हनुमान अंश फिल्म के गीत से वायरल हुए सुनील लोधी, जानिए कैसे एक कद्दू जैसे सूखे फल तूमा से तैयार होता है उनका सुरीला तंबूरा बाबा नीम करौली पर बनी फिल्म हनुमान अंश के वायरल गीत से गायक सुनील लोधी चर्चा में हैं, जिसके साथ ही बुंदेलखंड का पारंपरिक वाद्य यंत्र तंबूरा भी फिर से लोकप्रिय हो रहा है। सागर क्षेत्र के लोक कलाकारों की कला इन दिनों देश भर में गूंज रही है। बाबा नीम करौली के पवित्र जीवन पर केंद्रित फिल्म हनुमान अंश लगातार नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है। यह फिल्म न केवल बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन कर रही है, बल्कि इसके किरदारों और संगीतकारों को भी दर्शकों का भरपूर प्यार मिल रहा है। इस फिल्म का सबसे लोकप्रिय ट्रैक सॉन्ग 'मैंने तेरे ही भरोसे नैया जीवन में डर दई' सोशल मीडिया पर जबरदस्त तरीके से ट्रेंड कर रहा है। इस गीत को अपनी जादुई आवाज देने वाले गायक सुनील लोधी इन दिनों इंटरनेट पर छाए हुए हैं। इंस्टाग्राम की रील्स से लेकर तमाम बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनके वीडियो को लाखों लोग देख रहे हैं। इस लोकप्रियता के बीच सुनील लोधी के साथ हमेशा दिखने वाला उनका पारंपरिक वाद्य यंत्र तंबूरा भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गया है। सस्ते प्राकृतिक सामान से तैयार होने वाला जादुई वाद्य यंत्र सुनील लोधी के अब तक के जितने भी लोकगीत और वीडियो वायरल हुए हैं, उन सभी में वे तंबूरा की सुरीली तान पर गाते हुए नजर आते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस पारंपरिक वाद्य यंत्र को बनाने में किसी भी तरह की महंगी धातु या कीमती सामग्री का उपयोग नहीं किया जाता है। इसे तैयार करने के लिए बस एक पुरानी पारंपरिक कला और अनुभव की आवश्यकता होती है। बुंदेलखंड की लोक संस्कृति को सहेजने के लिए पिछले 35 वर्षों से लगातार सक्रिय दामोदर अग्निहोत्री बताते हैं कि बुंदेलखंड के लोकगीतों, भजनों और सांस्कृतिक आयोजनों में पहले कई तरह के पारंपरिक वाद्य यंत्रों का उपयोग किया जाता था। उनके अनुसार, क्षेत्र में लगभग 50 से अधिक पारंपरिक वाद्य यंत्र चलन में रहे हैं, जिनमें से 35 तरह के बुंदेली वाद्य यंत्र आज भी उनके व्यक्तिगत संग्रहालय में सुरक्षित रखे हुए हैं। इसी समृद्ध विरासत का एक हिस्सा तंबूरा भी है, जो सिर्फ एक तार के सहारे बेहद खूबसूरत और गंभीर धुन पैदा करता है। यह वजन में काफी हल्का होता है, जिसे आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है, लेकिन प्राकृतिक घटकों से बने होने के कारण इसकी सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना होता है। कद्दू जैसे दिखने वाले तूमा फल से तंबूरा बनाने की अनोखी विधि दामोदर अग्निहोत्री ने तंबूरा को बनाने की पूरी पारंपरिक कला का विस्तार से वर्णन किया है। इसे बनाने के लिए बुंदेलखंड में उगने वाले एक विशेष फल 'तूमा' का उपयोग किया जाता है, जो दिखने में काफी हद तक कद्दू जैसा होता है। सबसे पहले इस तूमा फल को कड़ी धूप में अच्छी तरह से सुखाया जाता है ताकि इसका बाहरी आवरण मजबूत और