# इंटरनेट पर महिलाओं के खिलाफ धार्मिक चोले में बढ़ता डिजिटल उत्पीड़न और मैनॉस्फियर का दखल

> सोशल मीडिया पर आस्था और नैतिकता का हवाला देकर महिलाओं को निशाना बनाने वाला एक नया डिजिटल नेटवर्क तेजी से सक्रिय हो रहा है। शोध रिपोर्टों के अनुसार, पश्चिमी विचारधारा और स्थानीय चिंताओं को मिलाकर महिला यूजर्स को इनबॉक्स और टिप्पणियों में डराया-धमकाया जा रहा है।

**Type:** article · **Category:** कल्चर · **Published:** 2026-10-11 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/culture/intaraneta-para-mahilaon-ke-khilapha-dharmika-chole-men-barhata-dijitala-utpirana-aura-manosphere-ka-dakhala-46421 · **Language:** Hindi
**Tags:** मैनॉस्फियर, डिजिटल उत्पीड़न, सोशल मीडिया, महिला सुरक्षा, साइबर बुलिंग, रेड पिल

डिजिटल दुनिया में सक्रिय महिलाओं के लिए सोशल मीडिया अक्सर एक खुला मोर्चा बन जाता है, जहाँ उन्हें अपनी पहचान और अभिव्यक्ति के बदले अनचाही नसीहतों और धमकियों का सामना करना पड़ता है। सोशल मीडिया पर एक बड़े ग्रुप का संचालन करने वाली मरियम बताती हैं कि एडमिन की जिम्मेदारी संभालते ही उन्हें लगातार दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ा। उनके अनुसार, संदेश भेजने वाले या तो धर्म और पर्दे की आड़ में उपदेश देने की कोशिश करते हैं या फिर अश्लील संदेश भेजकर प्रताड़ित करते हैं। कई बार ये दोनों चीजें एक साथ देखने को मिलती हैं। एक साल से भी अधिक समय तक इस समूह को चलाने के दौरान, महिलाओं के लिए बने इस मंच पर बड़ी संख्या में पुरुषों ने अनचाहे संदेश भेजे, जिनमें यह फरमान जारी किया गया कि महिलाओं को किस तरह के कपड़े पहनने चाहिए, मेकअप नहीं लगाना चाहिए, अपनी आवाज धीमी रखनी चाहिए और यहाँ तक कि हाथों में दस्ताने पहनने चाहिए ताकि त्वचा का कोई भी हिस्सा नजर न आए। इस लगातार दखलअंदाजी ने उनकी मानसिक शांति को बुरी तरह प्रभावित किया।

## धार्मिक आवरण में पुरुषवादी असंतोष का नया रूप
इंटरनेट पर महिलाओं का उत्पीड़न कोई नई बात नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में इसने एक अलग रंग ले लिया है, जहाँ पुरुषवादी वर्चस्व की विचारधारा को आस्था और धर्म का आवरण पहनाया जा रहा है। व्यापक स्तर पर मैनॉस्फियर की बुनियाद पुरुषों की शिकायतों और नारीवाद के कड़े विरोध पर टिकी है। इसके भीतर इंसेल, पिक-अप आर्टिस्ट, पुरुष अधिकार कार्यकर्ता और रेड पिल विचारधारा को मानने वाले कई उप-समूह मौजूद हैं। इन समूहों की आंतरिक संरचनाओं में भले ही बारीक अंतर हों, लेकिन उनका मूल विचार एक ही धुरी पर घूमता है कि नारीवादी आंदोलनों ने समाज के ताने-बाने को नुकसान पहुंचाया है, महिलाओं को जरूरत से ज्यादा ताकत मिल गई है और पुरुषों को दोबारा अपना नियंत्रण स्थापित करना होगा। इसी सोच को जब आस्था और धार्मिक शब्दावली के साथ पेश किया जाता है, तो यह महिलाओं के दैनिक जीवन और पहनावे पर निगरानी रखने का माध्यम बन जाती है।

## अरबी भाषा में डिजिटल प्रभावशाली चेहरों का बढ़ता दायरा
यूट्यूब चैनल हकी नसवी की निर्माता और शोधकर्ता सारा कद्दूरा ने अरबी भाषी मैनॉस्फियर पर साल 2025 में एक विस्तृत अध्ययन किया। इस रिपोर्ट में उन्होंने बताया कि कैसे कुछ प्रभावशाली लोग अपने विचारों को रिश्तों की सलाह के रूप में पेश करते हैं। इनमें जॉर्डन के कोच करीम या रेड पिल अरेबिक के नाम से सक्रिय करीम अत्ताई जैसे नाम शामिल हैं। उनके वीडियो स्त्री-पुरुष संबंधों को आपसी समझ के बजाय वर्चस्व और सत्ता की होड़ के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इन सामग्रियों में महिलाओं को नियंत्रित करने या यौन अस्वीकृति के बदले हिंसा को अनुशासन के रूप में उचित ठहराने जैसी बातें कही जाती हैं। अरबी मैनॉस्फियर केवल पश्चिमी विचारों का अनुवाद नहीं करता, बल्कि वह इसे स्थानीय सामाजिक परिस्थितियों, धार्मिक पहचान, मर्दानगी, विवाह, आर्थिक अनिश्चितता और सामाजिक बदलावों से जोड़कर नए रूप में ढालता है। जब युवा आर्थिक असुरक्षा या राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे होते हैं, तब महिलाओं और नारीवाद को उनकी समस्याओं का कारण बताकर निशाना बनाया जाता है।

