कृति सेनन के रक्षाबंधन विज्ञापन पर छिड़ी बहस, क्या फैशन के दौर में खो रहे हैं हमारे पारंपरिक मूल्य? बॉलीवुड अभिनेत्री कृति सेनन के एक ज्वेलरी ब्रांड के रक्षाबंधन विज्ञापन में आधुनिक कपड़ों और पालतू जानवर को राखी बांधने को लेकर सोशल मीडिया पर दो विरोधी पक्ष आमने-सामने आ गए हैं। हर साल जब त्योहारों का सीजन नजदीक आता है, तो टेलीविजन स्क्रीन से लेकर सोशल मीडिया के न्यूजफीड तक नए-नए विज्ञापनों की बाढ़ आ जाती है। ये विज्ञापन केवल आभूषण या परिधान नहीं बेचते, बल्कि भावनाओं और कहानियों का एक ताना-बाना बुनते हैं। हालांकि, हाल ही में बॉलीवुड अभिनेत्री कृति सेनन द्वारा एक ज्वेलरी ब्रांड के लिए शूट किया गया रक्षाबंधन का विज्ञापन एक अलग ही वजह से ऑनलाइन बहस का मुख्य केंद्र बन गया है। इस विज्ञापन के सामने आने के बाद डिजिटल मंचों पर तीखी प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है, जिसमें लोग संस्कृति और आधुनिकता के बीच की बारीक रेखा पर सवाल उठा रहे हैं। सामने आए इस विज्ञापन में कृति सेनन अपने भाई के साथ रक्षाबंधन का त्योहार मनाती हुई दिखाई देती हैं, लेकिन इसके साथ ही वह अपने पालतू कुत्ते को भी कलाई पर राखी बांधती नजर आती हैं। इसके अलावा, उनके पहनावे में भी पूरी तरह से मॉडर्न और वेस्टर्न-फ्यूजन स्टाइल को अपनाया गया है। बस फिर क्या था, यह दृश्य सामने आते ही सोशल मीडिया यूजर्स दो स्पष्ट गुटों में बंट गए। एक वर्ग का कड़ातर्फ यह है कि मौजूदा समय में ट्रेंड्स और फैशन के नाम पर हमारे पावन त्योहारों की मूल पवित्रता को कमजोर किया जा रहा है, जबकि दूसरा खेमा इसे एक प्रगतिशील, खूबसूरत और समय के साथ बदलती सोच का प्रतीक मान रहा है। इस पूरे विवाद के पीछे छिपी असलियत को टटोलने की जरूरत है। क्या वाकई हमारी सदियों पुरानी परंपराएं किसी विज्ञापन की वजह से खतरे में पड़ गई हैं या फिर आज के तकनीकी दौर में हम हर छोटी बात पर बेवजह आहत होने की आदत डाल चुके हैं? इस विषय की गहराई तक पहुंचने के लिए हमें आज के बदलते सामाजिक ढांचे के चश्मे से इस पूरी स्थिति का आकलन करना होगा। ऑनलाइन मंचों पर इस बात को लेकर लंबी चर्चाएं चल रही हैं कि आखिर त्योहारों को मनाने के दायरे में किसे शामिल किया जाना चाहिए और किसे बाहर रखा जाना चाहिए। पारंपरिक विचारधारा को मानने वाले लोगों और कई सोशल मीडिया यूजर्स की नाराजगी के पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें सामने आ रही हैं। पहली वजह कपड़ों की स्टाइलिंग से जुड़ी है और दूसरी वजह परंपरा के कॉमर्शियलाइजेशन यानी व्यवसायीकरण को लेकर है। भारत में हर त्योहार के साथ एक विशिष्ट सांस्कृतिक कोड जुड़ा रहा है। जब भी रक्षाबंधन का जिक्र होता है, तो लोगों के जहन में पारंपरिक एथनिक वियर जैसे कि कुर्तियां, साड़ियां या लहंगे की तस्वीर अपने आप उभर आती है। विज्ञापन में कृति के इस बोल्ड और आधुनिक फेस्टिव लुक को देखकर तमाम लोगों को ऐसा महसूस हुआ कि यह किसी पारिवारिक पर्व का विज्ञापन न होकर किसी अंतरराष्ट्रीय फैशन शो की नुमाइश ज्यादा लग रहा है। आलोचकों का यह भी मानना है कि आज के दौर में बड़े-बड़े ब्रांड्स खुद को कूल और इवॉल्व्ड दिखाने की अंधी होड़ में त्योहार के असली सार को पूरी तरह से भूल जाते हैं। जब आप हर पारंपरिक रीति-रिवाज को जबरन एक मॉडर्न तड़का देने की कोशिश करते हैं, तो कई बार वह उस सादगी और आध्यात्मिक भक्ति भाव को नुकसान पहुंचाता है जो पीढ़ियों से हमारी संस्कृति की पहचान रही है। उनका तर्क है कि संस्कृति के साथ इस तरह के प्रयोग त्योहारों की मूल भावना को कमतर आंकते हैं और युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से भटकाने का काम करते हैं। