गाजीपुर की चार सदी पुरानी रामलीला में रायबरेली के कलाकारों का जलवा, बाल कलाकार रौनक बने राम और राजा भैया बने रावण उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में चार सौ साल से आयोजित हो रही ऐतिहासिक रामलीला में रायबरेली के कलाकार अपने अभिनय से जान फूंक रहे हैं, जहां नन्हे कलाकार से लेकर तीन दशक पुराने मंझे हुए अभिनेता मंच पर अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में चार शताब्दियों से निरंतर चली आ रही पारंपरिक रामलीला आज भी अपनी भव्यता और विशिष्ट मंचन शैली के चलते देशभर में अलग पहचान बनाए हुए है। इस ऐतिहासिक प्रस्तुति की आत्मा वे कलाकार हैं जो केवल मंच पर अभिनय नहीं करते, बल्कि उन पौराणिक पात्रों के आचार-विचार को अपने दैनिक आचरण में भी उतार लेते हैं। इस पारंपरिक आयोजन को जीवंत बनाने के लिए रायबरेली से आए कलाकार लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इस वर्ष भी मुख्य भूमिकाओं में शामिल बाल कलाकार रौनक तिवारी, अनुभवी अभिनेता राजा भैया तिवारी और नन्हे राज तिवारी की कलाकारी दर्शकों के दिलों को छू रही है। नन्हे रौनक की मर्यादा और राम का स्वरूप भगवान श्रीराम के स्वरूप में मंच पर उतरने वाले रौनक तिवारी की आयु केवल 12 से 14 वर्ष के बीच है। इतनी कम उम्र होने के बावजूद जब वे रंगमंच पर आते हैं, तो उनकी भाव-भंगिमा और संवाद अदायगी किसी मंझे हुए मंचीय कलाकार जैसी नजर आती है। वे पिछले 3 वर्षों से लगातार प्रभु श्रीराम का पात्र निभाते आ रहे हैं। इस भूमिका में गहराई लाने के लिए वे अपने गुरु से विशेष तौर पर संस्कृत श्लोकों का शुद्ध उच्चारण और उनका सस्वर पाठ सीखते हैं, जिससे मंच पर उनकी वाणी का प्रभाव अत्यंत गहरा पड़ता है। रौनक बताते हैं कि प्रभु श्रीराम सत्य, धर्म और मर्यादा के सर्वोच्च आदर्श हैं, इसलिए वे अपने निजी जीवन में भी अनुशासित और मर्यादित रहने का पूरा प्रयास करते हैं। कई बार ऐसा होता है कि मंचन समाप्त होने के बाद जब वे आम लोगों के बीच जाते हैं, तो दर्शक उन्हें श्रद्धावश नमन करने लगते हैं और असल जीवन में भी सम्मान देते हैं। इस आदर के कारण उनके ऊपर अपने आचरण को सदैव मर्यादित बनाए रखने का एक स्वाभाविक दायित्व आ जाता है। शुरुआत में इस गंभीर और पवित्र पात्र को निभाना उनके लिए थोड़ा चुनौतीपूर्ण था, परंतु निरंतर अभ्यास और गुरु के मार्गदर्शन ने अब इसे काफी सहज बना दिया है। तीन दशकों का अनुभव और रावण का गूंजता अट्टहास मंच पर लंकापति रावण की गर्जना करने वाले राजा भैया तिवारी इस रामलीला के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित कलाकारों में गिने जाते हैं। पिछले 25 से 30 वर्षों से लगातार रावण की भूमिका निभा रहे राजा भैया का अभिनय बहुआयामी रहा है। उन्होंने समय-समय पर मंथरा, भगवान परशुराम और माता शबरी जैसे बेहद कठिन और परस्पर भिन्न किरदारों को भी उतनी ही स्वाभाविकता के साथ मंच पर साकार किया है। उनका कहना है कि वे मंच पर भले ही अहंकारी राक्षसराज का रूप धरते हैं, किंतु उनके अंतर्मन में केवल भगवान राम के प्रति अगाध श्रद्धा वास करती है। रावण के अभिनय