड हल से टकराया। प्रारंभिक पुरातात्विक पड़ताल से संकेत मिलता है कि इस शिलालेख का संबंध कामागेटी राजवंश के प्रसिद्ध शासक इम्माडी चिक्कन्ना नायक के शासनकाल से है, जिन्होंने 1575 ईस्वी से 1586 ईस्वी के मध्य इस क्षेत्र पर शासन किया था। उस दौर में सार्वजनिक कार्यों के प्रोत्साहन के लिए राज्य द्वारा विशेष पुरस्कार देने की परंपरा थी, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण इस शिलालेख में दर्ज है। शिलालेख में दर्ज विवरण के अनुसार, कामागेटी शासक के अधीन कार्यरत एक अधिकारी डोड्डागौड़ा ने जावगोंडनहल्ली गांव के निवासियों के लिए पानी की समस्या को दूर करने हेतु एक विशाल तालाब या झील का निर्माण करवाया था। डोड्डागौड़ा, लक्काजिया के पुत्र थे और एक जिम्मेदार प्रशासनिक पद संभालते थे। उनके इस जनहित कार्य से प्रसन्न होकर राजा इम्माडी चिक्कन्ना नायक ने उन्हें 'उंबली' अर्थात कर-मुक्त भूमि उपहार स्वरूप प्रदान की थी। मध्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था में 'उंबली' ऐसी जमीन को कहा जाता था, जिस पर किसी प्रकार का सरकारी कर नहीं लगता था और उसका पूरा राजस्व या उपयोग अधिकारी का परिवार कर सकता था। पुराने कन्नड़ लिपि में दर्ज 17 पंक्तियों का विवरण और शाप की शर्त काले पत्थर की इस पटिया पर प्राचीन कन्नड़ भाषा और लिपि में कुल 17 पंक्तियां बहुत स्पष्ट रूप से उकेरी गई हैं। शिलालेख में यह स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि डोड्डागौड़ा और उनके वंशज इस कर-मुक्त भूमि का उपभोग तब तक करते रहेंगे, 'जब तक आकाश में सूर्य और चंद्रमा विद्यमान हैं'। प्राचीन काल में शासकीय आदेशों और भूमि अनुदानों में इस तरह की काव्यात्मक और दीर्घकालिक भाषा का प्रयोग अत्यंत आम था ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि अनुदान स्थायी है। इसके साथ ही, शिलालेख के निचले हिस्से में एक कठोर धार्मिक चेतावनी दर्ज की गई है। इसमें कहा गया है कि यदि भविष्य में कोई भी व्यक्ति, चाहे वह शासन का कोई अधिकारी हो या कोई अन्य नागरिक, इस दान की गई जमीन को छीनने, उस पर अवैध कब्जा करने या उसे नष्ट करने की कोशिश करेगा, तो उसे काशी में पवित्र गाय की हत्या करने के समान महापाप लगेगा। मध्यकालीन दक्षिण भारत में भूमि अधिकारों की सुरक्षा केवल कानूनी आदेशों से संभव नहीं थी, इसलिए समाज में धार्मिक आस्था और नैतिक भय का सहारा लिया जाता था। पवित्र तीर्थ स्थल काशी में गौहत्या के पाप का विचार लोगों में गहरा नैतिक भय पैदा करता था, जिससे कोई भी व्यक्ति अनुदान की जमीन पर आंख उठाने से डरता था। पुरातत्व विभाग का अध्ययन और संग्रहालय में संरक्षण घटना की जानकारी मिलते ही चित्रदुर्ग के पुरातत्व, संग्रहालय और विरासत विभाग की टीम ने स्थल का दौरा किया। चित्रदुर्ग में विभाग के सहायक निदेशक प्रह्लाद जी के अनुसार, प्राथमिक अध्ययनों के आधार पर इस शिलालेख का समय अनुमानित रूप से 1581 ईस्वी के आसपास का माना जा रहा है। हालांकि, इसकी सटीक समय-सीमा की पुष्टि के लिए विस्तृत वैज्ञानिक और लिपि संबंधी जांच जारी है। उन्होंने बताया कि इस पत्थर पर स्पष्ट चेतावनी लिखी है कि जो भी इस परिवार से जमीन छीनने या इसे नुकसान पहुंचाने की चेष्टा करेगा, वह अभिशाप का भागी बनेगा। पुरातत्व विभाग वर्तमान में इस बात की भी जांच कर रहा है कि जिस सर्वे नंबर 85 की जमीन से यह पत्थर बरामद हुआ है, क्या वही मूल भूमि है जो 16वीं सदी में डोड्डागौड़ा के परिवार को 'उंबली' के रूप में दी गई थी। ग्रामीणों की त्वरित सूचना के बाद, इस 450 साल पुरानी शिला को सुरक्षित तरीके से चित्रदुर्ग के सरकारी संग्रहालय में स्थानांतरित कर दिया गया है, जहां इसे संरक्षित रखा जाएगा और विशेषज्ञ इस पर आगे का अध्ययन करेंगे। तिथियों की अस्पष्टता और पत्थर पर मिले व्याकरण संबंधी साक्ष्य हालांकि