# हैदराबाद का धूलपेट हुआ सुनसान: बप्पा की विदाई के बाद खाली वर्कशॉप बयां कर रहे मूर्तिकारों की उदासी

> हैदराबाद के ऐतिहासिक धूलपेट इलाके में गणेश उत्सव के बाद सन्नाटा पसर गया है। छह महीनों तक मूर्तियों को तराशने वाले कारीगरों के वर्कशॉप अब खाली पड़े हैं और वे अगले साल का इंतजार कर रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** कल्चर · **Published:** 2026-09-17 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/culture/hyderabad-ka-dhoolpet-hua-sunsan-bappa-ki-vidai-ke-baad-khali-workshops-bayan-kar-rahe-murtikaron-ki-udasi-32918 · **Language:** Hindi
**Tags:** हैदराबाद, धूलपेट, गणेश विसर्जन, मूर्तिकार, गणेश उत्सव, स्थानीय कारीगर

हैदराबाद में गणेश विसर्जन के संपन्न होने के साथ ही पूरा शहर धीरे-धीरे अपनी पुरानी रफ्तार में लौट रहा है। लोग बप्पा को विदा कर अपने दैनिक कामकाज में व्यस्त हो गए हैं, लेकिन इस बीच शहर के ऐतिहासिक इलाके धूलपेट का नजारा पूरी तरह बदल चुका है। कभी चौबीसों घंटे हलचल से सराबोर रहने वाले इस इलाके में अब एक अजीब सी खामोशी छा गई है। कुछ दिनों पहले तक जहां हर गली और वर्कशॉप पर हथौड़े की गूंज, वेल्डिंग की चमक और रंगों की खुशबू बिखरी रहती थी, वहां अब केवल सूने शेड और पसरा हुआ सन्नाटा ही दिखाई दे रहा है।

धूलपेट के मूर्तिकार बेहद भारी मन से अपनी दुकानों और कार्यशालाओं से औजारों को समेट रहे हैं। उनका कहना है कि बप्पा के विसर्जन के बाद अचानक इस पूरे इलाके की रौनक गायब हो जाती है। महीनों तक जिस जगह पर पैर रखने की जगह नहीं होती थी, वहां अचानक इतना खालीपन देखना कलाकारों को भीतर से उदास कर देता है।

## छह महीनों की अनवरत मेहनत और कला साधना
धूलपेट में रहने वाले सैकड़ों परिवारों के लिए गणेश चतुर्थी केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह उनकी आजीविका का मुख्य साधन और उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा है। इस बड़े उत्सव की तैयारियां यहां त्योहार से लगभग छह महीने पहले ही शुरू हो जाती हैं। इन महीनों में धूलपेट के वर्कशॉप दिन-रात चालू रहते हैं और कारीगर पूरी लगन से मूर्तियों को आकार देने में जुट जाते हैं।

एक भव्य मूर्ति को तैयार करने की प्रक्रिया बेहद जटिल होती है। इसमें मिट्टी तैयार करना, प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) का मिश्रण बनाना, लोहे के मजबूत ढांचे तैयार करना, मोल्डिंग, वेल्डिंग और फिर बारीक नक्काशी करना शामिल है। इन सब में सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील काम होता है बप्पा की आंखें तैयार करना, जिसमें मूर्तिकार अपनी पूरी कलात्मकता झोंक देते हैं। इन छह महीनों के दौरान कारीगरों के लिए दिन और रात का अंतर पूरी तरह मिट जाता है।

## कलाकृति से पूजनीय प्रतिमा बनने का सफर
स्थानीय मूर्तिकारों के अनुसार, एक-एक मूर्ति को तैयार करने के पीछे उनका खून-पसीना और कई रातों की नींद छिपी होती है। जब तक ये मूर्तियां वर्कशॉप में तैयार होती रहती हैं, तक धूलपेट का माहौल एक अलग ही सकारात्मक ऊर्जा से भरा रहता है। देश-विदेश और दूर-दराज के क्षेत्रों से पूजा समितियों के आयोजक और श्रद्धालु यहां मूर्तियों की बुकिंग के लिए आते हैं, जिससे यहां हमेशा चहल-पहल बनी रहती है।

लेकिन उत्सव की शुरुआत होते ही यह नजारा बदल जाता है। जैसे ही मूर्तियां ट्रकों पर लादकर विसर्जन और पंडालों के लिए रवाना की जाती हैं, मूर्तिकारों का काम पूरा हो जाता है। कल तक जो मूर्तियां इन कलाकारों के हाथों की कला और कड़ी मेहनत का हिस्सा थीं, वे पंडालों में स्थापित होते ही लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बन जाती हैं।

## हर साल दोहराई जाने वाली सन्नाटे की कहानी
त्योहार के खत्म होते ही धूलपेट की रफ्तार अचानक थम सी जाती है। अब वर्कशॉप के भीतर केवल बिखरे हुए रंगों के डिब्बे, खाली बोरियां और शांत पड़े औजार ही नजर आते हैं। जो हाथ पिछले छह महीनों से लगातार मिट्टी को तराशने में व्यस्त थे, वे अब खाली हो चुके हैं। धूलपेट का यह खालीपन हर साल की एक तय कहानी है, जहां छह महीने की लगातार कठिन मेहनत और कुछ दिनों की भारी चहल-पहल के बाद, कारीगरों को अगले साल बप्पा के आगमन तक एक लंबा इंतजार करना पड़ता है।