का मूल संदेश ही यही है कि अहंकार का अंत निश्चित होता है, और इसी भाव को वे पूरी शिद्दत से दर्शकों के सामने रखते हैं। राजा भैया की भारी आवाज और उनका विशिष्ट अट्टहास इस रामलीला का सबसे प्रमुख आकर्षण माना जाता है। उनके इस खूंखार ठहाके की लोकप्रियता इतनी अधिक है कि पिछले 3 वर्षों से उनकी इस हंसी को बाकायदा स्टूडियो में रिकॉर्ड किया जाने लगा है। विजयादशमी यानी दशहरे के अंतिम दिन जब ध्वनि विस्तारक यंत्रों पर उनकी गरजती हुई आवाज गूंजती है, तो समूचा वातावरण थर्रा उठता है और रावण के वध का दृश्य दर्शकों के लिए अत्यंत रोमांचकारी बन जाता है। माता सीता का भावपूर्ण अभिनय और वनगमन का प्रसंग मंच पर माता जानकी का पावन चरित्र निभाने वाले राज तिवारी उम्र में रौनक से करीब दो से तीन साल छोटे हैं। वे भी पिछले 3 वर्षों से इस महत्वपूर्ण दायित्व को पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं। अभिनय की शुरुआत में लंबे संवादों को कंठस्थ करना और स्त्री पात्र के कोमल हाव-भाव को अपनाना उनके लिए आसान नहीं था। इसके लिए उन्हें कड़ा अभ्यास करना पड़ा, जिसके बाद अब वे बहुत ही स्वाभाविक तरीके से सीता के चरित्र को मंच पर उतार पाते हैं। राज तिवारी का कहना है कि पूरी रामलीला में उन्हें प्रभु श्रीराम के वनगमन का दृश्य सबसे ज्यादा भावुक और प्रिय लगता है। अयोध्या से विदा लेते समय के इस प्रसंग को करते हुए उनके भीतर एक गहरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव पैदा होता है। यह अनुभव उन्हें अपनी सनातन परंपराओं, पारिवारिक संस्कारों और लोक संस्कृति के और अधिक निकट ले जाता है। इस तरह रायबरेली के इन कलाकारों की निष्ठा गाजीपुर की चार सौ साल पुरानी इस ऐतिहासिक धरोहर को लगातार समृद्ध कर रही है। इसका आप पर असर इस ऐतिहासिक रामलीला के सफल मंचन से स्थानीय लोक संस्कृति और युवा पीढ़ी में पारंपरिक कला के प्रति रुझान बढ़ता है। • दर्शकों के लिए: गाजीपुर और आसपास के क्षेत्रों के लोग चार सौ साल पुरानी जीवंत नाट्य परंपरा का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं। यह आयोजन परिवारों और बच्चों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों तथा नैतिक मूल्यों को समझने का सुनहरा अवसर प्रदान करता है। • रंगमंच के कलाकारों के लिए: छोटे शहरों के उदीयमान कलाकारों को अपनी प्रतिभा बड़े मंच पर साबित करने का अवसर मिलता है। लगातार मंचन से युवा कलाकारों का आत्मविश्वास बढ़ता है और अभिनय कला को संरक्षण प्राप्त होता है। • स्थानीय परंपरा और पर्यटन के लिए: ऐतिहासिक लोक कलाओं का निरंतर मंचन क्षेत्रीय सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाता है। दशहरे के पावन अवसर पर ऐसे भव्य आयोजनों से स्थानीय मेलों और बाजारों को भी आर्थिक संबल मिलता है। • संस्कृति के संरक्षण के लिए: युवा पीढ़ी शास्त्रीय संवादों, श्लोकों और मर्यादित आचरण से सीधे रूबरू होती है। डिजिटल युग में भी पारंपरिक मंचन कला को जीवित रखने की यह एक महत्वपूर्ण मिसाल है। ऐसा क्यों हुआ गाजीपुर की यह रामलीला चार सौ वर्षों से इसलिए निरंतर चल रही है