इस शिलालेख में तिथि के संबंध में 'कार्तिक शुद्ध दशमी' और दिन 'गुरुवार' का स्पष्ट उल्लेख मिलता है, लेकिन इसका exact वर्ष अभी पूरी तरह से तय नहीं हो पाया है। इसका मुख्य कारण यह है कि पत्थर का वह हिस्सा समय के साथ घिसकर क्षतिग्रस्त हो चुका है, जहां शक संवत और संवत्सर से जुड़ी महत्वपूर्ण तिथियां उकेरी गई थीं। सदियों तक मिट्टी के नीचे दबे रहने और मौसम के प्रभाव के कारण कुछ अक्षर अस्पष्ट हो गए हैं। पुरातत्वविदों और भाषा विशेषज्ञों ने अध्ययन के दौरान यह भी पाया कि शिलालेख की पंक्तियों में कुछ लेखन त्रुटियां और व्याकरण संबंधी गलतियां मौजूद हैं। उस दौर में स्थानीय मूर्तिकार या उत्कीर्णक कई बार बोलचाल की भाषा के आधार पर शब्द उकेर देते थे, जिससे ऐसी भाषाई भिन्नताएं आ जाती थीं। इसी कारण इतिहासकार अब उस काल के अन्य समकालीन अभिलेखों से इसकी तुलना करके सटीक वर्ष और ऐतिहासिक संदर्भ का मिलान कर रहे हैं। कामागेटी राजवंश और मध्यकालीन कर्नाटक का जल प्रशासन इतिहास के दृष्टिकोण से यह खोज कामागेटी राजवंश और चित्रदुर्ग के नायकों की शुरुआती शासन प्रणाली को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कामागेटी परिवार को चित्रदुर्ग के नायक राजवंश का संस्थापक माना जाता है। इस राजवंश के स्थानीय सरदारों और राजाओं ने 16वीं शताब्दी से लेकर 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक मध्य कर्नाटक के विस्तृत भूभाग पर सफलतापूर्वक शासन किया था। यह नया शिलालेख केवल एक धार्मिक चेतावनी या भूमि सौदे का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह 450 साल पहले कर्नाटक में मौजूद उन्नत सिंचाई व्यवस्था, जन-कल्याणकारी सोच और स्थानीय जल निकायों के रखरखाव की राज्य नीति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। राजाओं द्वारा नागरिकों और अधिकारियों को जल निकाय बनाने के बदले स्थाई संपत्ति देना यह दर्शाता है कि मध्यकालीन समाज में जल स्रोतों का निर्माण कितना महत्वपूर्ण कार्य माना जाता था। इसका आप पर असर • भारत में: यह ऐतिहासिक खोज भारत में मध्यकालीन जल संरक्षण तकनीकों, प्रशासनिक नीतियों और भूमि अनुदान प्रणालियों को समझने में मदद करती है। • चित्रदुर्ग में: कामागेटी नायकों के नए पुरातात्विक साक्ष्य स्थानीय इतिहास को समृद्ध करेंगे और सरकारी संग्रहालय के माध्यम से शोधकर्ताओं व पर्यटकों को आकर्षित करेंगे। सवाल-जवाब 1. चित्रदुर्ग में मिला शिलालेख कितना पुराना है? यह शिलालेख लगभग 450 साल पुराना माना जा रहा है, जिसका संबंध 16वीं सदी (अनुमानित 1581 ईस्वी) में कामागेटी शासक इम्माडी चिक्कन्ना नायक के शासनकाल से है। 2. यह ऐतिहासिक शिलालेख किस गांव में पाया गया? यह शिलालेख कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले के हिरियूर तालुक में स्थित जावगोंडनहल्ली गांव में सर्वे नंबर 85 की जमीन से मिला है। 3. शिलालेख पर क्या शाप लिखा हुआ है? शिलालेख पर लिखा है कि यदि कोई व्यक्ति दान में दी गई जमीन को छीनने या उस पर अवैध कब्जा करने का प्रयास करेगा, तो उसे काशी में गौहत्या के बराबर गंभीर पाप लगेगा। 4. डोड्डागौड़ा को राजा से 'उंबली' जमीन क्यों मिली थी? डोड्डागौड़ा ने जावगोंडनहल्ली गांव में सार्वजनिक उपयोग के लिए तालाब बनवाया था, जिससे खुश होकर राजा ने उन्हें 'उंबली' यानी कर-मुक्त जमीन उपहार में दी थी। 5. शिलालेख में सटीक वर्ष का पता क्यों नहीं चल पा रहा है? शिलालेख का वह हिस्सा क्षतिग्रस्त और घिसा हुआ है जहां शक संवत और संवत्सर का उल्लेख था, हालांकि इसमें कार्तिक शुद्ध दशमी और गुरुवार का स्पष्ट उल्लेख है। https://trendkia.com/culture/chitradurga-ke-kheta-se-nikala-16vin-sadi-ka-anokha-patthara-jamina-kabje-para-diya-gaya-tha-kashi-men-gauhatya-ka-abhishapa-14778 TrendKia — Har trend, sabse pehle.