# दिल्ली में बंगाली संस्कृति का गढ़ बने कश्मीरी गेट पंडाल में ढाक की गूंज के 75 साल पूरे

> दिल्ली के ऐतिहासिक कश्मीरी गेट दुर्गा पूजा पंडाल में पारंपरिक ढाक बजाने की प्रथा के 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं। 1951 में कोलकाता के कलाकारों से शुरू हुई यह परंपरा आज राजधानी के सांस्कृतिक जीवन का अटूट हिस्सा बन चुकी है।

**Type:** article · **Category:** कल्चर · **Published:** 2026-10-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/culture/delhi-men-bngali-snskriti-ka-garha-bane-kashmiri-gate-pndala-men-dhaka-ki-gunja-ke-75-sala-pure-49837 · **Language:** Hindi
**Tags:** कश्मीरी गेट दुर्गा पूजा, दिल्ली दुर्गा पूजा, ढाक परंपरा, चितरंजन पार्क, दिल्ली काली बाड़ी, बंगाली संस्कृति, मिंटो रोड पूजा

देश की राजधानी दिल्ली में शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा के दौरान एक अलग ही सांस्कृतिक माहौल देखने को मिलता है। इस उत्सव के केंद्र में उत्तर दिल्ली स्थित कश्मीरी गेट की दुर्गा पूजा का विशेष स्थान है। इस वर्ष कश्मीरी गेट पूजा पंडाल में पारंपरिक ढाक बजाने की ऐतिहासिक परंपरा अपने 75 वर्ष पूरे कर रही है। वर्ष 1951 में पहली बार कोलकाता से आए ढाकियों ने यहाँ ढाक बजाकर दिल्ली के दुर्गा पूजा आयोजनों को एक नया और जीवंत संगीत का आयाम दिया था। समय के साथ यह परंपरा पूरे शहर के अन्य पूजा पंडालों में फैल गई, लेकिन कश्मीरी गेट में गूंजने वाली ढाक की थाप का आकर्षण आज भी अद्वितीय है। शुरुआत में यह ऐतिहासिक पूजा रोशनपुरा स्थित काली मंदिर परिसर में आयोजित की जाती थी, जिसे बाद में सिविल लाइंस स्थित आईपी कॉलेज के पास बंगाली सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्रांगण में स्थानांतरित कर दिया गया।

## 1951 से शुरू हुई ढाक की अनूठी सांस्कृतिक विरासत
कश्मीरी गेट पूजा पंडाल में विशेष रूप से अंकित किया गया है कि यहाँ 1951 से लगातार ढाक बजाने की परिपाटी चली आ रही है। ढाक केवल एक वाद्य यंत्र नहीं है, बल्कि यह बंगाल की आत्मा और दुर्गा पूजा के अनुष्ठानिक उल्लास का प्रतीक है। प्रख्यात शिक्षाविद मंजू मजूमदार के अनुसार, ढाक की गूंजती और गंभीर आवाज के बिना दुर्गा पूजा की परिकल्पना भी अधूरी लगती है। जैसे ही ढाकी अपने लकड़ी के ढाक पर डंडियों से थाप देते हैं, संपूर्ण पूजा स्थल एक सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। यह संगीत इस बात का उद्घोष करता है कि मां दुर्गा का आगमन हो चुका है और भक्त भक्तिभाव में लीन होने के लिए तैयार हैं। हालांकि आज दक्षिण दिल्ली के चितरंजन पार्क से लेकर शहर के कोने-कोने तक आधुनिक, भव्य और आकर्षक रोशनी वाले पंडाल सजने लगे हैं, फिर भी कश्मीरी गेट में गूंजने वाले पारंपरिक ढाक की महत्ता जरा भी कम नहीं हुई है।

## 1910 से शुरू हुआ कश्मीरी गेट पूजा का ऐतिहासिक सफर
कश्मीरी गेट की दुर्गा पूजा का इतिहास बीसवीं सदी की शुरुआत से जुड़ा हुआ है। दिल्ली दुर्गा पूजा समिति के आधिकारिक दस्तावेजों और इतिहास के पन्नों के अनुसार, वर्ष 1910 में यहाँ रहने वाले बंगाली समुदाय के लोगों ने संगठित रूप से पहली बार सामुदायिक दुर्गा पूजा की नींव रखी थी। उस दौर में दिल्ली में बंगाली परिवारों की आबादी काफी सीमित थी। मुख्य रूप से रेलवे और सरकारी सेवाओं में कार्यरत बंगाली कर्मचारी बंगाल से आकर यहाँ बस रहे थे। अपनी जन्मभूमि और सांस्कृतिक जड़ों से दूर रहने के बावजूद इन परिवारों ने अपनी परंपराओं, भाषा और धार्मिक अनुष्ठानों को जीवित रखने के संकल्प के साथ यह आयोजन शुरू किया था। कुछ ऐतिहासिक मतों का यह भी दावा है कि दिल्ली में प्रवासी बंगाली परिवारों द्वारा दुर्गा पूजा का व्यक्तिगत आयोजन 1842 से ही चला आ रहा था, जिसे बाद में 1910 में एक वृहद सामुदायिक रूप प्रदान किया गया।