क्योंकि कलाकारों की पीढ़ियां इसे केवल अभिनय नहीं बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक साधना मानकर समर्पित रहती हैं। • कलाकारों का समर्पण: रायबरेली के कलाकार हर वर्ष गाजीपुर पहुंचकर हफ्तों तक कड़ा अभ्यास करते हैं। पात्रों के प्रति उनकी व्यक्तिगत निष्ठा और आस्था ही इस मंचन को जीवंत बनाए रखती है। • गुरु-शिष्य परंपरा का संरक्षण: बाल कलाकारों को उनके गुरु द्वारा श्लोक, संवाद और मंचीय गरिमा का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। इसी पारंपरिक मार्गदर्शन के कारण नन्हे कलाकार भी गंभीर पात्रों को सहजता से निभा पाते हैं। • पारंपरिक नवाचार का समावेश: ऐतिहासिक रूप को बनाए रखते हुए आधुनिक ध्वनि तकनीक और स्टूडियो रिकॉर्डिंग का बुद्धिमानी से इस्तेमाल किया जा रहा है। रावण के अट्टहास की रिकॉर्डिंग जैसे प्रयोगों ने दर्शकों के रोमांच को कई गुना बढ़ा दिया है। सवाल-जवाब 1. गाजीपुर की यह रामलीला कितने साल पुरानी है? गाजीपुर की यह ऐतिहासिक रामलीला लगभग 400 साल पुरानी समृद्ध परंपरा का हिस्सा है। 2. भगवान राम की भूमिका कौन निभा रहे हैं और उनकी उम्र क्या है? भगवान राम का किरदार 12 से 14 वर्ष के युवा कलाकार रौनक तिवारी निभा रहे हैं। 3. रावण का किरदार निभाने वाले राजा भैया तिवारी का कितना अनुभव है? राजा भैया तिवारी पिछले 25 से 30 वर्षों से लगातार रावण की भूमिका निभा रहे हैं। 4. रावण के अट्टहास को लेकर क्या विशेष व्यवस्था की जाती है? उनकी गर्जना जैसी हंसी को पिछले 3 वर्षों से स्टूडियो में रिकॉर्ड कर दशहरे के दिन लाउडस्पीकर पर बजाया जाता है। 5. माता सीता का किरदार कौन निभा रहे हैं? माता सीता की भूमिका पिछले 3 वर्षों से युवा कलाकार राज तिवारी निभा रहे हैं। 6. राज तिवारी को रामलीला का कौन सा दृश्य सबसे ज्यादा प्रिय है? राज तिवारी को भगवान राम के वनगमन का दृश्य सबसे अधिक भावुक और प्रिय लगता है। प्रेरणा और सबक गाजीपुर की रामलीला में अभिनय कर रहे बाल और वरिष्ठ कलाकारों की लगन से अनुशासन, विनम्रता और कला साधना की अनमोल सीख मिलती है। • मर्यादा और आचरण का संतुलन: रौनक तिवारी कम उम्र में भी अपने पात्र की गरिमा को निजी जीवन में उतारकर संयमित आचरण का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। किसी भी कार्य में मिलने वाले सम्मान के साथ जिम्मेदारी का भाव रखना सफलता की कुंजी है। • दीर्घकालिक निष्ठा और निरंतरता: राजा भैया तिवारी का तीन दशकों तक मंच पर सक्रिय रहना यह सिखाता है कि कला या करियर में महारत वर्षों के सतत अभ्यास से आती है। सच्ची लगन ही व्यक्ति को बहुमुखी प्रतिभा का धनी बनाती है। • कड़ी मेहनत से झिझक पर विजय: राज तिवारी ने संवाद याद करने की शुरुआती कठिनाइयों को निरंतर अभ्यास से दूर किया। किसी भी नए क्षेत्र में शुरुआत कठिन हो सकती है, लेकिन नियमित प्रयास से सब कुछ सहज हो जाता है। https://trendkia.com/culture/ghazipur-ki-char-sadi-purani-ramlila-me-raebareli-ke-kalakaron-ka-jalwa-bal-kalakar-raunak-bane-ram-aur-raja-bhaiya-bane-ravana-49032 TrendKia — Har trend, sabse pehle.