तेलंगाना के अनिल कुमार चौहान मस्जिदों की दीवारों पर उकेरते हैं क़ुरआन की आयतें हैदराबाद के रहने वाले अनिल कुमार चौहान हिंदू समुदाय से ताल्लुक रखते हैं और पिछले तीन दशकों से मस्जिदों और दरगाहों में अरबी कैलीग्राफी कर रहे हैं. देश के दक्षिणी हिस्से में बसा हैदराबाद अपनी पुरानी सांस्कृतिक विविधता और आपसी सद्भाव के लिए पहचाना जाता है. इसी शहर में एक ऐसी शख्सियत मौजूद है जो कला और आस्था के जरिए इंसानियत का अनूठा संदेश दे रही है. इस मिसाल का नाम अनिल कुमार चौहान है, जो जन्म से हिंदू होने के बावजूद पिछले तीस साल से अधिक समय से देश की विभिन्न मस्जिदों और दरगाहों की दीवारों पर पवित्र क़ुरआन की आयतें पूरी शिद्दत के साथ उकेर रहे हैं. उनके इस नायाब हुनर ने यह साबित कर दिया है कि कला और श्रद्धा की कोई सीमा नहीं होती. सैकड़ों मस्जिदों में बिखेरा कला का जादू अनिल कुमार चौहान का यह सफर सिर्फ हैदराबाद तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि उन्होंने तेलंगाना और देश के कई अन्य क्षेत्रों की सौ से अधिक प्रमुख दरगाहों और मस्जिदों में अपनी कला का जौहर दिखाया है. इबादतगाहों की दीवारों, विशाल गुंबदों और मेहराबों पर उनके द्वारा उकेरी गई अरबी सुलेख यानी कैलीग्राफी अपनी खास खूबसूरती और नफासत के लिए जानी जाती है. उन्हें अरबी भाषा की विभिन्न लिपियों जैसे खत-ए-नस्तलीक़ और खत-ए-सुलूस पर बेहतरीन पकड़ हासिल है, जिसके कारण उनके काम में असाधारण सटीकता दिखाई देती है. साइनबोर्ड पेंटिंग से शुरू हुआ था सफर अनिल का यह सफर काफी संघर्ष और लगन से भरा रहा है. शुरुआती दिनों में वे एक सामान्य साइनबोर्ड पेंटर के रूप में काम करते थे और स्थानीय दुकानों के बाहर नाम लिखने का काम संभालते थे. इसी दौरान दुकानों के लिए उर्दू और अरबी भाषा के बोर्ड तैयार करते-करते उनकी रुचि इन भाषाओं के अक्षरों की बनावट में गहरी होती चली गई. चूँकि धार्मिक आयतों को लिखने में किसी भी प्रकार की गलती की गुंजाइश नहीं होती है, इसलिए उन्होंने किसी तरह की कोताही न बरतते हुए प्रसिद्ध इस्लामिक शिक्षण संस्थान जामिया निज़ामिया से जुड़े विद्वानों और उस्तादों के पास जाकर अरबी लिपि के सभी व्याकरणिक नियमों, नुक़्तों और एराब यानी मात्राओं का बारीकी से अध्ययन किया. नात-ख़्वानी से सजी कला की दुनिया अनिल कुमार चौहान की खूबी सिर्फ उनके हाथों के हुनर तक ही सीमित नहीं है. वे एक प्रतिभाशाली नात-ख़्वां भी हैं और धार्मिक जलसों या मिलाद के कार्यक्रमों के दौरान पैगंबर मोहम्मद साहब की शान में पूरे अदब के साथ नातिया कलाम पेश करते हैं. जब वे अपनी आवाज में नात पढ़ते हैं, तो सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते हैं. उनका स्पष्ट सोचना है कि कला को किसी एक धर्म या दायरे में सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए. मस्जिदों और मंदिरों दोनों जगह समान सम्मान वे अपने दैनिक जीवन में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं रखते हैं. वे अपनी कला के जरिए मंदिरों में देवी-देवताओं के चित्र