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  "type": "article",
  "title": "जोधपुर रिफ 2026 में जसनाथी सिद्धों का अग्नि नृत्य बना आकर्षण का केंद्र",
  "summary": "राजस्थान इंटरनेशनल फोक फेस्टिवल में जसनाथी सिद्धों ने धधकते अंगारों पर अग्नि नृत्य पेश कर दर्शकों को चकित कर दिया। करीब 550 साल पुरानी यह अनूठी परंपरा गुरु जसनाथ जी महाराज और ऐतिहासिक कालखंड से जुड़ी है।",
  "content": "राजस्थान इंटरनेशनल फोक फेस्टिवल (रिफ) 2026 के मंच पर लोक संस्कृति और आध्यात्मिक आस्था का अनूठा दृश्य देखने को मिला। जोधपुर स्थित धना भैया की छतरी पर जसनाथी सिद्धों द्वारा प्रस्तुत किए गए पारंपरिक अग्नि नृत्य ने वहां मौजूद देशी और विदेशी मेहमानों को पूरी तरह रोमांचित कर दिया। दहकते हुए लाल अंगारों के ऊपर भगतों का यह साहसिक प्रदर्शन और गुरु जसनाथ जी महाराज के प्रति उनकी गहरी निष्ठा देखकर दर्शक दंग रह गए। लगभग 550 वर्ष पुरानी यह सांस्कृतिक परंपरा जसनाथ जी महाराज की आध्यात्मिक देन मानी जाती है। फेस्टिवल डायरेक्टर दिव्य भाटिया के नेतृत्व में चल रहे इस उत्सव में दुनिया भर के कलाकार शिरकत कर रहे हैं, जबकि पूर्व महाराजा गज सिंह और पूर्व महारानी हेमलता राजे की विभिन्न सत्रों में उपस्थिति ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई है।\n\nधधकते अंगारों पर हैरतंगेज करतब और साधना\nप्रस्तुति के दौरान कलाकार बिना किसी हिचकिचाहट के सीधे दहकते अंगारों के बीच उतर जाते हैं। इतना ही नहीं, वे जलते हुए अंगारों को मुंह में रखकर भी अपने कौशल का प्रदर्शन करते हैं। आग की भीषण लपटों और अंगारों के बीच कलाकारों के इन हैरतअंगेज करतबों ने दर्शकों को अवाक कर दिया। कलाकारों और भगतों का कहना है कि यह हैरतंगेज प्रदर्शन पूरी तरह गुरु जसनाथ जी महाराज की असीम कृपा और कठोर साधना का प्रतिफल है। उनके अनुसार, इस नृत्य के दौरान विशिष्ट मंत्रोच्चार और आंतरिक आध्यात्मिक साधना की सबसे अहम भूमिका होती है। कलाकारों का यह भी मानना है कि इस विशेष ध्यानमग्न अवस्था में उन्हें अग्नि की भीषण तपिश का अहसास सामान्य रूप से नहीं होता। हालांकि, दहकती आग पर यह प्रदर्शन बेहद जोखिम भरा होता है, फिर भी यह उनके परंपरागत विश्वास और धार्मिक आस्था का अभिन्न अंग बना हुआ है।\n\nमुगल शासक औरंगजेब के दौर से जुड़ा ऐतिहासिक संदर्भ\nजसनाथी समुदाय की मान्यताओं में इस अग्नि नृत्य का संबंध मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल से भी जुड़ा हुआ है। परंपरा के अनुसार, उस ऐतिहासिक दौर में रुस्तम जी महाराज सहित जसनाथी संतों ने दिल्ली दरबार के समक्ष अग्नि नृत्य की प्रस्तुति दी थी। लोक आख्यानों के मुताबिक, जब सनातन धर्म और संत परंपराओं के सामने कठिन चुनौतियां थीं, तब संतों ने अपनी आत्मिक शक्ति, साधना और अटूट विश्वास को प्रमाणित करने के लिए यह प्रदर्शन किया था। बताया जाता है कि उस समय जसनाथी समुदाय के 11 व्यक्तियों को ताम्रपत्र प्रदान किए गए थे। इन्हीं ताम्रपत्रों के आधार पर उन्हें अलग-अलग क्षेत्रों में निर्बाध आवागमन करने तथा अग्नि नृत्य प्रस्तुत करने की आधिकारिक अनुमति मिलने का उल्लेख मिलता है। यह प्रसंग जसनाथी समाज के मौखिक इतिहास और उनकी धार्मिक परंपरा का एक अत्यंत गौरवशाली अध्याय माना जाता है।\n\nभगवा ध्वज, त्याग और सांस्कृतिक धरोहर का संदेश\nधना भैया की छतरी पर अग्नि नृत्य कर रहे भगतों ने अपनी कला के माध्यम से गुरु परंपरा, भगवा ध्वज और सनातन संस्कृति के प्रति आदर का स्पष्ट संदेश दिया। संतों की पवित्र वाणी का संदर्भ लेते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवा केवल एक परिधान नहीं है, बल्कि यह त्याग, तपस्या, समर्पण और अटूट आस्था का प्रतीक है। जसनाथी सिद्धों के दृष्टिकोण से अग्नि नृत्य केवल एक लोक कला प्रदर्शन भर नहीं है, बल्कि अपने गुरु के प्रति अनन्य समर्पण और पीढ़ियों से संजोकर रखी गई इस धरोहर को अक्षुण्ण रखने का एक माध्यम है। यही कारण है कि इस प्रस्तुति में कलाकारों की असीम शारीरिक क्षमता के साथ-साथ उनकी गहरी धार्मिक भावनाएं और राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत भी पूरी गरिमा के साथ उभरकर सामने आई।