# दरभंगा राजदरबार से वैश्विक मंच तक शास्त्रीय गायकी को नई ऊंचाइयों पर ले गए राम चतुर मलिक

> दरभंगा घराने के ख्यातिप्राप्त गायक राम चतुर मलिक ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की ध्रुपद-धमार विधा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया और आकाशवाणी का शीर्ष ग्रेड हासिल किया।

**Type:** article · **Category:** कल्चर · **Published:** 2026-10-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/culture/darbhanga-rajdarbar-se-global-manch-tak-classical-gayaki-ko-nayi-unchaiyon-par-le-gaye-ram-chatur-mallick-42937 · **Language:** Hindi
**Tags:** राम चतुर मलिक, ध्रुपद सम्राट, दरभंगा घराना, भारतीय शास्त्रीय संगीत, पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी, धमार गायन

भारतीय शास्त्रीय संगीत के समृद्ध इतिहास में राग, लय और बंदिश की शुद्धता को सहेजने वाले संगीत साधकों में पंडित राम चतुर मलिक का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। 5 अक्टूबर 1902 को जन्मे इस महान गायक ने अपना पूरा जीवन गायकी की प्राचीन परंपराओं को जीवंत रखने और उन्हें अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने में समर्पित कर दिया। उनका जन्म एक ऐसे प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था जहां संगीत केवल शौक नहीं बल्कि जीवनशैली का अभिन्न अंग था। उनके पिता पंडित राजित राम मलिक दरभंगा महाराज की रियासत के विख्यात संगीतज्ञ थे। पिता न केवल ध्रुपद गायन में महारत रखते थे, बल्कि वे संस्कृत के प्रख्यात विद्वान और उत्कृष्ट कवि भी थे। घर में गूंजने वाले सुरों और सांगीतिक वातावरण ने बचपन में ही राम चतुर मलिक के भीतर सुर और ताल की गहरी समझ विकसित कर दी थी।

घर के इसी सांगीतिक माहौल में उनकी शुरुआती तालीम शुरू हुई। उनकी असाधारण प्रतिभा और लयकारी पर पकड़ इतनी प्रखर थी कि उन्होंने महज 15 वर्ष की उम्र में अपनी पहली सार्वजनिक संगीत प्रस्तुति देकर श्रोताओं और आलोचकों को चौंका दिया था। इस शुरुआती मंच प्रदर्शन के बाद उनकी संगीत यात्रा ने एक नई रफ्तार पकड़ी और उनका रियाज तथा गायन लगातार नए आयाम छूता चला गया।

## दरभंगा दरबार के राजगायक और गायकी की चारों वाणियों पर पकड़
पंडित राम चतुर मलिक के जीवन और संगीत यात्रा में सबसे अहम मोड़ साल 1924 में आया, जब दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह ने उनकी विलक्षण योग्यता को पहचानते हुए उन्हें अपने दरबार का राजगायक नियुक्त कर दिया। उस दौर में दरभंगा राजदरबार देश भर में शास्त्रीय संगीत और कला के सबसे बड़े तथा प्रभावशाली केंद्रों में से एक माना जाता था। राजदरबार में मिले संरक्षण और सम्मान ने उन्हें अपनी कला को निखारने तथा विभिन्न बंदिशों को साधने का खुला अवसर प्रदान किया।

उनकी मुख्य पहचान ध्रुपद और धमार गायन शैली के एक बेजोड़ प्रतिनिधि के रूप में स्थापित हुई। ध्रुपद संगीत परंपरा की चार प्रमुख वाणियों यानी गौहर, डागर, खंडार और नौहर पर उनका असाधारण अधिकार था। उनकी प्रस्तुति का अंदाज, गंभीर आवाज और कठिन लयकारियां उन्हें अपने समकालीन अन्य ध्रुपद गायकों की तुलना में बिल्कुल विशिष्ट बनाती थीं। इसके साथ ही, उनकी संगीत साधना केवल ध्रुपद और धमार तक ही सीमित नहीं रही। उन्हें ख्याल गायकी, ठुमरी के भावपूर्ण अंगों और अपनी लोक जड़ों से जुड़े मैथिली लोकगीतों की भी व्यापक और सूक्ष्म समझ थी। इसी बहुआयामी दृष्टि के कारण उनकी गायकी का दायरा बेहद विस्तृत और समृद्ध बना रहा।