## बैलगाड़ी पर विसर्जन और पुरानी परंपराओं का संरक्षण
कश्मीरी गेट दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद औपनिवेशिक काल का इतिहास और पुरानी रीतियाँ आज भी सांस लेती हैं। जहाँ दिल्ली के अन्य पंडालों में मूर्तियों के विसर्जन के लिए आधुनिक वाहनों का उपयोग होता है, वहीं कश्मीरी गेट में मां दुर्गा की पारंपरिक प्रतिमा को हमेशा की तरह लकड़ी की बैलगाड़ी पर रखकर ही विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। यह दृश्य श्रद्धालुओं को अतीत की याद दिलाता है। परंपराओं के इस संरक्षण के बीच इस बार एक पुरानी याद गायब नजर आ रही है। चांदनी चौक के फव्वारा चौक के पास स्थित प्रसिद्ध 'अन्नपूर्णा मिष्ठान भंडार' की दुकान बीते वर्ष बंद हो जाने के कारण इस बार पंडाल परिसर में उनका स्टॉल नहीं लग पाया है। वर्षों से पूजा में आने वाले लोग यहाँ के ताजे रसगुल्ले और मिष्टी दोई का आनंद लेते थे, जिसकी कमी इस बार प्रशंसकों को खल रही है।

## तिमारपुर से गोल मार्केट और काली बाड़ी तक फैला दायरा
जब 1911 में भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित हुई, तो ब्रिटिश शासन के विभिन्न सरकारी दफ्तरों में कार्यरत बंगाली भद्रलोक बड़ी संख्या में दिल्ली पहुंचे। इन कर्मचारियों की बहुलता मुख्य रूप से तिमारपुर इलाके में थी। तिमारपुर के बंगाली समाज ने वर्ष 1913 में अपनी अलग दुर्गा पूजा शुरू की, जिसे पुरानी दिल्ली के बाद राजधानी की दूसरी सबसे पुरानी पूजा माना जाता है। इसके बाद 1919 में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया प्रेस को कोलकाता से दिल्ली लाया गया। प्रेस के कर्मचारियों ने तिमारपुर में एक और पूजा का शुभारंभ किया। बाद में जब प्रेस मिंटो रोड पर स्थापित हुई, तो यह पूजा भी मिंटो रोड स्थानांतरित हो गई, जो वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय कार्यालय के पास आयोजित होती है।

वर्ष 1930 के आसपास गोल मार्केट क्षेत्र में बड़ी संख्या में बंगाली परिवार आकर बसे। उन्होंने एडवर्ड स्क्वायर, बेयर्ड रोड और सिकंदरा प्लेस जैसे इलाकों में पूजा का आयोजन शुरू किया। वर्ष 1935 में बिड़ला मंदिर के पास काली बाड़ी के निर्माण के लिए स्थायी भूमि आवंटित हुई, जिसके बाद से दिल्ली काली बाड़ी की प्रसिद्ध पूजा शुरू हुई। यहाँ स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा कोलकाता के ऐतिहासिक कालीघाट मंदिर की मूर्ति की हूबहू प्रतिकृति होती है। 1935 में महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस दिल्ली काली बाड़ी पूजा समिति के अध्यक्ष रहे थे, जबकि स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी नियमित रूप से यहाँ मां दुर्गा के दर्शन के लिए आया करते थे। 1960 के दशक तक दिल्ली के पंडालों को बनाने वाले कारीगर और पूजा कराने वाले पुरोहित विशेष रूप से बनारस और बंगाल से ही बुलाए जाते थे।

## राजधानी के अन्य मोहल्लों से चितरंजन पार्क का 'मिनी बंगाल'
समय बीतने के साथ-साथ दिल्ली में बंगाली आबादी का फैलाव अन्य इलाकों में भी तेजी से हुआ। वर्ष 1944 में लोदी रोड पर पूजा शुरू हुई, जबकि 1950 के दशक के शुरुआती सालों में करोल बाग, सरोजनी नगर और मोती बाग जैसे मध्य व दक्षिण दिल्ली के आवासीय क्षेत्रों में दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन होने लगा। 1960 के दशक में गैर-सरकारी क्षेत्रों, व्यापार और अन्य पेशों से जुड़े हजारों बंगाली नागरिक दिल्ली आए। इन्होंने डिफेंस कॉलोनी, शाहदरा, कैलाश कॉलोनी, लाजपत नगर, तिलक नगर और पटेल नगर जैसे इलाकों में अपनी स्थानीय पूजा समितियों का गठन किया।