\n\nइसका आप पर असर\nइस सांस्कृतिक प्रस्तुति ने राजस्थान की लुप्तप्राय लोक परंपराओं के महत्व को रेखांकित किया है।\n\n• राजस्थान में: जोधपुर में आयोजित इस प्रदर्शन से स्थानीय लोक कलाकारों और पारंपरिक परंपराओं को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के बीच व्यापक पहचान मिली है। इससे क्षेत्र के सांस्कृतिक पर्यटन और धरोहर संरक्षण प्रयासों को बल मिलेगा।\n• भारत में: देश भर के कला प्रेमियों को करीब 550 साल पुरानी दुर्लभ आध्यात्मिक नृत्य शैली को समझने और सराहने का अवसर मिला है। इससे युवा पीढ़ी को भारत की प्राचीन संत परंपराओं और मौखिक इतिहास से जुड़ने की प्रेरणा मिलती है।\n• संस्कृति प्रेमियों के लिए: यह आयोजन दर्शाता है कि कैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों के जरिए पारंपरिक कलाओं को मूल स्वरूप में संरक्षित रखा जा सकता है। दर्शक ऐसे उत्सवों में सीधे शामिल होकर इन पारंपरिक शैलियों को प्रोत्साहित कर सकते हैं।\n• पर्यटन क्षेत्र के लिए: रिफ जैसे उत्सवों से राज्य में आने वाले पर्यटकों के अनुभव में विविधता जुड़ती है। इससे स्थानीय कलाकारों की आजीविका और सांस्कृतिक पहचान दोनों मजबूत होती हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nजोधपुर रिफ 2026 में जसनाथी सिद्धों द्वारा अग्नि नृत्य प्रस्तुत करने की जड़ें 550 साल पुरानी आध्यात्मिक परंपरा और ऐतिहासिक संदर्भों में निहित हैं।\n\n• गुरु परंपरा और आध्यात्मिक साधना: यह नृत्य मुख्य रूप से गुरु जसनाथ जी महाराज के प्रति समर्पण का प्रतीक है, जहां साधक मंत्रोच्चार और साधना के जरिए अंगारों पर उतरते हैं। समुदाय का विश्वास है कि गुरु कृपा और तपस्या के कारण ही यह कठिन प्रदर्शन संभव हो पाता है।\n• औरंगजेब काल का ऐतिहासिक प्रसंग: मान्यताओं के अनुसार, मुगल शासक औरंगजेब के दौर में रुस्तम जी महाराज सहित संतों ने दिल्ली में अपनी साधना और सनातन आस्था को सिद्ध करने के लिए अग्नि नृत्य किया था। इसी प्रदर्शन के उपरांत समुदाय के 11 लोगों को ताम्रपत्र दिए गए थे, जिससे उन्हें इस परंपरा को जारी रखने की अनुमति मिली थी।\n• विरासत का संरक्षण: राजस्थान इंटरनेशनल फोक फेस्टिवल का उद्देश्य राज्य की समृद्ध और दुर्लभ लोक कलाओं को विश्व पटल पर लाना है। धना भैया की छतरी पर यह प्रस्तुति इसी प्रयास का हिस्सा बनी ताकि 550 साल पुरानी परंपरा जीवंत बनी रहे।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. जोधपुर रिफ 2026 में अग्नि नृत्य किसने प्रस्तुत किया?\nयह प्रस्तुति जसनाथी सिद्धों द्वारा जोधपुर में धना भैया की छतरी पर दी गई।\n\n2. अग्नि नृत्य की परंपरा कितने वर्ष पुरानी मानी जाती है?\nयह परंपरा लगभग 550 वर्ष पुरानी है और इसे गुरु जसनाथ जी महाराज की देन माना जाता है।\n\n3. अग्नि नृत्य के दौरान कलाकार क्या हैरतंगेज करतब करते हैं?\nकलाकार धधकते अंगारों के बीच प्रवेश करते हैं और जलते हुए अंगारों को अपने मुंह में भी रखते हैं।\n\n4. मुगल काल में इस नृत्य से जुड़ा कौन सा प्रसंग बताया जाता है?\nमुगल शासक औरंगजेब के दौर में रुस्तम जी महाराज सहित संतों ने दिल्ली में इसका प्रदर्शन किया था, जिसके बाद 11 लोगों को ताम्रपत्र दिए जाने का उल्लेख मिलता है।\n\n5. इस उत्सव में किन प्रमुख गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया?\nफेस्टिवल डायरेक्टर दिव्य भाटिया के नेतृत्व में आयोजित इस महोत्सव में पूर्व महाराजा गज सिंह और पूर्व महारानी हेमलता राजे ने सहभागिता की।",
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  "category": "कल्चर",
  "publishedAt": "2026-10-29",
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