# हैदराबाद के गोशामहल में विशाखापट्टनम के कारीगर नारियल के पत्तों से बना रहे पर्यावरण के अनुकूल हस्तशिल्प

> हैदराबाद के गोशामहल इलाके में आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम से आए परिवार पिछले 15 सालों से नारियल के हरे पत्तों और बांस से पर्यावरण-अनुकूल टोकरियां, चटाइयां और सजावटी वस्तुएं बनाकर आजीविका चला रहे हैं.

**Type:** article · **Category:** कल्चर · **Published:** 2026-09-02 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/culture/hyderabad-ke-goshamahal-men-visakhapatnam-ke-karigara-nariyala-ke-patton-se-bana-rahe-paryavarana-ke-anukula-hastashilpa-26254 · **Language:** Hindi
**Tags:** हैदराबाद न्यूज़, गोशामहल, हस्तशिल्प, नारियल के पत्ते, पर्यावरण अनुकूल, विशाखापट्टनम, तेलंगाना

तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में पुराने शहर के गोशामहल स्थित एग्जिबिशन ग्राउंड की नजदीकी गलियों में हस्तशिल्प की एक अनूठी परंपरा बनी हुई है. आधुनिक समय की भागदौड़ के बीच आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम से आए कई परिवार सड़क किनारे बैठकर अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं. ये कारीगर नारियल के ताजे हरे पत्तों और बांस की पतली खपच्चियों का उपयोग करके सुंदर टोकरियां, मजबूत चटाइयां, पारंपरिक वस्तुएं और सजावटी उत्पाद तैयार करते हैं. पिछले 15 वर्षों से हैदराबाद को अपना ठिकाना बना चुके इन परिवारों के जीवन का मुख्य आधार नारियल के पत्ते और उनकी यह पारंपरिक कला ही है.

## 15 साल का सफर और पारिवारिक सहयोग
इन कारीगर परिवारों के लिए यह काम केवल समय बिताने का साधन नहीं बल्कि परिवार के पालन-पोषण का इकलौता जरिया है. घर के बुजुर्गों से लेकर महिलाएं और युवा पीढ़ी के सदस्य मिलकर हर सुबह काम में जुट जाते हैं. सुबह से शाम तक पत्तियों को छीलने, उन्हें व्यवस्थित तरीके से तराशने और अलग-अलग आकारों में बुनने का काम सामूहिक रूप से किया जाता है. हाथ के पारंपरिक औजारों और बरसों के अनुभव के बल पर ये लोग साधारण पत्तों को टिकाऊ और कलात्मक वस्तुओं में बदल देते हैं.

## उत्पादों को तैयार करने में लगने वाला समय और मेहनत
कारीगरों के अनुसार किसी साधारण वस्तु या छोटी टोकरी को तैयार करने में करीब दो से तीन घंटे की कड़ी मेहनत लगती है. वहीं अगर शादी-ब्याह या बड़े आयोजनों के लिए कोई जटिल सजावटी ढांचा बनाना हो, तो उसमें पूरा दिन लग जाता है. इन कारीगरों की उंगलियों की सफाई और पारंपरिक कारीगरी के कारण इन प्राकृतिक उत्पादों में खास मजबूती और निखार देखने को मिलता है.

## प्लास्टिक के दौर में प्राकृतिक विकल्प की अहमियत
आजकल विभिन्न समारोहों और त्योहारों में थर्माकोल व प्लास्टिक की सजावट का चलन काफी बढ़ गया है. इसके बावजूद पारंपरिक कला में लगे इन कारीगरों का भरोसा डगमगाया नहीं है. उनका मानना है कि कृत्रिम सजावट की तुलना में प्राकृतिक पत्तियों से बनी वस्तुओं की सुंदरता और ताजगी अलग ही नजर आती है. धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और शुभ कार्यों में लोग आज भी इको-फ्रेंडली यानी पर्यावरण के अनुकूल प्राकृतिक वस्तुओं को प्राथमिकता देते हैं. कठिन परिश्रम और सीमित साधनों के बाद भी ये लोग अपनी कला से संतुष्ट हैं. स्थानीय स्तर पर ऐसी हस्तकला को प्रोत्साहन मिलने से न केवल पर्यावरण संरक्षण को मदद मिलेगी, बल्कि प्लास्टिक मुक्त वातावरण तैयार करने की दिशा में भी बड़ा योगदान मिलेगा.

## इसका आप पर असर
यह समाचार पारंपरिक दस्तकारी को प्रोत्साहन देने और रोजमर्रा की जिंदगी में प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करने का सीधा संदेश देता है.

- **भारत में:** पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों का बढ़ता इस्तेमाल समाज को प्लास्टिक मुक्त बनाने में मदद करता है. इससे पारंपरिक कला से जुड़े छोटे कारीगरों की आजीविका को सीधा सहारा मिलता है.
- **हैदराबाद और तेलंगाना में:** गोशामहल के कारीगरों से स्थानीय लोग पूजा और उत्सवों के लिए पर्यावरण-अनुकूल सामान खरीद सकते हैं. इससे क्षेत्र में कचरा कम होता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है.

## सवाल-जवाब

### 1. हैदराबाद में नारियल के पत्तों का हस्तशिल्प कहाँ तैयार किया जाता है?
यह हस्तशिल्प हैदराबाद के पुराने शहर में स्थित गोशामहल एग्जिबिशन ग्राउंड की नजदीकी गलियों में तैयार किया जाता है.

### 2. यह काम करने वाले कारीगर मूल रूप से कहाँ के रहने वाले हैं?
ये कारीगर मूल रूप से आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम जिले के रहने वाले हैं.

### 3. इन कारीगरों को हैदराबाद में रहते हुए कितना समय हो चुका है?
ये कारीगर पिछले 15 सालों से हैदराबाद में रहकर अपनी आजीविका चला रहे हैं.

### 4. एक छोटी टोकरी या साधारण सामान बनाने में कितना समय लगता है?
किसी साधारण वस्तु या छोटी टोकरी को तैयार करने में लगभग दो से तीन घंटे का समय लगता है.

### 5. नारियल के पत्तों के अलावा कारीगर किस सामग्री का उपयोग करते हैं?
नारियल के ताजे पत्तों के अलावा कारीगर बांस की खपच्चियों का उपयोग करते हैं.

## प्रेरणा और सबक
प्लास्टिक और थर्माकोल के दौर में भी इन कारीगरों की निष्ठा और मेहनत से कई महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं.

- **परंपरा और हुनर पर विश्वास:** आधुनिक दौर में प्लास्टिक की प्रतिस्पर्धा के बावजूद कारीगर अपनी पारंपरिक कला पर भरोसा कायम रखते हैं.
- **पारिवारिक सामंजस्य और सहयोग:** परिवार का हर सदस्य अपनी जिम्मेदारी निभाकर काम को समय पर पूरा करता है.
- **गुणवत्ता और प्राकृतिक सुंदरता:** कृत्रिम विकल्पों के बजाय प्राकृतिक और टिकाऊ उत्पादों को प्राथमिकता देना ही उनकी कला की असली पहचान है.

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