## साल 1937 में यूरोप यात्रा और यूनेस्को का अंतरराष्ट्रीय सम्मान
पंडित राम चतुर मलिक की ख्याति केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने विदेशी श्रोताओं के बीच भी भारतीय शास्त्रीय संगीत का परचम लहराया। साल 1937 में वह दरभंगा महाराज के छोटे भाई कुमार विश्वेश्वर सिंह के साथ इंग्लैंड और फ्रांस की ऐतिहासिक यात्रा पर गए थे। उस जमाने में किसी भी भारतीय शास्त्रीय गायक का पश्चिमी देशों में जाकर मंच पर प्रस्तुति देना एक अत्यंत दुर्लभ और बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। उन्होंने यूरोपीय मंचों पर अपनी गंभीर गायकी से वहां के श्रोताओं को भारतीय संगीत की आध्यात्मिक गहराई और शास्त्रीय भव्यता से परिचित कराया।

बाद के वर्षों में भी उनकी कला को वैश्विक स्तर पर सराहा गया। साल 1976 में फ्रांस सरकार ने उनकी ध्रुपद और धमार की दुर्लभ रिकॉर्डिंग को यूनेस्को के विशेष अंतरराष्ट्रीय प्रसारण के लिए चुना। इस ऐतिहासिक कदम ने भारतीय शास्त्रीय परंपरा और दरभंगा घराने के ध्रुपद को अंतरराष्ट्रीय फलक पर स्थाई मान्यता दिला दी।

## बिना ऑडिशन शीर्ष ग्रेड, पद्मश्री और 'ध्रुपद सम्राट' की उपाधि
सार्वजनिक प्रसारक आकाशवाणी के इतिहास में पंडित राम चतुर मलिक के नाम एक दुर्लभ और ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज है। संगीत जगत में उनके बेजोड़ कद और कलात्मक प्रतिष्ठा को देखते हुए आकाशवाणी ने उन्हें बिना किसी पारंपरिक ऑडिशन के सीधे सर्वोच्च 'टॉप ग्रेड' कलाकार का दर्जा प्रदान किया था। यह सम्मान शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में उनके अद्वितीय प्रभाव का प्रमाण था।

भारतीय कला और संगीत में उनके अमूल्य योगदान के सम्मान में उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया। साल 1964 में उन्हें देश की प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया। इसके बाद साल 1974 में भारत सरकार ने उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से अलंकृत किया। संगीत जगत में उन्हें पूरे आदर के साथ 'ध्रुपद सम्राट' के नाम से जाना जाने लगा। साल 1990 में उनका देहावसान हो गया, लेकिन उनके द्वारा गाई गई ध्रुपद और धमार की दुर्लभ रिकॉर्डिंग आज भी कला के कद्रदानों के लिए अनमोल धरोहर हैं और भारतीय शास्त्रीय संगीत की गौरवशाली विरासत का स्मरण कराती हैं।

## इसका आप पर असर
पंडित राम चतुर मलिक का जीवन शास्त्रीय संगीत के संरक्षण और प्राचीन कला शैलियों के अध्ययन में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों एवं संगीत प्रेमियों के लिए ऐतिहासिक महत्व रखता है।

- **कला प्रेमियों के लिए:** यह इतिहास बताता है कि किस प्रकार दरभंगा घराने की ध्रुपद और धमार गायकी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। उनकी ऐतिहासिक रिकॉर्डिंग आज भी शास्त्रीय संगीत के विद्यार्थियों के लिए संदर्भ सामग्री के रूप में उपलब्ध हैं।
- **सांस्कृतिक विरासत में:** आकाशवाणी के बिना ऑडिशन टॉप ग्रेड और यूनेस्को प्रसारण जैसी उपलब्धियां भारतीय संगीत की प्रामाणिकता को रेखांकित करती हैं। यह नए कलाकारों को मूल शास्त्रीय शैलियों की शुद्धता बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है।
- **बिहार और दरभंगा क्षेत्र में:** यह दरभंगा राजदरबार के ऐतिहासिक योगदान और वहां फली-फूली सांस्कृतिक परंपराओं की महत्ता को सामने लाता है। स्थानीय स्तर पर यह क्षेत्र की शास्त्रीय संगीत विरासत को सहेजने के प्रयासों को बल देता है।
- **संगीत शोधार्थियों के लिए:** ध्रुपद की चारों वाणियों पर उनका अधिकार पारंपरिक गायकी की जटिलताओं को समझने का दुर्लभ अवसर देता है। संगीत के छात्र उनके गायन के जरिए बंदिश और लयकारी के संतुलन का अध्ययन कर सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
पंडित राम चतुर मलिक को भारतीय शास्त्रीय संगीत में 'ध्रुपद सम्राट' की उपाधि और वैश्विक ख्याति उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, कठोर साधना और विभिन्न संगीत शैलियों पर व्यापक अधिकार के कारण प्राप्त हुई।

