# जमुई का 70 साल पुराना अनोखा घर, जिसमें बिना सीमेंट और लोहे की छड़ों के हुई पारंपरिक कारीगरी

> जमुई में सात दशक पहले बना एक पारंपरिक मकान आज भी मजबूती से टिका है, जिसके निर्माण में सीमेंट के बजाय चूना, सूरती और छोआ का विशेष मिश्रण इस्तेमाल किया गया था।

**Type:** article · **Category:** कल्चर · **Published:** 2026-09-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/culture/jamui-ka-70-sala-purana-anokha-ghara-jisamen-bina-simenta-aura-lohe-ki-chharon-ke-hui-parnparika-karigari-27175 · **Language:** Hindi
**Tags:** जमुई, पारंपरिक निर्माण, बिना सीमेंट का घर, अनिल कुमार, चूना सूरती छोआ, जमींदार हवेली, प्राचीन वास्तुकला

आधुनिक समय में किसी भी नए मकान का निर्माण शुरू होते ही सीमेंट, सरिया, गिट्टी, बालू और आधुनिक मशीनों की प्राथमिकता तय हो जाती है। निर्माण कार्य शुरू करने से पहले इंजीनियर विस्तृत नक्शा बनाते हैं, जिसके बाद भारी मशीनों की मदद से बहुत कम समय के भीतर मजबूत दीवारें और कंक्रीट की छत ढाल दी जाती हैं। इसके विपरीत, बिहार के जमुई क्षेत्र में एक ऐसा ऐतिहासिक मकान मौजूद है जिसे देखकर नई पीढ़ी के लोग और राहगीर हैरान रह जाते हैं। लगभग सात दशक पहले बनकर तैयार हुआ यह पुराना घर आज भी अपनी पूरी मजबूती के साथ खड़ा है। इस निर्माण की सबसे खास बात यह है कि उस दौर में इसके निर्माण में आधुनिक सीमेंट का एक भी दाना इस्तेमाल नहीं किया गया था। उस समय न तो आज जैसी उन्नत ढलाई की तकनीक उपलब्ध थी और न ही लोहे के जाल का सहारा लिया गया था। इसके बावजूद, दशकों के मौसमी बदलावों, तेज धूप और भारी बारिश के थपेड़ों को झेलते हुए यह घर आज भी बहुत बेहतर अवस्था में कायम है। इस जमींदार परिवार के सदस्य अनिल कुमार बताते हैं कि उस जमाने में किसी मकान का निर्माण करना महज एक बुनियादी जरूरत नहीं, बल्कि अपने आप में एक उत्कृष्ट कारीगरी और कला का प्रदर्शन होता था।

 

## पारंपरिक निर्माण शैली की झलक और गांव में ईंट बनाने की प्रक्रिया
 अनिल कुमार के अनुसार, करीब सत्तर साल पहले के दौर में ग्रामीण इलाकों में ज्यादातर मकान मिट्टी से बने कच्चे घर हुआ करते थे। उस समय पक्के और टिकाऊ मकान बनवाना केवल समृद्ध जमींदार परिवारों के बस की बात होती थी। उन दिनों मकान बनाने के लिए ईंटें भी किसी बाहरी बाजार या दूर-दराज के भट्ठों से खरीदकर नहीं मंगवाई जाती थीं। निर्माण स्थल के पास ही गांव में स्थानीय रूप से ईंटें तैयार की जाती थीं। मिट्टी को सांचों में ढालकर ईंटें बनाने के बाद उन्हें पकाने के लिए लकड़ी जलाकर पारंपरिक भट्ठे तैयार किए जाते थे। लकड़ी की आंच में पककर तैयार हुई ईंटें अत्यधिक टिकाऊ और मजबूत होती थीं। दीवारों की चुनाई के लिए आज के आधुनिक सीमेंट के गारे के बजाय चूना और सूरती के मिश्रण से तैयार किए गए विशेष गारे का प्रयोग किया जाता था। इस चुनाई के लिए चूना बाजार से खरीदा जाता था, जबकि सूरती का निर्माण घर पर ही किया जाता था। पुरानी और टूटी हुई ईंटों को बारीक पीसकर उसका डस्ट तैयार किया जाता था, जिसे स्थानीय भाषा में सूरती कहा जाता था।

