खुल्दाबाद का अधूरा स्मारक जो जोड़ता है हैदराबाद के निज़ाम और तुर्की के अंतिम खलीफा का इतिहास एलोरा की पहाड़ियों के पास स्थित खुल्दाबाद का अधूरा मकबरा हैदराबाद के आसफ जाही राजवंश और तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य के अनूठे ऐतिहासिक रिश्तों का एक अनसुलझा साक्षी है। महाराष्ट्र में एलोरा की ऐतिहासिक गुफाओं के पास स्थित खुल्दाबाद का शांत और अधूरा पड़ा मकबरा एक ऐसी भूली-बिसरी कहानी समेटे हुए है, जो दक्कन के हैदराबाद राज्य को सीधे ऑटोमन साम्राज्य से जोड़ती है। यह ढांचा किसी इंसान का अंतिम विश्राम स्थल तो नहीं बन सका, लेकिन यह 20वीं सदी की वैश्विक राजनीति और दो बड़े शाही परिवारों के बीच बने अनूठे गठबंधन की याद दिलाता है। शाही विवाह से शुरू हुई दो महान साम्राज्यों की निकटता साल 1931 में हैदराबाद रियासत के 7वें निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने एक दूरदर्शी कदम उठाते हुए अपने दोनों बेटों शहज़ादे आज़म जाह और शहज़ादे मोअज्ज़म जाह का विवाह तुर्की के अंतिम ऑटोमन खलीफा अब्दुल मजीद द्वितीय के परिवार में तय किया। बड़े बेटे आज़म जाह का विवाह खलीफा की बेटी शाहज़ादी दुरुशहवार से हुआ, जबकि छोटे बेटे मोअज्ज़म जाह का विवाह खलीफा की भतीजी शाहज़ादी नीलोफर के साथ संपन्न हुआ। इस दोहरे शाही विवाह के माध्यम से हैदराबाद के आसफ जाही राजवंश और दुनिया के शक्तिशाली ऑटोमन राजवंश के बीच गहरा पारिवारिक व सांस्कृतिक संबंध स्थापित हो गया। उस समय हैदराबाद अपनी कला, संस्कृति और अपार धन-संपदा के कारण दुनिया भर में एक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र के रूप में पहचाना जाता था। खिलाफत का अंत और खुल्दाबाद में विशाल मकबरे का निर्माण जब तुर्की में राजनीतिक परिवर्तन हुए और खिलाफत व्यवस्था समाप्त कर दी गई, तब अंतिम ऑटोमन खलीफा अब्दुल मजीद द्वितीय को अपने देश से निर्वासित होना पड़ा। अपने समधी और मुस्लिम जगत के पूर्व प्रमुख के सम्मान में हैदराबाद के निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने खुल्दाबाद की ऐतिहासिक सरज़मीं पर एक भव्य मकबरा बनवाने की योजना तैयार की। निज़ाम का विचार था कि खलीफा के देहांत के उपरांत उनके पार्थिव शरीर को भारत लाकर इसी स्थान पर पूरे शाही सम्मान और शानो-शौकत के साथ सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। यह अधूरा स्मारक हैदराबाद की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को बढ़ाने और तुर्की के साथ उसके गहरे सांस्कृतिक संबंधों को हमेशा के लिए अमर बनाने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास था। द्वितीय विश्व युद्ध की परिस्थितियां और मदीना में दफन की कहानी हालांकि ऐतिहासिक घटनाक्रम ने एक अलग ही मोड़ ले लिया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दुनिया भर में बड़े पैमाने पर उथल-पुथल मची और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदलीं। इसी दौर में वर्ष 1944 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में अंतिम खलीफा अब्दुल मजीद द्वितीय का निधन हो गया। तत्कालीन युद्धकालीन परिस्थितियों और कठिन कूटनीतिक जटिलताओं के कारण खलीफा के पार्थिव शरीर को भारत लाना संभव नहीं हो सका। लगभग एक दशक तक उनके पार्थिव अवशेषों को पेरिस में सुरक्षित रखा गया। लंबे इंतजार के बाद आखिरकार उन्हें सऊदी अरब के पवित्र शहर मदीना में स्थित ऐतिहासिक जन्नतुल बकी कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। आज खुल्दाबाद की पहाड़ियों के बीच खड़ा यह अधूरा ढांचा बिना किसी कब्र के भी इतिहास की एक महान और अनसुनी कहानी का साक्षी बना हुआ है, जो हैदराबाद रियासत के वैश्विक दृष्टिकोण को प्रदर्शित करता है। इसका आप पर असर इतिहास और पर्यटन प्रेमियों के लिए: यह अधूरा मकबरा एलोरा और खुल्दाबाद जाने वाले पर्यटकों के लिए एक अनोखा ऐतिहासिक स्थल है, जो भारत और ऑटोमन साम्राज्य के अनूठे ऐतिहासिक रिश्तों को समझने का अवसर प्रदान करता है। सवाल-जवाब 1. यह अधूरा मकबरा कहां स्थित है? यह मकबरा महाराष्ट्र में प्रसिद्ध एलोरा की गुफाओं के पास खुल्दाबाद में स्थित है। 2. इस मकबरे में किसे दफनाया जाना था? इसमें तुर्की के अंतिम ऑटोमन खलीफा अब्दुल मजीद द्वितीय को दफनाने की योजना थी। 3. हैदराबाद के निज़ाम और तुर्की के खलीफा में क्या संबंध था? साल 1931 में 7वें निज़ाम मीर उस्मान अली खान के बेटों का विवाह खलीफा की बेटी और भतीजी से हुआ था, जिससे दोनों राजवंशों में पारिवारिक रिश्ता कायम हुआ था। 4. खलीफा अब्दुल मजीद द्वितीय की मृत्यु कब और कहां हुई थी? खलीफा अब्दुल मजीद द्वितीय का निधन साल 1944 में पेरिस में हुआ था। 5. खलीफा को अंततः कहां दफनाया गया? लगभग 10 साल के लंबे इंतजार के बाद उन्हें सऊदी अरब के मदीना शहर स्थित जन्नतुल बकी कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। https://trendkia.com/culture/khuldabad-ka-adhura-smaraka-jo-jorata-hai-hyderabad-ke-nizam-aura-turkey-ke-antima-khalipha-ka-itihasa-15619 TrendKia — Har trend, sabse pehle.