# मिट्टी की दहलीज पर मुग्गु कला से परंपरा सहेज रहीं कांतम्मा अम्मा

> ग्रामीण परिवेश में कच्चे मकान की चौखट पर चावल के आटे और रोलर से मुग्गु कला उकेरतीं बुजुर्ग कांतम्मा अम्मा सादगी और सांस्कृतिक धरोहर की जीवंत मिसाल बनी हैं.

**Type:** article · **Category:** कल्चर · **Published:** 2026-10-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/culture/mitti-ki-dahalija-para-muggu-kala-se-parnpara-saheja-rahin-kantamma-amma-42729 · **Language:** Hindi
**Tags:** मुग्गु कला, कांतम्मा अम्मा, ग्रामीण भारत, लोक कला, पारंपरिक जीवन, रंगोली डिजाइन

कंक्रीट की गगनचुंबी इमारतों, चमचमाती टाइल्स और आधुनिक बनावट के दौर में भी देश के ग्रामीण आंचल में पारंपरिक जीवन की सौंधी महक जिंदा है. फूस की छत, हाथ से लीपा हुआ आंगन और मिट्टी की सोंधी खुशबू आज भी इंसान को उसकी बुनियादी जड़ों और मानसिक सुकून से जोड़े रखती है. इसी सादगी भरे देसी हुनर और पुरानी जीवनशैली का जीवंत रूप बुजुर्ग कांतम्मा अम्मा की मिट्टी की दहलीज पर साफ झलकता है, जहां उनके हाथों से सजी लोक कला बीते जमाने की खूबसूरत यादों को ताजा कर देती है.

## कच्चे ओटले पर मुग्गु और चावल के आटे का जादू
बुजुर्ग कांतम्मा अम्मा अपने मिट्टी के कच्चे मकान की चौखट और ओटले पर चूने तथा चावल के आटे के इस्तेमाल से मुग्गु की मनमोहक डिजाइन बनाती हैं. इस पारंपरिक कला को बारीकी और खूबसूरती से उकेरने के लिए वह एक खास जालीदार रोलर उपकरण की मदद लेती हैं. इस रोलर टूल के भीतर रंगोली या मुग्गु का बारीक सफेद पाउडर भरा जाता है, और जैसे ही इसे जमीन पर सरकाया जाता है, फर्श पर बिल्कुल सीधी, सममित और आकर्षक सफेद रेखाएं अपने आप छप जाती हैं.

## साधारण औजार और लोक कला का संरक्षण
हाथ से लीपे गए गीले ओटले की भूरी पृष्ठभूमि पर सफेद धारियों की यह बनावट पूरे घर के प्रवेश द्वार को बेहद मोहक रूप देती है. यह दृश्य ग्रामीण महिलाओं की सौंदर्य दृष्टि और रचनात्मक कौशल का सटीक प्रमाण है. इसके साथ ही यह कला दर्शाती है कि बिना किसी तामझाम या महंगे साधनों के, बेहद सामान्य और पारंपरिक उपकरणों के सहारे भी सदियों पुरानी लोक परंपराओं को सहजता से आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवित रखा जा सकता है.

## सामाजिक जुड़ाव और सामुदायिक संवाद का मंच
गांवों में घर की चौखट या ओटला केवल आने-जाने का रास्ता भर नहीं होता, बल्कि यह पूरे मोहल्ले और परिवार के सामाजिक मेलजोल का मुख्य केंद्र माना जाता है. खासकर तपती गर्मियों के मौसम में, दोपहर ढलने पर और शाम के वक्त बच्चे इसी ठंडी जमीन पर बैठकर खेलकूद करते हैं, जबकि बुजुर्ग आपस में बैठकर दिनभर की बातें और सुख-दुख साझा करते हैं. महानगरों के बंद फ्लैटों और चारदीवारी के आधुनिक माहौल में ऐसा सहज खुलापन, अपनापन और सामुदायिक जुड़ाव अब दुर्लभ हो चला है.

## जड़ों और सांस्कृतिक पहचान का अहम संदेश
कांतम्मा अम्मा का यह घर और उनकी सादगी भरी कला समाज को एक जरूरी मानवीय संदेश देती है. कोई व्यक्ति जीवन में कितनी भी आर्थिक समृद्धि हासिल कर ले या आलीशान महलों में बस जाए, उसे उस मिट्टी और सादे परिवेश का आदर कभी नहीं छोड़ना चाहिए जहां से उसकी बुनियाद शुरू हुई थी. उनकी यह दहलीज हमें पुरानी मेहनत, अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं के प्रति कृतज्ञ रहने की प्रेरणा देती है.