 

## चूना, सूरती और छोआ के अनूठे मिश्रण से गारे का निर्माण
 ईंटों को आपस में जोड़ने वाले गारे की ताकत बढ़ाने के लिए उसमें एक और पारंपरिक जैविक घटक मिलाया जाता था। गन्ने से गुड़ तैयार करने की प्रक्रिया के दौरान जो चिपचिपा अपशिष्ट पदार्थ बचता है, उसे छोआ कहा जाता है। कारीगर चूना, बारीक सूरती और गन्ने के छोआ को एक निश्चित अनुपात में मिलाकर बहुत अच्छी तरह से गूंथते थे, जिससे एक अत्यंत मजबूत और चिपचिपा गारा बनकर तैयार होता था। यही जैविक और पारंपरिक गारा ईंटों की चुनाई से लेकर पूरे मकान के विभिन्न हिस्सों को जोड़ने और प्लास्टर करने में काम आता था। अनिल कुमार बताते हैं कि उस दौर में काम करने वाले मिस्त्री केवल साधारण दिहाड़ी मजदूर नहीं होते थे, बल्कि वे पारंपरिक स्थापत्य कला और निर्माण तकनीक के संपूर्ण जानकार हुआ करते थे। जमींदार परिवारों में ऐसे हुनरमंद मिस्त्रियों और मजदूरों को सालाना अनुबंध पर रखा जाता था। ये कारीगर पूरे साल परिवार के मकानों का निर्माण करते थे और समय-समय पर उनकी देखभाल तथा मरम्मत का जिम्मा भी संभालते थे।

 

## बरगा और टाली के सहयोग से पारंपरिक छत ढलाई की कला
 उस युग में छत बनाने की प्रक्रिया आधुनिक कंक्रीट ढलाई से पूरी तरह भिन्न और अत्यंत दिलचस्प होती थी। आज के दौर की तरह लोहे के सरियों का जाल बांधकर सीमेंट और गिट्टी की ढलाई करने की कोई व्यवस्था उस समय नहीं थी। छत का ढांचा तैयार करने के लिए सबसे पहले लोहे या मजबूत लकड़ी के बीम स्थापित किए जाते थे, जिन्हें स्थानीय तकनीकी भाषा में बरगा कहा जाता था। इन बरगों के ऊपर बड़े आकार की विशेष ईंटों जैसी दिखने वाली टाली बिछाई जाती थी। एक के बाद एक टाली को क्रमबद्ध तरीके से रखकर छत का मुख्य आधार ढांचा तैयार कर लिया जाता था। इसके पश्चात, चूना, सूरती और गन्ने के छोआ से तैयार किया गया गाढ़ा गारा टाली के ऊपर फैलाया जाता था। गारा डालने के बाद मजदूर हाथों में लकड़ी के औजार लेकर कई दिनों तक उसकी लगातार कुटाई और पिटाई करते थे। इस कुटाई से गारे के भीतर की हवा बाहर निकल जाती थी और वह बेहद सघन तथा कठोर हो जाता था। इस प्रकार छत की ढलाई मशीनों के बजाय मिस्त्रियों और मजदूरों के शारीरिक श्रम एवं हाथों के हुनर से पूरी की जाती थी।

 

## सात दशकों बाद भी मिस्त्रियों के हुनर की जीवित मिसाल
 उस दौर के निर्माण कार्य में किसी भी तरह की जल्दबाजी के स्थान पर केवल मजबूती, गुणवत्ता और स्थायित्व पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाता था। अनिल कुमार का कहना है कि लगभग सात दशक पूर्व बनकर तैयार हुआ उनका यह पैतृक मकान आज भी बहुत अच्छी हालत में टिका हुआ है। इस मकान की चौड़ी दीवारें और मजबूत छत उस जमाने के कारीगरों की अद्भुत कार्यकुशलता और ईमानदारी की कहानी बयान करती हैं। जमुई के गांव में खड़ा यह पुराना ढांचा केवल ईंटों और गारे का कोई साधारण जमावड़ा नहीं है, बल्कि यह उस दौर के अनुभवी मिस्त्रियों के ज्ञान, अटूट लगन और ऐसी विलुप्त होती पारंपरिक निर्माण तकनीक का प्रतीक है, जब आधुनिक संसाधन और मशीनें नहीं थीं, लेकिन निर्माण करने वाले कारीगरों के हाथों में बेजोड़ हुनर और समझ मौजूद थी।