- **पारिवारिक परंपरा और संस्कार:** उनके पिता पंडित राजित राम मलिक दरभंगा दरबार के जाने-माने ध्रुपद गायक, संस्कृत विद्वान और कवि थे। इस समृद्ध सांगीतिक परिवेश ने उन्हें बाल्यकाल से ही शास्त्रीय सुर और लय की गहरी नींव प्रदान की।
- **दरभंगा राजदरबार का संरक्षण:** साल 1924 में दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह द्वारा राजगायक बनाए जाने से उन्हें संगीत साधना का उत्कृष्ट मंच मिला। उस काल में दरभंगा दरबार देश में शास्त्रीय कलाओं का एक प्रमुख केंद्र था, जिससे उनकी कला को निरंतर विस्तार मिला।
- **चारों वाणियों और बहुमुखी शैलियों पर अधिकार:** वे केवल ध्रुपद-धमार तक सीमित नहीं रहे, बल्कि ध्रुपद की चारों प्रमुख वाणियों के साथ ख्याल, ठुमरी और मैथिली लोकगीतों में भी पारंगत थे। इस दुर्लभ विविधता ने उनकी गायकी को अद्वितीय पहचान दिलाई।
- **अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुति:** साल 1937 में इंग्लैंड और फ्रांस में मंच प्रदर्शन तथा 1976 में यूनेस्को प्रसारण ने उनकी कला को अंतरराष्ट्रीय ख्याति के स्तर पर स्थापित कर दिया।

## सवाल-जवाब

### 1. पंडित राम चतुर मलिक का जन्म कब हुआ था?
पंडित राम चतुर मलिक का जन्म 5 अक्टूबर 1902 को हुआ था।

### 2. उन्हें दरभंगा दरबार का राजगायक कब नियुक्त किया गया था?
साल 1924 में दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह ने उन्हें अपने दरबार का राजगायक बनाया था।

### 3. राम चतुर मलिक ने पहली सार्वजनिक संगीत प्रस्तुति किस उम्र में दी थी?
उन्होंने अपनी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति महज 15 वर्ष की आयु में दी थी।

### 4. ध्रुपद की किन चार वाणियों पर उनका अधिकार था?
ध्रुपद की चारों प्रमुख वाणियों—गौहर, डागर, खंडार और नौहर पर उनकी मजबूत पकड़ थी।

### 5. उन्होंने इंग्लैंड और फ्रांस की यात्रा किस वर्ष की थी?
उन्होंने साल 1937 में दरभंगा महाराज के छोटे भाई विश्वेश्वर सिंह के साथ इंग्लैंड और फ्रांस की यात्रा की थी।

### 6. यूनेस्को प्रसारण के लिए उनकी रिकॉर्डिंग को कब चुना गया था?
साल 1976 में फ्रांस सरकार ने उनकी ध्रुपद-धमार की रिकॉर्डिंग को यूनेस्को प्रसारण के लिए चुना था।

### 7. राम चतुर मलिक को पद्मश्री सम्मान कब मिला था?
भारत सरकार ने उन्हें साल 1974 में पद्मश्री से सम्मानित किया था।

### 8. पंडित राम चतुर मलिक का निधन किस वर्ष हुआ था?
पंडित राम चतुर मलिक का निधन साल 1990 में हुआ था।

## प्रेरणा और सबक
पंडित राम चतुर मलिक की जीवन यात्रा बताती है कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपरा के प्रति निष्ठा व्यक्ति को वैश्विक सम्मान दिला सकती है।

- **कम उम्र से समर्पण:** 15 साल की आयु में पहली सार्वजनिक प्रस्तुति देना यह सिखाता है कि लगन और निरंतर अभ्यास से प्रतिभा बहुत जल्दी निखर सकती है।
- **अपनी कला का दायरा बढ़ाना:** ध्रुपद-धमार का विशेषज्ञ होने के बावजूद उन्होंने ख्याल, ठुमरी और लोकगीतों को भी आत्मसात किया, जो दर्शाता है कि मूल कला में पारंगत रहते हुए भी सीखने का दायरा खुला रखना चाहिए।
- **विपरीत समय में पहचान बनाना:** 1937 के दौर में विदेशों में जाकर अपनी पारंपरिक भारतीय गायकी प्रस्तुत करना यह संदेश देता है कि अपनी संस्कृति पर विश्वास रखने से किसी भी मंच पर प्रभाव छोड़ा जा सकता है।
- **निष्ठा का स्वाभाविक सम्मान:** आकाशवाणी द्वारा बिना ऑडिशन टॉप ग्रेड दिया जाना यह साबित करता है कि जब काम में सर्वोच्च उत्कृष्टता होती है, तो औपचारिक प्रक्रियाओं से परे स्वतः सम्मान मिलता है।

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