## इसका आप पर असर
त्योहार के बाद का यह बदलाव उन पारंपरिक कारीगरों की मौसमी आर्थिक संवेदनशीलता को दर्शाता है जो अपनी वार्षिक आय के लिए पूरी तरह से एकल आयोजनों पर निर्भर हैं।

- **भारत में:** त्योहारी सीजन का अचानक समाप्त होना मौसमी शिल्पकारों के लिए साल भर के स्थायी रोजगार के अवसरों की आवश्यकता को रेखांकित करता है। वैकल्पिक शिल्पों को विकसित करने से साल के शेष महीनों में उनकी वित्तीय स्थिति को स्थिर करने में मदद मिल सकती है।
- **हैदराबाद में:** धूलपेट में स्थानीय अर्थव्यवस्था को भारी गिरावट का सामना करना पड़ता है क्योंकि यह व्यस्त व्यावसायिक केंद्र रातोंरात शांत हो जाता है। स्थानीय व्यवसायों और कच्चे माल के आपूर्तिकर्ताओं को अगला चक्र शुरू होने तक मांग में भारी कमी का सामना करना पड़ेगा।
- **कारीगरों के लिए सहायता:** उपभोक्ता गैर-त्योहारी सीजन के दौरान मिट्टी के अन्य उत्पाद और सजावटी सामान खरीदकर इन प्रतिभाशाली कलाकारों की मदद कर सकते हैं। खरीदारी की आदतों में यह छोटा सा बदलाव इन जरूरतमंद परिवारों को महत्वपूर्ण वित्तीय स्थिरता प्रदान कर सकता है।
- **विरासत का संरक्षण:** हैदराबाद के सांस्कृतिक ताने-बाने को बनाए रखने के लिए धूलपेट जैसे ऐतिहासिक शिल्प केंद्रों का अस्तित्व बचाए रखना बेहद जरूरी है। सामुदायिक पहल और सरकारी अनुदान इन पारंपरिक कला रूपों को जीवित रखने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
धूलपेट में पसरा यह सन्नाटा सीधे तौर पर धार्मिक त्योहारों पर आधारित अर्थव्यवस्था के अत्यधिक मौसमी होने का परिणाम है।

- **मौसमी मांग चक्र:** धूलपेट की कार्यशालाओं का पूरा बिजनेस मॉडल मुख्य रूप से केवल गणेश चतुर्थी पर आधारित होता है। त्योहार शुरू होने और मूर्तियों के पंडालों में भेजे जाने के बाद, इन बड़ी मूर्तियों की मांग तुरंत शून्य हो जाती है।
- **विविधीकरण की कमी:** इस ऐतिहासिक क्षेत्र के अधिकांश कारीगर रोजमर्रा के बर्तनों या सामान्य हस्तशिल्प के बजाय केवल बड़े पैमाने पर मूर्तियों के निर्माण में विशेषज्ञता रखते हैं। इस कारण गैर-त्योहारी सीजन में उनके कार्यस्थल खाली पड़े रहते हैं।
- **चक्रीय उत्पादन प्रक्रिया:** त्योहार की भारी मांग को पूरा करने के लिए छह महीने की निरंतर तैयारी की आवश्यकता होती है। यह गहन उत्पादन चरण समाप्त होने के बाद, कारीगरों को आराम करने, अपने खातों को संतुलित करने और अगले निवेश चक्र का इंतजार करने के लिए काम रोकना पड़ता है।

## सवाल-जवाब

### 1. धूलपेट कहां स्थित है और यह किसलिए प्रसिद्ध है?
धूलपेट हैदराबाद का एक ऐतिहासिक इलाका है जो गणेश चतुर्थी के लिए विशाल और सुंदर मूर्तियों को बनाने वाले कुशल कारीगरों के लिए प्रसिद्ध है।

### 2. धूलपेट में मूर्ति बनाने की प्रक्रिया में कितना समय लगता है?
मूर्तियों को तैयार करने और उन्हें आकार देने की प्रक्रिया गणेश चतुर्थी के त्योहार से लगभग छह महीने पहले शुरू हो जाती है।

### 3. मूर्तियां बनाने के लिए कारीगर किन सामग्रियों का उपयोग करते हैं?
कारीगर विस्तृत मूर्तियों को ढालने, वेल्ड करने और तराशने के लिए कच्ची मिट्टी, प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP), लोहे के फ्रेम और रंगों का उपयोग करते हैं।

### 4. गणेश विसर्जन के बाद इन वर्कशॉप का क्या होता है?
वर्कशॉप पूरी तरह से खाली और शांत हो जाते हैं, जहां केवल खाली रंगों के डिब्बे और शांत औजार बचते हैं और कारीगर अगले साल का इंतजार करने लगते हैं।

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