## इसका आप पर असर
यह समाचार पारंपरिक और पर्यावरण-अनुकूल निर्माण तकनीकों की उपयोगिता को रेखांकित करता है।

- **भारत में:** यह मामला दिखाता है कि कैसे पारंपरिक निर्माण सामग्रियां सीमेंट और लोहे की बढ़ती लागत के बीच टिकाऊ विकल्प बन सकती हैं। इससे भविष्य में हरित और टिकाऊ भवन निर्माण को प्रोत्साहन मिलेगा।

- **जमुई में:** यह ऐतिहासिक मकान स्थानीय सांस्कृतिक पहचान और प्राचीन वास्तुकला की एक मिसाल पेश करता है। इससे क्षेत्र में पुरानी धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।

- **पर्यावरण संरक्षण:** चूने और छोआ जैसे प्राकृतिक अवयवों का उपयोग कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मददगार साबित होता है। भवन निर्माणकर्ता ऐसे जैविक तरीकों से आधुनिक पर्यावरण-अनुकूल घर डिजाइन कर सकते हैं।

- **भवन रखरखाव:** सालाना आधार पर मिस्त्रियों का रखरखाव मॉडल लंबी अवधि तक संरचनात्मक सुरक्षा सुनिश्चित करता है। लोग नियमित रखरखाव से अपने पुराने ढांचों की उम्र बढ़ा सकते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. यह 70 साल पुराना घर बिहार के किस स्थान पर स्थित है?
यह ऐतिहासिक मकान बिहार के जमुई क्षेत्र में स्थित है।

### 2. इस मकान के निर्माण में सीमेंट का इस्तेमाल क्यों नहीं हुआ था?
लगभग सात दशक पहले निर्माण के दौरान आधुनिक सीमेंट और सरिया उपलब्ध नहीं थे, इसलिए चूना और सूरती के पारंपरिक गारे का उपयोग किया गया।

### 3. ईंटें जोड़ने के लिए गारा किस चीज से तैयार किया जाता था?
गारा तैयार करने के लिए बाजार से लाए गए चूने, घर पर पीसी गई पुरानी ईंटों की सूरती और गन्ने के छोआ का मिश्रण बनाया जाता था।

### 4. सूर्ती और छोआ क्या होते हैं?
पुरानी ईंटों को बारीक पीसकर बनाया गया डस्ट सूरती कहलाता है, जबकि गन्ने से गुड़ बनाने के बाद बचा चिपचिपा अपशिष्ट छोआ कहलाता है।

### 5. इस घर की छत का निर्माण किस प्रकार किया गया था?
लोहे या लकड़ी के बीम (बरगा) पर टाली बिछाकर उसके ऊपर चूना-सूर्ती-छोआ का गारा डाला गया और मजदूरों द्वारा हाथों से कुटाई करके छत ढाली गई।

### 6. उस जमाने में मिस्त्रियों को किस आधार पर रखा जाता था?
जमींदार परिवारों में मिस्त्रियों और मजदूरों को सालाना अनुबंध पर रखा जाता था, जो निर्माण और रखरखाव का कार्य संभालते थे।

## प्रेरणा और सबक
जमुई का यह 70 साल पुराना घर टिकाऊ निर्माण और समर्पित कारीगरी के महत्वपूर्ण सबक देता है।

- **गति से अधिक स्थायित्व को प्राथमिकता:** निर्माण में जल्दबाजी के स्थान पर दीर्घकालिक मजबूती और गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए।

- **स्थानीय और प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान:** प्रकृति में मौजूद सामग्रियों का सही ज्ञान टिकाऊ संरचनाएं बना सकता है।

- **सतत देखभाल और रखरखाव:** संरचनाओं की लंबी उम्र के लिए नियमित रखरखाव और कुशल कारीगरों का मार्गदर्शन आवश्यक है।

- **पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण:** प्राचीन स्थापत्य कला की तकनीकों को आधुनिक वास्तुकला के साथ जोड़कर बेहतर निर्माण किया जा सकता है।

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