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  "type": "article",
  "title": "जोधपुर के इस्माइल लांगा ग्रुप ने शकीरा के गानों में घोला राजस्थानी लोक संगीत का रंग, सोशल मीडिया पर छाया फ्यूजन",
  "summary": "राजस्थान के जोधपुर से ताल्लुक रखने वाले इस्माइल लांगा ग्रुप ने वैश्विक पॉप स्टार शकीरा के चर्चित गानों 'हिप्स डोंट लाई' और 'वाका वाका' को राजस्थानी लोक संगीत की धुनों में ढालकर सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है।",
  "content": "राजस्थान की सांस्कृतिक राजधानी जोधपुर के लोक कलाकारों ने अंतर्राष्ट्रीय संगीत पटल पर एक अनोखी छाप छोड़ी है। मरूधरा की समृद्ध गायकी और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के बल पर इस्माइल लांगा ग्रुप ने विश्वप्रसिद्ध पॉप स्टार शकीरा के गानों को एक बिल्कुल नया देसी रूप दिया है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर धूम मचाने वाले चार्टबस्टर गीत 'हिप्स डोंट लाई' को जब स्थानीय लोक धुनों, खड़ताल और ढोलक की ताल पर पिरोया गया, तो यह फ्यूजन डिजिटल मंचों पर तेजी से लोगों की पसंद बन गया। अपनी सांस्कृतिक जड़ों को आधुनिक पहचान देने का यह अनूठा प्रयास दर्शकों को काफी आकर्षित कर रहा है।\n\nबस यात्रा के दौरान मिली प्रेरणा और वाका वाका की सफलता\nइस अनूठे संगीतमय प्रयोग की शुरुआत एक बेहद साधारण घटना से हुई थी। ग्रुप के क्रिएटिव डायरेक्टर जागीरदार आरवी ने बताया कि 3 मार्च को एक यात्रा के दौरान बस में सफर करते समय उन्होंने शकीरा के मशहूर गाने 'वाका वाका' पर एक संक्षिप्त रील रिकॉर्ड की और उसे इंस्टाग्राम पर साझा किया। इस रील को इंटरनेट उपयोगकर्ताओं द्वारा बेहद पसंद किया गया। इस शुरुआती सफलता से उत्साहित होकर टीम ने शकीरा के एक और ऑल-टाइम हिट गाने 'हिप्स डोंट लाई' को राजस्थानी लोक संगीत के तड़के के साथ ढालने की योजना पर काम शुरू किया।\n\nकलाकारों ने मूल रचना की मुख्य धुन और उसके लयबद्ध ढांचे को पूरी तरह बरकरार रखा, लेकिन उसमें थार की अपनी मिट्टी की खुशबू घोल दी। इससे पहले तैयार किए गए 'वाका वाका' के राजस्थानी संस्करण में ढोलक और खड़ताल के सुरीले तालमेल के साथ-साथ 'खम्मा घणी' और 'वेलकम टू राजस्थान' जैसे पारंपरिक राजस्थानी अभिवादनों का प्रयोग किया गया था। इस संयोजन ने वैश्विक पॉप संगीत और मरुस्थलीय लोक शैली के बीच एक अद्भुत सेतु का काम किया।\n\nबिना औपचारिक शिक्षा के अंग्रेजी शब्दों को सीखने में लगी दो साल की मेहनत\nइस पूरी संगीतमय यात्रा के पीछे एक असाधारण समर्पण और कड़े परिश्रम की कहानी छिपी है। समूह के मुख्य गायक इस्माइल खान लांगा खुद शकीरा के बहुत बड़े प्रशंसक हैं। हालांकि, स्कूली शिक्षा न होने और अंग्रेजी भाषा से पूरी तरह अनभिज्ञ होने के कारण एक विदेशी भाषा के गीत को सटीक लहजे में गाना उनके लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी। इस्माइल खान लांगा ने अपनी इस भाषाई सीमा को आड़े नहीं आने दिया और इस कठिन गाने को सीखने का दृढ़ निश्चय किया।\n\nअंग्रेजी के प्रत्येक शब्द को समझने, उसके सही उच्चारण को पकड़ने और उसे राजस्थानी लोक शैली के साथ स्वाभाविक रूप से ढालने में उन्हें लगभग दो साल तक लगातार अभ्यास करना पड़ा। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान क्रिएटिव डायरेक्टर जागीरदार आरवी ने उनके साथ दिन-रात मेहनत की और गाने की बारीकियों से उन्हें अवगत कराया। इसी निरंतर अभ्यास और अटूट निष्ठा का परिणाम है कि आज बिना औपचारिक पढ़ाई वाले ये लोक कलाकार अंतर्राष्ट्रीय पॉप धुनों को अपनी सुरीली आवाज में सहजता से गा रहे हैं।\n\n60 लाख से अधिक व्यूज और शकीरा से मुलाकात की चाहत\nइस्माइल लांगा ग्रुप का यह नवीन प्रयोग सोशल मीडिया पर बेहद लोकप्रिय साबित हो रहा है। इस्माइल खान के अनुसार, इंस्टाग्राम पर साझा किए गए उनके वीडियो को 60 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है। समूह अपना आधिकारिक यूट्यूब चैनल 'इस्माइल लांगा ऑफिशियल' भी संचालित करता है, जहां वे अपनी पारंपरिक प्रस्तुतियों के साथ-साथ इस प्रकार के नए संगीत प्रयोगों के वीडियो नियमित रूप से पोस्ट करते रहते हैं।