मिथिलांचल में बुरी नजर से सुरक्षा कवच बनती है चुमौउन परंपरा, जानिए इसका अनुष्ठान और महत्व मिथिला क्षेत्र में सदियों से चली आ रही चुमौउन की परंपरा मांगलिक और अन्य कार्यों में नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करने वाला आध्यात्मिक कवच मानी जाती है। मिथिलांचल की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर में सदियों से चली आ रही अनेक ऐसी प्रथाएं शामिल हैं, जिनका अपना गहरा धार्मिक आधार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। इस क्षेत्र में निभाई जाने वाली इन्हीं प्रमुख रीतियों में 'चुमौउन' का अनुष्ठान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। दरभंगा सहित पूरे मिथिला क्षेत्र में इस रीति को शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के अवसरों पर विधिपूर्वक संपन्न किया जाता है। इसका मुख्य ध्येय संबंधित व्यक्ति को हर प्रकार के दुष्प्रभाव, अमंगलकारी शक्तियों और बुरी नजर से सुरक्षित रखना होता है। मांगलिक अवसरों पर अदृश्य शक्तियों से रक्षा की मान्यता स्थानीय मान्यताओं के अनुसार विवाह अथवा किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान के दौरान मुख्य व्यक्ति पर नकारात्मक ऊर्जा या अदृश्य शक्तियों का असर पड़ने की संभावना बनी रहती है। इन्हीं दुष्प्रभावों को समाप्त करने के उद्देश्य से चुमौउन की क्रिया संपन्न कराई जाती है। कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभागाध्यक्ष डॉ. कुणाल कुमार झा का कहना है कि यह अनुष्ठान वास्तव में एक अभेद्य सुरक्षा कवच के समान कार्य करता है, जो व्यक्ति को सभी तरह की अनहोनी और अशुभ घटनाओं से दूर रखता है। बांस की डलिया और दूब-अक्षत से संपन्न होती है विधि इस पूरी प्रक्रिया में परिवार और समाज की सुहागिन महिलाओं की प्रमुख भूमिका रहती है। महिलाएं बांस की बनी डलिया यानी दौरा में धान, पान का पत्ता, दूब और प्रसाद सजाकर सबसे पहले कुल देवता की विधिवत अर्चना करती हैं। इसके उपरांत जिस मुख्य व्यक्ति के निमित्त यह अनुष्ठान हो रहा होता है, जैसे कि नवविवाहित दूल्हा या दुल्हन, उनके विभिन्न अंगों का चुमौउन किया जाता है। यह क्रम हमेशा पैर से आरंभ होकर सिर की ओर बढ़ता है। इस दौरान दूब और धान अर्थात अक्षत का उपयोग करते हुए शरीर के प्रत्येक अंग का स्पर्श कराया जाता है। इस तांत्रिक व पारंपरिक प्रक्रिया के संपन्न होने के बाद परिवार के वरिष्ठ सदस्य और बड़े-बुजुर्ग उस व्यक्ति के ऊपर दूब और अक्षत छिड़ककर अपना स्नेहपूर्ण आशीर्वाद प्रदान करते हैं। आध्यात्मिक उपचार और सकारात्मक ऊर्जा के लाभ डॉ. कुणाल कुमार झा के अनुसार चुमौउन केवल एक लोकाचार भर नहीं है, बल्कि यह एक प्रभावी आध्यात्मिक उपचार पद्धति भी है। इसके तीन प्रमुख लाभ बताए गए हैं • नकारात्मक ऊर्जा का निवारण: यह रीति मनुष्य के आभामंडल में प्रवेश कर चुकी नकारात्मक तरंगों को पूरी तरह समाप्त कर देती है। • सकारात्मकता और मानसिक शांति: अनुष्ठान के प्रभाव से संबंधित व्यक्ति के मन में सकारात्मक भावों का संचार होता है और उसे आंतरिक शांति की अनुभूति होती है। • बड़ों का शुभाशीर्वाद: परिवार के बुजुर्गों द्वारा दिए गए दूब-अक्षत के आशीर्वाद