## दावा ब्रदर्स और सड़कों पर होने वाली बहसों का डिजिटल असर
ब्रिटेन में सक्रिय यूट्यूबर अली दावा जैसे प्रभावशाली चेहरे भी इसी तरह की सामग्री तैयार करते हैं, जिनके वीडियो में सड़कों पर होने वाली बहसें, रिश्तों पर टिप्पणियां और पश्चिमी संस्कृति का विरोध प्रमुखता से दिखता है। अपने वीडियो में वे खुलेआम स्वीकार करते हैं कि वे मुस्लिम फेमिनिस्ट्स को कड़ा नापसंद करते हैं। कई वीडियो में वे सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के पास जाकर उनके पहनावे पर सवाल उठाते हैं और उसे अनुचित ठहराते हैं। अरबी भाषा में दावा शब्द का अर्थ किसी को इस्लाम के बारे में जानने का निमंत्रण देना होता है, लेकिन इंटरनेट पर इन्हें दावा ब्रदर्स के नाम से जाना जाता है और इनका तरीका शांतिपूर्ण संवाद के बजाय अक्सर बेहद आक्रामक होता है। यह 1990 के दशक में मिस्र और सऊदी अरब के टेलीविजन चैनलों पर आने वाले उन मुफ्ती या विद्वानों से काफी अलग है, जो दर्शकों के फोन कॉल्स पर सवालों के जवाब देते थे। आज के डिजिटल दौर में ये इन्फ्लुएंसर्स तय समय के प्रसारणों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे चौबीसों घंटे बिना किसी मध्यस्थता के लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचाते हैं।

## आंकड़ों में उजागर होती दोहरी मानसिकता
सार्वजनिक रूप से सक्रिय महिलाओं के लिए यह माहौल केवल वीडियो या पॉडकास्ट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह उनके निजी इनबॉक्स और कमेंट बॉक्स में भी फैल जाता है। साल 2026 में इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक डायलॉग द्वारा जारी एक रिपोर्ट में जॉर्डन के इंस्टाग्राम पर 40 जानी-मानी हस्तियों और प्रभावशाली लोगों को मिले लगभग 14,000 कमेंट्स का 12 महीने तक विश्लेषण किया गया। इस अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि नफरती भाषण, उत्पीड़न और अभद्र भाषा वाले कमेंट्स में से 72 फीसदी केवल महिलाओं को निशाना बनाकर किए गए थे। इनमें से 11 प्रतिशत टिप्पणियां धार्मिक या नैतिक उत्पीड़न की श्रेणी में रखी गईं, और इस श्रेणी के 85 प्रतिशत हमले महिला इन्फ्लुएंसर्स पर केंद्रित थे। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि यौन उत्पीड़न से जुड़े सभी कमेंट्स महिलाओं के लिए थे। यह इंटरनेट पर महिलाओं की निगरानी के दोहरे चरित्र को उजागर करता है, जहाँ एक तरफ महिलाओं को अदृश्य होने और पर्दा करने का उपदेश दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ उन्हें लगातार यौन उत्पीड़न और अवांछित ध्यान का शिकार बनाया जाता है।

## एल्गोरिदम की भूमिका और जवाबदेही का अभाव
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर एंगेजमेंट बढ़ाने वाले एल्गोरिदम अक्सर भड़काऊ और ध्रुवीकरण करने वाली सामग्री को बढ़ावा देते हैं। जब कोई वीडियो पुरुषों के अकेलेपन या आर्थिक तंगी के लिए महिलाओं को जिम्मेदार ठहराता है, तो उस पर भारी प्रतिक्रियाएं आती हैं। समर्थक, आलोचक और खुद महिलाएं इस पर प्रतिक्रिया देती हैं, जिससे उस पोस्ट की पहुंच कई गुना बढ़ जाती है। जब इस पूरी बहस में व्यक्तिगत विचारों को मजहबी आदेश बनाकर पेश किया जाता है, तो किसी भी असहमति को धर्मविरोधी ठहरा दिया जाता है। इस प्रक्रिया में आम यूजर्स केवल वीडियो देखने वाले दर्शक से बदलकर महिलाओं के कमेंट सेक्शन में नैतिक पहरेदार बन जाते हैं। इस विषय पर पक्ष जानने के लिए अली दावा और करीम अत्ताई से संपर्क साधा गया था, लेकिन इस संबंध में उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला।