पिछले कुछ दशकों में दक्षिण दिल्ली का चितरंजन पार्क (सीआर पार्क) दिल्ली में बंगाली संस्कृति का सबसे बड़ा गढ़ बनकर उभरा है, जिसे प्यार से 'मिनी बंगाल' भी कहा जाता है। चितरंजन पार्क में मुख्य रूप से चार विशाल स्थानों पर दुर्गा पूजा के भव्य पंडाल सजाए जाते हैं। यहाँ का सांस्कृतिक वातावरण इतना आकर्षक होता है कि प्रसिद्ध संगीतकार शांतनु मोइत्रा जैसे दिग्गज भी उत्सव के दौरान विशेष रूप से चितरंजन पार्क पहुंचते हैं। आज पूरे दिल्ली-एनसीआर में बसे लाखों परिवारों की यह अभिलाषा रहती है कि वे पूजा के दौरान कम से कम एक बार कश्मीरी गेट के ऐतिहासिक पंडाल और चितरंजन पार्क के मिनी बंगाल की रौनक का प्रत्यक्ष अनुभव अवश्य करें।

## इसका आप पर असर
कश्मीरी गेट दुर्गा पूजा की 75 वर्षों की ढाक परंपरा दिल्ली की बहुसांस्कृतिक और ऐतिहासिक विविधता को संजोने का काम करती है।

- **भारत में:** देश की सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखने और विभिन्न राज्यों की कला व संगीत को महानगरों में जीवित रखने में ऐसे ऐतिहासिक आयोजन मुख्य भूमिका निभाते हैं। यह भारत की सांस्कृतिक एकता का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है।
- **दिल्ली में:** दिल्ली-एनसीआर के नागरिकों और कला प्रेमियों को कश्मीरी गेट, मिंटो रोड और चितरंजन पार्क जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर प्रामाणिक बंगाली परंपराओं, संगीत और खानपान का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त होता है। श्रद्धालु नवरात्रि के दौरान बिना बंगाल गए ही पारंपरिक उत्सव का आनंद उठा सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
दिल्ली में बंगाली समुदाय का प्रसार और दुर्गा पूजा के विशाल आयोजनों का इतिहास राजधानी के स्थानांतरण तथा प्रशासनिक विकास से गहराई से जुड़ा हुआ है।

- **राजधानी का स्थानांतरण:** वर्ष 1911 में जब ब्रिटिश शासन ने भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित की, तो बड़ी संख्या में बंगाली सरकारी कर्मचारी तिमारपुर, गोल मार्केट और मिंटो रोड जैसे इलाकों में आकर बसे।
- **सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव:** अपनी जन्मभूमि से दूर रहने वाले बंगाली परिवारों ने अपनी भाषा, अनुष्ठानों और संगीत को जीवित रखने के लिए 1910 में कश्मीरी गेट से संगठित सामुदायिक पूजा की शुरुआत की।
- **आवासीय कॉलोनियों का फैलाव:** 1950 और 1960 के दशकों में गैर-सरकारी नौकरियों और व्यापार के चलते बंगाली समाज का फैलाव करोल बाग, लाजपत नगर और बाद में चितरंजन पार्क तक हुआ, जिससे पूजा पंडालों का विस्तार पूरे शहर में हो गया।

## सवाल-जवाब

### 1. कश्मीरी गेट दुर्गा पूजा में ढाक बजाने की परंपरा कब शुरू हुई थी?
कश्मीरी गेट पूजा पंडाल में ढाक बजाने की परंपरा 1951 में शुरू हुई थी, जब पहली बार कोलकाता से ढाकी कलाकारों को बुलाया गया था।

### 2. दिल्ली की सबसे पुरानी सामुदायिक दुर्गा पूजा कौन सी है?
दिल्ली की सबसे पुरानी सामुदायिक दुर्गा पूजा कश्मीरी गेट की पूजा है, जिसकी शुरुआत वर्ष 1910 में दिल्ली दुर्गा पूजा समिति द्वारा की गई थी।

### 3. कश्मीरी गेट पूजा में प्रतिमा विसर्जन की क्या खास परंपरा है?
कश्मीरी गेट पूजा में मां दुर्गा की पारंपरिक प्रतिमा को विसर्जन के लिए आधुनिक गाड़ियों के बजाय लकड़ी की बैलगाड़ी पर ले जाया जाता है।

### 4. दिल्ली काली बाड़ी की स्थापना कब हुई और इसके अध्यक्ष कौन रहे हैं?
दिल्ली काली बाड़ी की पूजा 1935 में बिड़ला मंदिर के पास स्थायी स्थान मिलने के बाद शुरू हुई थी, और 1935 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस इसके अध्यक्ष रहे थे।

### 5. दिल्ली में 'मिनी बंगाल' किस इलाके को कहा जाता है?
दक्षिण दिल्ली स्थित चितरंजन पार्क (सीआर पार्क) को दिल्ली का 'मिनी बंगाल' कहा जाता है, जहाँ दुर्गा पूजा के दौरान चार प्रमुख बड़े पंडाल सजते हैं।

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