से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है तथा मार्ग की बाधाएं दूर होती हैं। यह रिवाज मिथिला के गूढ़ सांस्कृतिक चिंतन और आध्यात्मिक दर्शन को दर्शाता है, जिसे आज भी लोग अटूट आस्था और निष्ठा के साथ निभाते आ रहे हैं। इसका आप पर असर यह पारंपरिक रीति-रिवाज मिथिलांचल के परिवारों के सामाजिक और पारिवारिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। • मिथिलांचल में: विवाह और महत्वपूर्ण संस्कारों के दौरान परिवारों में इस विधि का विधिवत पालन किया जाता है। इससे नवदंपति अथवा मुख्य व्यक्ति को पारिवारिक समर्थन और बड़े-बुजुर्गों का सुरक्षात्मक आशीर्वाद प्राप्त होता है। • भारत में: सांस्कृतिक परंपराओं में रुचि रखने वाले लोग भारतीय लोक रीति-रिवाजों के दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझ सकते हैं। यह अनुष्ठान दर्शाता है कि किस प्रकार प्राचीन मान्यताएं परिवार को जोड़ने और सदस्यों को मानसिक संबल देने का माध्यम बनती हैं। ऐसा क्यों हुआ मिथिला में चुमौउन की परंपरा जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ों पर व्यक्ति की मानसिक शांति और अमंगलकारी प्रभावों से सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से शुरू हुई थी। • बुरी नजर और अमंगल से बचाव: लोक मान्यताओं के अनुसार नए जीवन की शुरुआत या बड़े अनुष्ठानों के दौरान व्यक्ति पर नकारात्मक तरंगों का प्रभाव पड़ने का भय रहता है। इसी प्रभाव को बेअसर करने के लिए प्राचीन काल से यह सुरक्षात्मक विधान अपनाया गया। • शुभ प्रतीकों का उपयोग: बांस की डलिया में दूब, धान और पान के पत्तों को जीवन, समृद्धि और उर्वरता का प्रतीक माना जाता है। इन प्राकृतिक तत्वों के स्पर्श से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा के संचार की धारणा सदियों से चली आ रही है। • कुल देवता और वरिष्ठों का संबल: किसी भी बड़े कार्य से पूर्व कुल देवता की पूजा और वरिष्ठों के आशीर्वाद को हर बाधा से मुक्ति का साधन माना जाता रहा है। यही कारण है कि यह प्रथा आज भी पूरी श्रद्धा से जारी है। सवाल-जवाब 1. मिथिला में चुमौउन का मुख्य उद्देश्य क्या है? इसका मुख्य उद्देश्य संबंधित व्यक्ति को बुरी नजर, नकारात्मक ऊर्जा और अनहोनी घटनाओं से सुरक्षित रखना है। 2. चुमौउन की प्रक्रिया किन अवसरों पर की जाती है? यह अनुष्ठान विवाह जैसे मांगलिक कार्यों के साथ-साथ शुभ और अशुभ दोनों तरह के विशेष प्रसंगों पर किया जाता है। 3. चुमौउन की विधि में किन सामग्रियों का प्रयोग होता है? बांस की डलिया (दौरा) में धान, पान का पत्ता, दूब और प्रसाद रखकर कुल देवता की पूजा और स्पर्श अनुष्ठान किया जाता है। 4. शरीर के अंगों के स्पर्श का सही क्रम क्या है? चुमौउन की क्रिया पैर से शुरू होकर सिर तक की जाती है, जिसमें दूब और अक्षत से अंगों को छुआ जाता है। 5. विशेषज्ञों के अनुसार इसके आध्यात्मिक लाभ क्या हैं? यह आभामंडल से नकारात्मक ऊर्जा हटाता है, मानसिक शांति लाता है और बड़ों के आशीर्वाद से सुख-समृद्धि प्रदान करता है। https://trendkia.com/culture/mithilanchal-men-buri-najara-se-suraksha-kavacha-banati-hai-chumouun-parnpara-janie-isaka-anushthana-aura-mahatva-41519 TrendKia — Har trend, sabse pehle.