## इसका आप पर असर
सोशल मीडिया पर सक्रिय महिला यूजर्स के लिए यह प्रवृत्ति सीधे तौर पर मानसिक तनाव, डिजिटल स्पेस में सीमित भागीदारी और व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है।

- **डिजिटल सुरक्षा पर असर:** इंटरनेट पर सार्वजनिक रूप से विचार रखने या कम्युनिटी चलाने वाली महिलाओं के इनबॉक्स और कमेंट बॉक्स में अनचाहे संदेशों की बाढ़ आ जाती है। इसके चलते कई यूजर्स को अपने अकाउंट प्राइवेट करने या सोशल मीडिया से दूरी बनाने पर मजबूर होना पड़ता है।
- **मानसिक सेहत पर प्रभाव:** लगातार मिलने वाले उपदेशों और अश्लील धमकियों का सीधा असर व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य और काम करने की क्षमता पर पड़ता है। इससे रोजमर्रा के ऑनलाइन संवाद में डर और असुरक्षा का माहौल बन जाता है।
- **कंटेंट मॉडरेशन की चुनौती:** प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम भड़काऊ और नफरती कंटेंट को ज्यादा व्यूज देते हैं जिससे ऐसे मामलों पर तुरंत रोक लगाना मुश्किल हो जाता है। उपयोगकर्ताओं को अनचाहे संदेशों से बचने के लिए सख्त प्राइवेसी सेटिंग्स और फिल्टर का सहारा लेना पड़ता है।
- **दोहरे मानदंडों का शिकार:** धर्म और नैतिकता के नाम पर महिलाओं के पहनावे पर टिप्पणी करने वाले समूह खुद यौन उत्पीड़न में शामिल पाए जाते हैं। यह स्थिति महिलाओं के लिए ऑनलाइन दुनिया को अत्यधिक असुरक्षित और पक्षपाती बना देती है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह घटनाक्रम पारंपरिक पुरुषवादी असंतोष, पश्चिमी डिजिटल उप-संस्कृतियों और स्थानीय धार्मिक व सामाजिक बदलावों के आपसी गठजोड़ के कारण सामने आया है। एल्गोरिदम-आधारित सोशल मीडिया मंचों ने इस तरह की भड़काऊ सामग्री को ज्यादा दर्शकों तक पहुंचाने में उत्प्रेरक का काम किया है।

- **आस्था के साथ विचारधारा का मेल:** पश्चिमी रेड पिल और पुरुष अधिकार आंदोलनों के विचारों को धार्मिक शब्दावली में ढालकर स्थानीय समाज में स्वीकार्य बनाया गया। जब व्यक्तिगत राय को धर्म का चोला पहनाया गया, तो असहमति जताने वाली महिलाओं को आस्था का विरोधी बताकर निशाना बनाना आसान हो गया।
- **सामाजिक और आर्थिक असुरक्षा:** युवाओं में नौकरी, विवाह और सामाजिक बदलावों को लेकर फैली बेचैनी को इन प्रभावशाली चेहरों ने भुनाया। बेरोजगारी और अकेलेपन जैसी वास्तविक समस्याओं का ठीकरा महिलाओं की आजादी और नारीवाद पर फोड़कर जनता का समर्थन जुटाया गया।
- **एंगेजमेंट आधारित प्लेटफॉर्म्स:** सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का तकनीकी ढांचा ध्रुवीकरण और विवाद पैदा करने वाले वीडियो को ज्यादा प्रमोट करता है। समर्थक और आलोचक दोनों के रिएक्शन मिलने से इन पोस्ट्स की रीच तेजी से बढ़ी और संदेश आम यूजर्स तक पहुंचे।

## सवाल-जवाब

### 1. मुस्लिम मैनॉस्फियर क्या है?
यह सोशल मीडिया पर सक्रिय पुरुषों का ऐसा नेटवर्क है जो पुरुषवादी और नारीवाद-विरोधी विचारों को धार्मिक मान्यताओं और भाषा के साथ जोड़कर पेश करता है।

### 2. दावा ब्रदर्स किन्हें कहा जाता है?
यह शब्द उन इंटरनेट इन्फ्लुएंसर्स के लिए इस्तेमाल होता है जो सड़कों पर बहस या वीडियो के जरिए धार्मिक उपदेश देते हैं और महिलाओं के पहनावे पर आक्रामक सवाल उठाते हैं।

### 3. इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक डायलॉग के 2026 के अध्ययन में क्या सामने आया?
अध्ययन में पाया गया कि जॉर्डन के इंस्टाग्राम पर हुए अभद्र कमेंट्स में 72 फीसदी महिलाओं पर थे और सभी सेक्शुअल हैरेसमेंट कमेंट्स महिला हस्तियों को मिले थे।

### 4. सोशल मीडिया एल्गोरिदम इस समस्या को कैसे बढ़ाते हैं?
एल्गोरिदम विवाद और नफरत पैदा करने वाले वीडियो पर होने वाली बहस और प्रतिक्रियाओं को बढ़ावा देते हैं, जिससे ऐसे वीडियो ज्यादा लोगों तक पहुंचते हैं।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._