जब घंटी की आवाज से ही पता चल जाता था ऊंट-बैल किसका है, राजस्थान की यह देसी पहचान प्रणाली जानिए डिजिटल टैग और GPS से पहले राजस्थान के गांवों में पशुओं की पहचान उनके गले में बंधी घंटियों की अलग-अलग धुन से होती थी। जानिए यह परंपरा कैसे काम करती थी और आज इसकी विरासत कहां देखी जा सकती है। जोधपुर सहित राजस्थान के गांवों में कभी पशुओं की पहचान के लिए न कोई डिजिटल टैग होता था, न सैटेलाइट से जुड़ा कोई सिस्टम। ऊंट, गाय, बैल, भेड़ और बकरियों के गले में बंधी घंटियों की आवाज ही उनकी असली पहचान होती थी। हर घंटी की धुन इतनी अलग होती थी कि पशुपालक कई किलोमीटर दूर से भी बता देते थे कि आ रहा झुंड किस मालिक का है और उसमें कौन सा पशु शामिल है। यह सुविधा भर नहीं थी, राजस्थान की लोक संस्कृति का जीवंत हिस्सा भी थी। हर घंटी की अपनी अलग धुन गांव के कारीगर इन घंटियों को बड़ी मेहनत से तैयार करते थे। घंटी का आकार, वजन और उसमें इस्तेमाल होने वाली धातु इस तरह तय की जाती थी कि उसकी आवाज बाकी पशुओं की घंटियों से अलग सुनाई दे। ऊंटों के गले में बड़ी और गहरी गूंज वाली घंटियां बांधी जाती थीं, जबकि गाय, बैल, भेड़ और बकरियों के लिए छोटे आकार की अलग-अलग घंटियां बनती थीं। इसी फर्क की वजह से दूर से आती आवाज सुनकर ही समझ आ जाता था कि कौन सा पशु है। आवाज से रखते थे झुंड पर नजर पशुपालकों के लिए ये घंटियां किसी अलार्म से कम नहीं थीं। घंटी की टन-टन सुनकर वे अपने पशुओं की हर हरकत पर नजर रख पाते थे। अगर कोई पशु चरते-चरते झुंड से बिछड़ जाता, तो उसे ढूंढने के लिए इधर-उधर भटकने की जरूरत नहीं पड़ती थी, बस घंटी की आवाज पर कान लगाना होता था और पशु आसानी से मिल जाता था। गांव की सुबह-शाम में घुली धुन राजस्थान के गांवों में सुबह से शाम तक चरागाहों से आती इन घंटियों की आवाज माहौल में घुली रहती थी। यह आवाज सिर्फ पशुपालन को आसान नहीं बनाती थी, बल्कि गांव के रोजमर्रा के जीवन में एक तरह का संगीत भी भर देती थी। यही वजह है कि इन घंटियों को महज एक उपयोगी चीज नहीं, बल्कि लोक शिल्प और सांस्कृतिक विरासत की निशानी माना जाता है। तकनीक आई, लेकिन विरासत बाकी है समय बदला और डिजिटल टैग जैसी आधुनिक तकनीकों ने इन पारंपरिक घंटियों की जगह ले ली, लेकिन इनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अहमियत आज भी उतनी ही बनी हुई है। राजस्थान के कई संग्रहालयों और लोक विरासत केंद्रों में इन घंटियों को संभालकर रखा गया है। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक इन्हें देखकर उस दौर की जीवनशैली और पशुपालन की इस अनोखी परंपरा को करीब से समझते हैं। ये घंटियां आज भी यही बताती हैं कि राजस्थान की लोक संस्कृति सिर्फ इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं है, बल्कि एक ऐसी अमूल्य धरोहर है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक सहेजकर रखना जरूरी है। इसका आप पर असर • भारत में: यह परंपरा याद दिलाती है कि डिजिटल तकनीक आने से पहले भी पशुपालन को आसान बनाने वाली समझदारी भरी देसी व्यवस्थाएं मौजूद थीं, जिन्हें लोक विरासत के तौर पर संजोने की जरूरत है। • राजस्थान में: जोधपुर सहित राजस्थान के संग्रहालयों और लोक विरासत केंद्रों में रखी ये घंटियां पर्यटकों को आकर्षित करती हैं, जिससे स्थानीय पर्यटन को फायदा मिलता है। सवाल-जवाब 1. पहले राजस्थान के गांवों में पशुओं की पहचान कैसे होती थी? डिजिटल टैग और GPS की जगह ऊंट, गाय, बैल, भेड़ और बकरियों के गले में बंधी घंटियों की अलग-अलग आवाज से उनकी पहचान होती थी। 2. क्या हर पशु के लिए एक जैसी घंटी इस्तेमाल होती थी? नहीं, ऊंटों के लिए बड़ी और गूंजदार घंटियां बनती थीं, जबकि गाय, बैल, भेड़ और बकरियों के लिए अलग-अलग आकार की छोटी घंटियां तैयार की जाती थीं। 3. घंटियों की आवाज कितनी दूर से पहचानी जा सकती थी? इनकी आवाज इतनी विशिष्ट होती थी कि पशुपालक कई किलोमीटर दूर से ही समझ जाते थे कि कौन-सा पशु और किस मालिक का झुंड आ रहा है। 4. अगर कोई पशु झुंड से बिछड़ जाए तो क्या होता था? पशुपालक उसकी घंटी की आवाज सुनकर उसे आसानी से ढूंढ लेते थे, इसके लिए इधर-उधर भटकने की जरूरत नहीं पड़ती थी। 5. ये घंटियां कौन बनाता था? स्थानीय कारीगर इन घंटियों को बड़ी बारीकी से तैयार करते थे और आकार, वजन व धातु ऐसे चुनते थे कि हर घंटी की आवाज अलग हो। 6. आज ये पारंपरिक घंटियां कहां देखी जा सकती हैं? राजस्थान के कई संग्रहालयों और लोक विरासत केंद्रों में इन्हें सुरक्षित रखा गया है, जहां देश-विदेश के पर्यटक इन्हें देखने आते हैं। https://trendkia.com/culture/jaba-ghnti-ki-avaja-se-hi-pata-chala-jata-tha-unta-baila-kisaka-hai-rajasthan-ki-yaha-desi-pahachana-pranali-janie-4149 TrendKia — Har trend, sabse pehle.