कुमाऊं की दीपावली में क्यों खास है ऐपण कला, जानिए इसके पीछे की परंपरा और महत्व उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में दीपावली के मौके पर ऐपण कला का विशेष महत्व होता है। घरों की देहली और आंगन को गेरू और चावल के घोल से सजाकर मां लक्ष्मी का स्वागत किया जाता है। बागेश्वर: उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में दिवाली का पर्व महज दीयों की रोशनी और मीठे पकवानों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां की समृद्ध लोक संस्कृति और प्राचीन परंपराएं भी इस त्योहार की रौनक को कई गुना बढ़ा देती हैं। इन अनूठी सांस्कृतिक धरोहरों में ऐपण कला का स्थान बेहद खास है, जो पहाड़ की अनूठी पहचान को जीवंत रखती है। पर्व के आगमन से ठीक पहले ग्रामीण और शहरी इलाकों में घरों की चौखटों, आंगनों और पूजा स्थलों को ऐपण से सजाए जाने का सिलसिला सदियों से अनवरत चला आ रहा है। इस पारंपरिक लोककला को घर में सुख, समृद्धि, पवित्रता और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है, जिसे आज भी कुमाऊं की महिलाएं पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ निभाती आ रही हैं। पारंपरिक सामग्री और बनाने की विधि प्राचीन समय से ही ऐपण तैयार करने के लिए प्राकृतिक रूप से गेरू और चावल के पिसे हुए घोल का मुख्य रूप से इस्तेमाल किया जाता रहा है। इस प्रक्रिया की शुरुआत में सबसे पहले घर की देहली या आंगन को पूरी तरह साफ किया जाता है और जमीन पर गेरू से लाल रंग की एक समतल परत बिछाई जाती है। जब यह लाल परत पूरी तरह सूख जाती है, तब चावल को पानी में भिगोकर और पीसकर तैयार किए गए सफेद घोल की मदद से इसके ऊपर विभिन्न प्रकार की कलात्मक आकृतियां उकेरी जाती हैं। इस तरह लाल और सफेद रंगों का यह आकर्षक संयोजन ऐपण को देखने में बेहद सुंदर बनाता है। मूल रूप से इस कलाकृति को उकेरने के लिए महिलाएं अपने हाथों की उंगलियों का इस्तेमाल करती थीं, हालांकि बदलते वक्त के साथ अब कई जगहों पर ब्रश और अन्य आधुनिक साधनों का भी उपयोग होने लगा है। आधुनिक दौर में ऐपण कला का बदलता स्वरूप इस विषय पर बात करते हुए ऐपण आर्टिस्ट रिचा जोशी बताती हैं कि वर्तमान समय में इस पारंपरिक कला को तैयार करना पहले की तुलना में काफी सुगम हो गया है। आज के दौर में लोग पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ एक्रिलिक और ऑयल पेंट का भी धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं। इसे बनाने के लिए सबसे पहले फर्श, लकड़ी के पाटे या फिर किसी बोर्ड को साफ करके लाल रंग का बेस तैयार किया जाता है। जब यह बेस सूख जाता है, तब सफेद पेंट की सहायता से मां लक्ष्मी के चरण, पवित्र स्वास्तिक, लक्ष्मी चौकी और अन्य पारंपरिक डिजाइन उकेरे जाते हैं। इस काम को बारीकी से अंजाम देने के लिए महीन ब्रश, सफेद एक्रिलिक कोन या थ्रीडी आउटलाइनर का प्रयोग किया जाता है, जिसमें समानांतर रेखाएं और सुंदर बिंदु इस कला की सबसे बड़ी खासियत होती हैं। मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए उकेरे जाते हैं पदचिह्न दीपावली के पावन पर्व पर ऐपण बनाने के पीछे गहरी धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। इस खास दिन पर महिलाएं अपने घर की मुख्य देहली पर मां लक्ष्मी के छोटे-छोटे पैरों के निशान बेहद करीने से बनाती हैं। इन निशानों को हमेशा घर की बाहरी सीमा से अंदर की ओर प्रवेश करते हुए बनाया जाता है। ऐसी अटूट मान्यता है कि ऐसा करने से धन की देवी मां लक्ष्मी सीधे घर में प्रवेश करती हैं, जिससे पूरे परिवार में सुख, शांति और स्थायी समृद्धि का वास होता है। इसके अलावा, ऐपण की इन सुंदर आकृतियों में पवित्र कमल का फूल, स्वस्तिक, मिट्टी के दीपक और अन्य मांगलिक प्रतीकों को भी प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। कमल के फूल को सीधे तौर पर मां लक्ष्मी से जोड़कर देखा जाता है, जबकि स्वास्तिक को हर प्रकार के मंगल और शुभ कार्यों का प्रतीक माना जाता है. मंदिरों और पूजा स्थलों पर विशेष सजावट कुमाऊं क्षेत्र में दिवाली के उल्लास के बीच केवल घरों के मुख्य दरवाजे ही नहीं, बल्कि पूजा स्थल और स्थानीय मंदिर भी ऐपण की कलाकृतियों से जगमगा उठते हैं। पूजा की लकड़ी की चौकी, पवित्र तुलसी के पौधे के आसपास का स्थान और घर के मंदिर के भीतर विशेष और आकर्षक डिजाइन उकेरे जाते हैं। अलग-अलग धार्मिक अनुष्ठानों और पर्वों के अनुसार ऐपण के इन डिजाइनों में भी बदलाव देखने को मिलता है। किसी भी पूजा या अनुष्ठान में इन पारंपरिक आकृतियों का होना एक नई और सकारात्मक शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। ऐपण की रचना करने से न केवल घर का पूरा वातावरण पवित्र और शुद्ध