\n\nइन कलाकारों का अब सबसे बड़ा सपना अपनी पसंदीदा अंतर्राष्ट्रीय गायिका शकीरा से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात करना है। कलाकारों का कहना है कि यदि उन्हें कभी शकीरा से मिलने का अवसर प्राप्त होता है, तो उनके साथ एक यादगार सेल्फी लेना उनके जीवन का सबसे खास पल होगा। सोशल मीडिया पर इस फ्यूजन को मिल रही जबरदस्त सराहना से यह भी स्पष्ट होता है कि अगर भारतीय लोक संगीत को सही तरीके से पेश किया जाए, तो वह वैश्विक स्तर की धुनों के साथ मिलकर नई पीढ़ी को भी अपनी ओर खींच सकता है।\n\nपारंपरिक कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का मुख्य उद्देश्य\nसमूह के सदस्यों का मानना है कि इस मिली व्यापक सफलता का श्रेय किसी एक व्यक्ति को न जाकर पूरी टीम की एकजुटता और सामूहिक प्रयास को जाता है। हर एक कलाकार ने अपनी निर्धारित सीमाओं से बाहर निकलकर नई चीजें सीखीं और हफ्तों तक कड़ा रियाज किया। टीम का स्पष्ट कहना है कि उनका लक्ष्य मात्र वायरल वीडियो बनाना नहीं है, बल्कि राजस्थानी लोक संगीत को एक आधुनिक और प्रासंगिक स्वरूप में युवा पीढ़ी के सामने प्रस्तुत करना है।\n\nग्रुप वर्तमान में कई अन्य नवीन म्यूजिक प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रहा है। उनका दृढ़ विश्वास है कि यदि राजस्थानी लोक धुनों को मुख्यधारा के लोकप्रिय संगीत के साथ सही तालमेल में जोड़ा जाए, तो युवा पीढ़ी सहज रूप से अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रह सकती है। शकीरा के 'वाका वाका' से शुरू हुआ यह प्रेरणादायक संगीतमय सफर अब 'हिप्स डोंट लाई' तक पहुंच चुका है और थार के इन कलाकारों की अनोखी तान लगातार संगीत प्रेमियों का दिल जीत रही है।\n\nइसका आप पर असर\nराजस्थान में: स्थानीय लोक कलाकारों और पार पारंपरिक वाद्ययंत्रों को वैश्विक पहचान मिलने से क्षेत्रीय सांस्कृतिक विरासत को नया प्रोत्साहन मिल रहा है।\n\nभारत भर में: डिजिटल मंचों और लोक संगीत के इस अनूठे मिलाप से युवा पीढ़ी अपनी पारंपरिक कला और संगीत से नए अंदाज में जुड़ पा रही है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. इस्माइल लांगा ग्रुप किस शहर से ताल्लुक रखता है?\nयह संगीत समूह राजस्थान के जोधपुर शहर से ताल्लुक रखता है और पारंपरिक लोक संगीत के नए प्रयोगों के लिए जाना जाता है।\n\n2. शकीरा के किन गानों को राजस्थानी अंदाज में तैयार किया गया है?\nसमूह ने शकीरा के प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय गीतों 'हिप्स डोंट लाई' और 'वाका वाका' को राजस्थानी लोक संगीत की धुनों और वाद्ययंत्रों के साथ पेश किया है।\n\n3. शकीरा के गाने पर रील बनाने का विचार कैसे आया?\nग्रुप के क्रिएटिव डायरेक्टर जागीरदार आरवी ने 3 मार्च को सफर के दौरान बस में 'वाका वाका' पर एक रील बनाकर इंस्टाग्राम पर पोस्ट की थी, जिसे मिली भारी सफलता के बाद उन्होंने 'हिप्स डोंट लाई' पर काम शुरू किया।\n\n4. गायक इस्माइल खान लांगा को अंग्रेजी गाना सीखने में कितना समय लगा?\nअंग्रेजी भाषा से परिचित न होने और पढ़े-लिखे न होने के कारण इस्माइल खान लांगा को क्रिएटिव डायरेक्टर जागीरदार आरवी के साथ मिलकर शब्दों के सही उच्चारण और गायकी को सीखने में करीब दो साल का समय लगा।\n\n5. इस फ्यूजन संगीत का सोशल मीडिया पर कैसा प्रदर्शन रहा है?\nसमूह के इस प्रयोग को सोशल मीडिया पर जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है और इंस्टाग्राम पर उनके वीडियो को 60 लाख से अधिक व्यूज मिल चुके हैं।\n\nप्रेरणा और सबक\nप्रेरणा और महत्वपूर्ण सबक:\n\n• अथक लगन से भाषा की बाधा दूर करना: औपचारिक शिक्षा या अंग्रेजी की जानकारी न होने के बावजूद दो साल के निरंतर अभ्यास से अंतर्राष्ट्रीय गीत के सही उच्चारण पर महारत हासिल की जा सकती है।\n• परंपरा और आधुनिकता का संतुलन: मौलिक सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए समकालीन शैलियों के साथ प्रयोग करने से कला का दायरा बढ़ता है।\n• मार्गदर्शन और टीम वर्क का महत्व: सही दिशा-निर्देशन और आपसी सहयोग से कठिन से कठिन चुनौतियों को भी पार किया जा सकता है।\n• डिजिटल अवसरों का उपयोग: सोशल मीडिया मंचों का सही इस्तेमाल कर दूरदराज के क्षेत्रों की कला को भी लाखों दर्शकों तक पहुंचाया जा सकता है।",
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  "category": "कल्चर",
  "publishedAt": "2026-08-19",
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    "राजस्थान लोक संगीत",
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