लकड़ी जैसा सख्त हो जाए। इसके बाद, सूखे हुए फल के ऊपरी हिस्से को एक निश्चित आकार में काट लिया जाता है। खोल के भीतर मौजूद सभी बीजों और सूखे गूदे को पूरी तरह से साफ करके बाहर निकाल दिया जाता है, जिससे केवल एक मजबूत खोखला खोल शेष बचता है। इसके बाद, इस खोखले खोल के आर-पार दो छेद किए जाते हैं, जिसमें से लगभग तीन से चार फीट लंबी बांस की एक पतली लकड़ी को गुजारा जाता है। इस बांस की लकड़ी के सबसे ऊपरी सिरे पर एक छोटी लकड़ी की खूंटी लगाई जाती है, जो तार को कसने या ढीला करने का काम करती है। दूसरी तरफ, तूमा फल के कटे हुए खुले हिस्से को चमड़े की पतली परत से अच्छी तरह मढ़कर बंद कर दिया जाता है। इसके बाद, चमड़े वाले हिस्से से लेकर ऊपर लगी बांस की खूंटी तक एक बारीक धातु का तार खींचा जाता है। तंबूरा से सही ध्वनि तरंगें उत्पन्न करने के लिए इस तार को फल की सतह से लगभग एक इंच ऊपर रखना जरूरी होता है। इसके लिए कारीगर तार के नीचे लकड़ी का एक छोटा टुकड़ा या पत्थर लगा देते हैं जो एक पुल की तरह काम करता है। जब इस तार पर उंगलियों से प्रहार किया जाता है, तो तंबूरा की अनोखी गूंज सुनाई देती है, जिसे सही ढंग से बजाने के लिए कड़े अभ्यास की जरूरत होती है। विलुप्त होती बुंदेली विरासत को मिला नया जीवन दामोदर अग्निहोत्री बताते हैं कि बदलते वक्त और आधुनिक संगीत उपकरणों के आने से तंबूरा बनाने वाले कारीगरों की संख्या बेहद कम रह गई थी। यह कला पूरी तरह से विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी थी। लेकिन फिल्म हनुमान अंश की अपार सफलता और गायक सुनील लोधी के वायरल वीडियो ने इस पारंपरिक वाद्य यंत्र का क्रेज एक बार फिर से लौटा दिया है। आज बुंदेलखंड के इस पारंपरिक वाद्य यंत्र को पूरे देश में एक नई पहचान और सम्मान मिल रहा है, जो संपूर्ण बुंदेलखंड और मध्य प्रदेश की लोक संस्कृति के लिए बेहद गर्व का विषय है। इसका आप पर असर पारंपरिक तंबूरा की अचानक बढ़ी लोकप्रियता यह दर्शाती है कि डिजिटल मीडिया कैसे दम तोड़ती क्षेत्रीय कलाओं को नया जीवन दे सकता है। • लोक कलाकारों के लिए: यह नया ट्रेंड स्थानीय संगीतकारों को अपनी पारंपरिक कला को ऑनलाइन प्रदर्शित करने का एक शानदार अवसर प्रदान करता है। इससे उन्हें वैश्विक दर्शकों तक पहुंचने और अपनी कला से कमाई करने का मौका मिलेगा। • बुंदेलखंड में: इस पुनरुद्धार से उन ग्रामीण कारीगरों को सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा जो तूमा से वाद्य यंत्र बनाने की दुर्लभ कला जानते हैं। इससे उनके हस्तशिल्प उत्पादों की मांग बढ़ेगी और उनकी सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रहेगी। ऐसा क्यों हुआ बुंदेलखंड के तंबूरा का पुनरुद्धार आधुनिक सिनेमा और डिजिटल मीडिया के एक साथ आने का परिणाम है, जिसने स्थानीय विरासत को बढ़ावा दिया है। • सिनेमाई सफलता: बाबा नीम करौली पर आधारित फिल्म हनुमान अंश की रिकॉर्ड तोड़ सफलता ने इसके गीतों और कलाकारों के प्रति लोगों में गहरी रुचि पैदा की। इस सफलता ने फिल्म में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक तत्वों को फिर से मुख्यधारा में