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग इस विज्ञापन के समर्थन में पूरी मजबूती के साथ खड़ा नजर आता है। इन समर्थकों का स्पष्ट तर्क है कि यदि हम समय के साथ अपने सोचने-समझने के दायरे का विस्तार नहीं करेंगे, तो हमारे त्योहार केवल पुरानी और मृत रीतियों बनकर रह जाएंगे, जिनसे आज की युवा पीढ़ी खुद को जुड़ा हुआ महसूस नहीं कर पाएगी। आज के दौर में न्यूक्लियर फैमिली और सिंगल-पर्सन हाउसहोल्ड की संस्कृति तेजी से बढ़ी है, जहां पालतू जानवर केवल मूक पशु नहीं बल्कि परिवार के एक अहम और संवेदनशील सदस्य की तरह रहते हैं। अनगिनत लोग लंबे समय से अपने पालतू जीवों को अपनी रक्षा का प्रतीक मानते हुए स्नेह के साथ राखी बांधते आए हैं। विज्ञापन में इस सामाजिक सच्चाई को दिखाना किसी भी सूरत में परंपरा का अपमान नहीं, बल्कि निस्वार्थ प्रेम का एक जीवंत उत्सव है। इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि इंसानी पहनावा, खान-पान और उत्सव मनाने के तौर-तरीके हमेशा से कालखंड के अनुसार बदलते रहे हैं। जींस के ऊपर कुर्ती पहनना या आधुनिक आभूषणों के साथ रक्षाबंधन मनाना किसी भी इंसान के मन से अपने भाई के प्रति प्रेम या सम्मान के भाव को कम नहीं कर सकता। आज के डिजिटल युग की एक सबसे बड़ी और कड़वी सच्चाई यह बन चुकी है कि यहां किसी भी साधारण बात पर विवाद खड़ा करना बेहद आसान हो चुका है। सोशल मीडिया के एल्गोरिदम इस तरीके से डिजाइन किए गए हैं कि जहां भी गुस्सा, बहस और हंगामा होता है, वहां कंटेट की रीच और एंगेजमेंट अपने आप बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। कई बार हम सभी किसी महज तीस सेकंड के विज्ञापन को किसी बड़े सांस्कृतिक हमले की तरह देखने की भूल कर बैठते हैं। यदि कोई नामी ब्रांड किसी त्योहार को नए जमाने के हिसाब से प्रस्तुत कर रहा है, तो क्या वह वाकई हमारी सदियों पुरानी संस्कृति को कोई नुकसान पहुंचा सकता है? अगर हमारी सांस्कृतिक बुनियाद इतनी कमजोर है कि वह एक विज्ञापन से हिल जाए, तो फिर उस पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। हमें यह बात हमेशा याद रखनी होगी कि त्योहारों का असली और मूल उद्देश्य हमेशा से लोगों को आपस में जोड़ना रहा है, न कि उनके बीच किसी तरह का विवाद पैदा करना। रक्षाबंधन का असली मतलब सुरक्षा और प्रेम का एक अटूट संकल्प होता है। यह संकल्प चाहे पारंपरिक कुर्ता-पायजामा पहनकर लिया जाए या फिर किसी मॉडर्न आउटफिट में, चाहे कलाई पर भाई को राखी बांधी जाए या फिर किसी ऐसे वफादार साथी को जो आपकी जिंदगी में हर पल रक्षा का अहसास कराता हो, भावना हमेशा एक जैसी ही रहती है। हालांकि, ब्रांड्स को भी इस बात का पूरा ख्याल रखना चाहिए कि वे व्यावसायिक फायदे के चक्कर में किसी संस्कृति की मूल आत्मा के साथ खिलवाड़ न करें। वहीं दूसरी ओर, दर्शकों को भी इस बात को समझना होगा कि हर नए और अलग बदलाव को सीधे तौर पर अपमान का दर्जा दे देना कतई समझदारी नहीं है। इस बात को भी स्वीकार करना होगा कि यह केवल एक विज्ञापन है और आज की नई पीढ़ी विज्ञापनों के सतही असर से कहीं अधिक समझदार, परिपक्व और व्यावहारिक है। वे पारिवारिक त्योहारों की गरिमा और पार्टी वियर के आधुनिक ट्रेंड्स के बीच के फर्क को बहुत अच्छी तरह समझते हैं। ऐसे में समाज को बिना किसी ठोस वजह के आशंकित होने की कोई आवश्यकता नहीं है। हमारी आने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों से कटी हुई बिल्कुल नहीं है; बल्कि वह अपनी संस्कृति, मूल्यों और परंपराओं की खूबसूरती को नए दौर के साथ तालमेल बिठाकर और भी बेहतर तरीके से आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह से सक्षम है। इसका आप पर असर • भारत में: यह बहस सांस्कृतिक विज्ञापनों और पारंपरिक मूल्यों के प्रति समाज के नजरिए को प्रभावित करती है, जिससे ब्रांड्स के विज्ञापन बनाने के तौर-तरीकों में बदलाव आ सकता है। सवाल-जवाब 1. कृति सेनन का रक्षाबंधन विज्ञापन क्यों चर्चा में आया? इस विज्ञापन में उनके आधुनिक वेस्टर्न-फ्यूजन कपड़ों और पालतू कुत्ते को राखी बांधने के दृश्यों को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। 2. आलोचकों की इस विज्ञापन पर क्या आपत्ति थी? आलोचकों का मानना था कि आधुनिक स्टाइलिंग और ट्रेंड्स के नाम पर त्योहार की मूल पवित्रता और पारंपरिक परिधानों की गरिमा को कम किया जा रहा है। 3. विज्ञापन के समर्थन में लोगों का क्या तर्क था? समर्थकों का तर्क था कि समय के साथ सोच का दायरा बढ़ाना जरूरी है और पालतू जानवरों को परिवार का हिस्सा मानकर उनके प्रति प्रेम जताना परंपरा का अपमान नहीं है। 4. रक्षाबंधन का वास्तविक उद्देश्य क्या है? रक्षाबंधन का मूल उद्देश्य लोगों को आपस में जोड़ना और सुरक्षा व प्रेम का संकल्प लेना है, जिसे किसी भी पहनावे में निभाया जा सकता है। https://trendkia.com/culture/kriti-sanon-ke-rakshabandhan-vigyapan-par-chhidhi-behas-21752 TrendKia — Har trend, sabse pehle.