और बोर्ड भी बनाते हैं और उतनी ही पवित्रता और निष्ठा के साथ मस्जिदों के भीतर क़ुरआन की आयतें भी लिखते हैं. उनकी इसी ईमानदारी और त्रुटिहीन काम को देखकर विभिन्न मस्जिद कमेटियों ने उन पर पूरा भरोसा जताया है. अनिल कुमार चौहान का यह पूरा जीवन इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि जब इरादे नेक हों और मन में दूसरे धर्मों के प्रति पूरा सम्मान हो, तो कला इंसानों के बीच की दूरियों को हमेशा के लिए मिटा सकती है. इसका आप पर असर यह अनूठी खबर समाज में आपसी सौहार्द और कला के प्रति समर्पण का एक मजबूत संदेश देती है. • भारत में: यह कहानी पूरे देश में यह संदेश देती है कि कला, संस्कृति और आस्था का दायरा किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं होता है। इससे विभिन्न संस्कृतियों के बीच आपसी समझ और भाईचारा मजबूत होता है। • तेलंगाना में: हैदराबाद और पूरे तेलंगाना क्षेत्र के स्थानीय कारीगरों और कलाकारों को अपने हुनर को निखारने की प्रेरणा मिलती है। इससे यह भी पता चलता है कि स्थानीय स्तर पर धार्मिक और सांस्कृतिक मेलजोल कितनी गहराई तक मजबूत है। सवाल-जवाब 1. अनिल कुमार चौहान कौन हैं? अनिल कुमार चौहान हैदराबाद के एक हिंदू कलाकार हैं जो पिछले तीन दशकों से मस्जिदों में अरबी कैलीग्राफी कर रहे हैं। 2. वे कितने समय से यह काम कर रहे हैं? वे पिछले तीन दशकों यानी 30 साल से अधिक समय से मस्जिदों और दरगाहों की दीवारों पर क़ुरआन की आयतें उकेर रहे हैं। 3. उन्होंने अरबी लिपि के नियम कहाँ से सीखे? उन्होंने प्रसिद्ध इस्लामिक शिक्षण संस्थान जामिया निज़ामिया से जुड़े उस्तादों और जानकारों से अरबी लिपि के नियम सीखे। 4. वे कैलीग्राफी के अलावा और क्या कला जानते हैं? वे कैलीग्राफी के अलावा एक बेहतरीन नात-ख़्वां भी हैं और धार्मिक महफिलों में नातिया कलाम पढ़ते हैं। 5. वे कितनी मस्जिदों में काम कर चुके हैं? वे तेलंगाना और देश के अन्य हिस्सों की 100 से अधिक प्रमुख मस्जिदों और दरगाहों में काम कर चुके हैं। प्रेरणा और सबक अनिल कुमार चौहान का जीवन और उनका तीन दशकों का कलात्मक सफर कई महत्वपूर्ण सबक सिखाता है. • लगन और महारत: किसी भी नए हुनर को सीखने के लिए उसकी गहराई और नियमों को पूरी तरह समझना जरूरी होता है, जैसा कि अनिल ने जामिया निज़ामिया के उस्तादों से अरबी लिपि सीखकर साबित किया। • पूर्वाग्रहों से ऊपर उठना: कला का कोई धर्म नहीं होता और जब आपकी नीयत साफ हो, तो आप सीमाओं से परे जाकर समाज में सकारात्मक मिसाल कायम कर सकते हैं। • निरंतर अभ्यास: साइनबोर्ड पेंटर से लेकर प्रमुख मस्जिदों के कैलीग्राफर बनने तक का सफर यह सिखाता है कि लगातार मेहनत और समर्पण से बड़े मुकाम हासिल किए जा सकते हैं। • दूसरों का सम्मान: अन्य संस्कृतियों और धर्मों के प्रति आदरभाव रखकर ही आप समाज में असली भरोसा और सम्मान अर्जित कर सकते हैं। https://trendkia.com/culture/haidarabada-ke-anila-kumara-chauhana-masjidon-ki-divaron-para-ukerate-hain-quran-ki-ayaten-39820 TrendKia — Har trend, sabse pehle.