होता है, बल्कि आसपास की तमाम नकारात्मक ऊर्जा भी दूर चली जाती है. पीढ़ियों से महिलाओं के हाथों सुरक्षित है यह विरासत ऐपण महज घर की सजावट तक सीमित कोई सामान्य कला नहीं है, बल्कि यह कुमाऊं की सांस्कृतिक विरासत का एक बेहद अहम और जीवंत हिस्सा है। बीते समय में घर की बुजुर्ग महिलाएं अपने परिवार की नई बहुओं और बेटियों को ऐपण बनाने की यह बारीक कला सिखाती थीं, जिससे यह परंपरा एक पीढ़ी से निकलकर सीधे दूसरी पीढ़ी तक सुरक्षित पहुंचती रही। हालांकि, समय के चक्र के साथ ऐपण के भौतिक स्वरूप में काफी बदलाव आ चुके हैं। अब इस पारंपरिक कला को केवल जमीन या फर्श तक सीमित न रखकर कपड़ों, लकड़ी के सामान, पूजा की थालियों, कैनवास और अन्य कई सजावटी वस्तुओं पर भी बड़े पैमाने पर उकेरा जाने लगा है। स्वरोजगार का जरिया और जड़ों से जुड़ाव आज के समय में क्षेत्र की कई महिलाएं इस पारंपरिक कला को अपने लिए स्वरोजगार का एक बेहतरीन माध्यम भी बना रही हैं। हालांकि, आधुनिक रंगों, रेडीमेड स्टिकर और नए डिजाइनों के लगातार बढ़ते चलन के बावजूद दीपावली के खास मौके पर गेरू और चावल के घोल से पारंपरिक ऐपण बनाने का मूल महत्व आज भी पूरी तरह बरकरार है। कुमाऊं में दिवाली का यह पूरा त्योहार ऐपण के बिना अधूरा और फीका माना जाता है। यह अनूठी परंपरा आज की आधुनिक होती नई पीढ़ी को अपनी प्राचीन जड़ों, संस्कृति और समृद्ध लोक विरासत से मजबूती से जोड़े रखने का एक बेहद सार्थक काम कर रही है. इसका आप पर असर कुमाऊं क्षेत्र के निवासियों और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े लोगों के लिए यह लोककला घर-परिवार में समृद्धि और सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक बनती है। • सांस्कृतिक पहचान: कुमाऊं क्षेत्र के निवासियों को अपनी प्राचीन लोक कला और सांस्कृतिक जड़ों को सहेजने और आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है। • स्थानीय स्वरोजगार: ऐपण कला के आधुनिक उत्पादों और सजावटी वस्तुओं की मांग बढ़ने से स्थानीय महिला कलाकारों को आर्थिक लाभ और रोजगार के नए अवसर मिलते हैं। • त्योहारी महत्व: दीपावली के अवसर पर घरों की पारंपरिक सजावट से घर का माहौल पवित्र और सकारात्मक बनता है। • पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान: यह परंपरा परिवारों में ज्ञान के हस्तांतरण को बढ़ावा देती है जिससे युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति से जुड़ी रहती है। ऐसा क्यों हुआ कुमाऊं में दीपावली के दौरान ऐपण के पारंपरिक उपयोग के पीछे गहरी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक मान्यताएं काम करती हैं। यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है ताकि घर में देवताओं का स्वागत किया जा सके। • धार्मिक मान्यता: प्राचीन मान्यताओं के अनुसार घर की देहली पर मां लक्ष्मी के पदचिह्न बनाने से देवी का घर में आगमन होता है और सुख-शांति बनी रहती है। • प्राकृतिक सामग्री का उपयोग: पुराने समय में आसानी से उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों जैसे गेरू और चावल के घोल का उपयोग करके फर्श को सजाने की परंपरा शुरू हुई थी। • पीढ़ीगत हस्तांतरण: बुजुर्ग महिलाओं द्वारा घर की बहुओं और बेटियों को यह कला सिखाए जाने के कारण यह लोककला सदियों से जीवित रही है। • सकारात्मक ऊर्जा: पूजा स्थलों और चौखटों पर शुभ आकृतियां उकेरने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और वातावरण में पवित्रता आती है। सवाल-जवाब 1. ऐपण कला क्या है? ऐपण उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की एक पारंपरिक लोककला है जिसे घरों की देहली, आंगन और पूजा स्थलों पर सजावट के लिए बनाया जाता है। 2. ऐपण बनाने के लिए किन पारंपरिक सामग्रियों का उपयोग किया जाता है? पारंपरिक रूप से ऐपण बनाने के लिए गेरू और चावल के सफेद घोल का उपयोग किया जाता है। 3. दीपावली पर ऐपण में पैरों के निशान क्यों बनाए जाते हैं? दीपावली पर मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए उनके छोटे-छोटे पैरों के निशान घर के बाहर से अंदर की ओर बनाए जाते हैं। 4. क्या आधुनिक समय में ऐपण बनाने के तरीके में कोई बदलाव आया है? हां, वर्तमान में लोग पारंपरिक सामग्री के अलावा एक्रिलिक पेंट, ऑयल पेंट, ब्रश और थ्रीडी आउटलाइनर का भी उपयोग करने लगे हैं। 5. ऐपण कला को रोजगार का जरिया कैसे बनाया जा रहा है? कई महिलाएं अब ऐपण को कपड़ों, लकड़ी, पूजा की थालियों और कैनवास पर बनाकर स्वरोजगार का माध्यम बना रही हैं। https://trendkia.com/culture/kumaun-ki-dipavali-men-kyon-khasa-hai-aipan-kala-janie-isake-pichhe-ki-parnpara-aura-mahatva-57218 TrendKia — Har trend, sabse pehle.