## इसका आप पर असर
यह समाचार पारंपरिक कला और ग्रामीण जीवनशैली के संरक्षण से जुड़े व्यावहारिक पहलुओं को सामने लाता है.

- **कला प्रेमियों के लिए:** यह दिखाता है कि बिना महंगे साजो-सामान के भी स्वदेशी औजारों से समृद्ध लोक कला को जीवित रखा जा सकता है. पाठक अपने घरों में पर्यावरण के अनुकूल प्राकृतिक रंगोली और सजावट की पुरानी पद्धतियों को दोबारा अपना सकते हैं.
- **शहरी परिवारों के लिए:** कंक्रीट के मकानों के बीच सामाजिक अलगाव को कम करने की प्रेरणा मिलती है. लोग अपने पड़ोसियों और परिजनों के साथ साझा संवाद के लिए खुले स्थानों के महत्व को समझ सकते हैं.
- **नई पीढ़ी के लिए:** अपनी सांस्कृतिक जड़ों और पूर्वजों की जीवनशैली को समझने का अवसर बनता है. युवा पीढ़ी बिना किसी हीनभावना के अपनी मूल परंपराओं पर गर्व करना सीख सकती है.
- **पर्यावरण की दृष्टि से:** रासायनिक रंगों की जगह चावल के आटे और प्राकृतिक चूने के उपयोग को बढ़ावा मिलता है. इससे मिट्टी और पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए उत्सव और कला का आनंद लिया जा सकता है.

## ऐसा क्यों हुआ
बुजुर्ग कांतम्मा अम्मा द्वारा ओटले पर मुग्गु कला उकेरने की यह परंपरा सदियों पुरानी ग्रामीण जीवनशैली और सामुदायिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है.

- **दैनिक सांस्कृतिक अनुष्ठान:** भारतीय गांवों में सुबह या शाम के समय घर की दहलीज को लीपना और उस पर चावल के आटे से डिजाइन बनाना शुभ और सौंदर्यपरक माना जाता रहा है. यह प्रक्रिया घर के प्रवेश द्वार को स्वच्छ और आकर्षक बनाने की सहज परंपरा का हिस्सा है.
- **सुलभ देसी तकनीक:** जालीदार रोलर उपकरण का उपयोग इसलिए किया जाता है ताकि बिना अधिक शारीरिक थकावट के सुंदर और सटीक रेखाएं बनाई जा सकें. यह सरल यंत्र बुजुर्ग महिलाओं को भी बिना झुके या अधिक प्रयास किए कला सजाने की सुविधा देता है.
- **सामाजिक संरचना की बनावट:** ग्रामीण मकानों में ओटला बैठने, बात करने और आराम करने के लिए बनाया जाता था. इसी सामाजिक उपयोगिता के कारण दहलीज को साफ और सुसज्जित रखने का रिवाज पीढ़ियों से चला आ रहा है.

## सवाल-जवाब

### 1. कांतम्मा अम्मा अपने घर की चौखट पर कौन सी कला सजाती हैं?
वह अपने मिट्टी के कच्चे मकान की चौखट और ओटले पर चूने और चावल के आटे की मदद से पारंपरिक मुग्गु कला की डिजाइन बनाती हैं.

### 2. मुग्गु डिजाइन बनाने के लिए वह किस औजार का उपयोग करती हैं?
वह एक विशेष जालीदार रोलर टूल का इस्तेमाल करती हैं, जिसमें रंगोली पाउडर भरकर जमीन पर घुमाने से सीधी और सुंदर सफेद रेखाएं उभर आती हैं.

### 3. ग्रामीण परिवेश में घर का ओटला किस काम आता है?
ओटला केवल प्रवेश द्वार नहीं होता, बल्कि गर्मियों के दिनों में बच्चों के खेलने और बुजुर्गों के सुख-दुख साझा करने का मुख्य सामाजिक केंद्र होता है.

### 4. कांतम्मा अम्मा की यह जीवनशैली समाज को क्या संदेश देती है?
यह दृश्य संदेश देता है कि इंसान चाहे कितनी भी तरक्की कर ले, उसे अपनी जड़ों, संस्कृति और मेहनत के पुराने दिनों का हमेशा सम्मान करना चाहिए.

## प्रेरणा और सबक
बुजुर्ग कांतम्मा अम्मा की यह सादगी भरी पहल जीवन और संस्कृति को सहेजने की अनमोल सीख देती है.

- **सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव:** आधुनिकता के दौर में भी अपनी मूल परंपराओं को सहजता से अपनाए रखना इंसान को वास्तविक मानसिक शांति देता है.
- **सीमित साधनों में सृजनशीलता:** महंगी चीजों के अभाव में भी साधारण जालीदार रोलर और चावल के आटे जैसे प्राकृतिक सामान से उच्च कोटि की कलात्मकता दिखाई जा सकती है.
- **सादगी और श्रम का सम्मान:** मिट्टी के कच्चे घर और देसी हुनर को सहेजकर कांतम्मा अम्मा यह संदेश देती हैं कि मेहनत और सादा जीवन ही असली मानवीय गरिमा है.
- **सामुदायिक प्रेम का पोषण:** घर की चौखट को केवल निजी संपत्ति न मानकर आपसी मेलजोल और बच्चों के खेलने का केंद्र बनाए रखना सामाजिक सौहार्द को मजबूत करता है.

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