ला दिया। • सोशल मीडिया का प्रभाव: सुनील लोधी द्वारा तंबूरा की धुन पर गाए गए गीत इंस्टाग्राम और अन्य प्लेटफॉर्म पर तेजी से वायरल हुए। इस वीडियो ने युवा पीढ़ी के बीच इस अनोखे वाद्य यंत्र को लेकर एक नया कौतूहल पैदा कर दिया। • विरासत संरक्षण के प्रयास: दामोदर अग्निहोत्री जैसे विशेषज्ञों ने सालों से इन वाद्य यंत्रों को अपने संग्रहालय में सहेज कर रखा था, जिससे इसे बनाने की विधि लुप्त नहीं हुई। इसी जमीनी संरक्षण के कारण आज इस वाद्य यंत्र को दोबारा लोगों के सामने लाना संभव हो पाया। सवाल-जवाब 1. फिल्म हनुमान अंश किस पर आधारित है? यह फिल्म प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु बाबा नीम करौली के जीवन पर आधारित है, जो दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हो रही है। 2. सुनील लोधी का कौन सा गाना सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है? सुनील लोधी का गाया हुआ प्रसिद्ध ट्रैक सॉन्ग 'मैंने तेरे ही भरोसे नैया जीवन में डर दई' इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जमकर वायरल हुआ है। 3. तंबूरा वाद्य यंत्र किस फल से बनाया जाता है? तंबूरा बनाने के लिए कद्दू जैसे दिखने वाले एक विशेष फल 'तूमा' का उपयोग किया जाता है, जिसे पहले सुखाया जाता है और फिर खोखला किया जाता है। 4. दामोदर अग्निहोत्री कौन हैं और बुंदेली वाद्य यंत्रों के संरक्षण में उनका क्या योगदान है? दामोदर अग्निहोत्री पिछले 35 वर्षों से बुंदेलखंड की संस्कृति के लिए काम कर रहे हैं। उनके संग्रहालय में 35 अलग-अलग प्रकार के बुंदेली वाद्य यंत्र सुरक्षित रखे गए हैं। 5. तंबूरा में तार और तूमा फल के बीच दूरी कैसे बनाई जाती है? तार को तूमा फल की सतह से लगभग एक इंच दूर रखने के लिए कारीगर तार के नीचे एक छोटा पत्थर या लकड़ी का टुकड़ा लगा देते हैं, जिससे सही कंपन पैदा होता है। प्रेरणा और सबक सुनील लोधी का सफर और तंबूरा वाद्य यंत्र का पुनरुद्धार हमें परंपरा और आधुनिक तकनीक के जुड़ाव से जुड़े कई महत्वपूर्ण सबक सिखाता है। • सादगी का महत्व: एक साधारण सूखे तूमा फल से सुरीला वाद्य यंत्र बनाना यह साबित करता है कि सच्ची कला महंगी चीजों की मोहताज नहीं होती। कलात्मक समर्पण हमेशा महंगे संसाधनों से अधिक मूल्यवान होता है। • सांस्कृतिक गौरव: अपनी क्षेत्रीय जड़ों और लोक परंपराओं को अपनाने से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सकती है। अपनी विरासत के प्रति वफादार रहना केवल आधुनिक रुझानों के पीछे भागने से कहीं अधिक गहरा प्रभाव छोड़ता है। • तकनीक का सही उपयोग: पारंपरिक कलाकार अपनी पूर्वजों की कला को साझा करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का प्रभावी उपयोग कर सकते हैं। आधुनिक सोशल मीडिया प्राचीन संस्कृतियों को संरक्षित करने और बढ़ावा देने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है। https://trendkia.com/culture/hanuman-ansh-philma-ke-gita-se-vayarala-hue-sunil-lodhi-janie-kaise-eka-kaddu-jaise-sukhe-phala-tuma-se-taiyara-hota-hai-unaka-sur-39307 TrendKia — Har trend, sabse pehle.