पाली मारवाड़ का ऐतिहासिक बलिदान जब सुल्तान खिलजी के आक्रमण पर पालीवाल ब्राह्मणों ने त्यागा था अपना शहर राजस्थान के पाली मारवाड़ में 13वीं सदी के खिलजी आक्रमण के दौरान अपने धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए हजारों पालीवाल ब्राह्मणों ने प्राणों का उत्सर्ग किया था, जिसके स्मरण में यह समाज रक्षाबंधन को शोक दिवस के रूप में मनाता है। राजस्थान की ऐतिहासिक भूमि पाली मारवाड़ में रक्षाबंधन की पावन तिथि खुशियों के साथ-साथ एक महान त्याग और ऐतिहासिक त्रासदी की स्मृति लेकर आती है। श्री आदि गौड़ वंशीय पालीवाल ब्राह्मण समाज के लिए यह दिन उत्सव का नहीं, बल्कि अपने स्वाभिमान और धर्म की रक्षा में प्राण न्योछावर करने वाले वीर पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का अवसर होता है। छठवीं शताब्दी से इस क्षेत्र में स्थापित यह समाज अपनी आर्थिक संपन्नता, अनूठे सामाजिक तंत्र और दूरदर्शी दृष्टिकोण के लिए पूरे पश्चिमी भारत में प्रसिद्ध था। एक ईंट और एक रुपये की परंपरा तथा समृद्ध पाली की स्थापना ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, श्री आदि गौड़ वंशीय पालीवाल ब्राह्मण विक्रम संवत 534 में पाली नगर में आकर बसे थे। समय के साथ यह शहर व्यापार और संस्कृति का एक विशाल केंद्र बन गया, जहां समाज की जनसंख्या एक लाख से अधिक पहुंच गई थी। पालीवाल समाज ने आपसी सहयोग और सहकार की एक ऐसी मिसाल कायम की थी जो इतिहास में विरली ही देखने को मिलती है। जब भी कोई नया निर्धन या बेघर ब्राह्मण परिवार पाली में प्रवेश करता था, तो नगर का प्रत्येक स्थापित परिवार उसे सहायता के रूप में 'एक ईंट और एक रुपया' प्रदान करता था। इस संगठित सहयोग से नया परिवार रातों-रात अपना मकान बनाने और व्यापार शुरू करने में सक्षम हो जाता था। उच्च कोटि के विद्वान और धार्मिक अनुष्ठानों के जानकार होने के साथ-साथ यह समाज व्यापार और वाणिज्य विद्या में भी अत्यंत निपुण था। स्थानीय लुटेरों तथा बाहरी आक्रमणकारियों से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पालीवाल ब्राह्मणों ने शासन और रक्षा का दायित्व राठौड़ वंश के संस्थापक राजा सीहा को सौंपा था। सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी का आक्रमण और भीषण युद्ध विक्रम संवत 1347-48 (सन 1291-92) के समय दिल्ली सल्तनत के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी (फिरोजशाह द्वितीय) की दृष्टि पाली नगर की अगाध धन-संपदा पर पड़ी। पाली की समृद्धि से आकर्षित होकर सुल्तान ने विशाल सैन्य बल के साथ शहर पर अचानक भीषण आक्रमण कर दिया। उस समय पाली के रक्षक राठौड़ वंश के प्रतापी शासक राव सीहा के पुत्र आस्थान थे। राव आस्थान ने पालीवाल ब्राह्मणों और नगरवासियों की सुरक्षा के लिए पराक्रम दिखाते हुए खिलजी की सेना से युद्ध लड़ा और वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। जब खिलजी की सेना सीधे संघर्ष में नगर पर पूर्ण नियंत्रण नहीं पा सकी, तो उसने छल-कपट का सहारा लिया। सुल्तान की सेना ने पाली के मुख्य पेयजल स्रोतों लोहड़िया तालाब और लाखोटिया तालाब को अपवित्र करने के लिए उनमें गोवंश काटकर फेंक दिया। जल के दूषित हो जाने से नगर में पेय जल का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया। धौला चौतरा की पावन भूमि पर महाबलिदान श्रावणी पूर्णिमा के पावन दिन समाज के हजारों पुरुष और युवा परंपरा अनुसार लोहड़िया तथा लाखोटिया तालाबों के तट पर धार्मिक उपाकर्म और श्रावणी तर्पण का अनुष्ठान कर रहे थे। उसी समय खिलजी की आक्रामक सेना ने तालाबों को घेर लिया। अपने पवित्र धर्म, संस्कृति और आत्मसम्मान की रक्षा हेतु हजारों पालीवाल ब्राह्मणों ने यज्ञोपवीत धारण किए हुए ही केसरिया बाना पहना और हाथ में शस्त्र उठाकर युद्धभूमि में छलांग लगा दी। इस असमान और भीषण नरसंहार में हजारों ब्राह्मण शूरवीर शहीद हो गए और अनगिनत माताएं तथा बहनें विधवा हो गईं। युद्ध की विभीषिका का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि वीरगति को प्राप्त हुए शहीदों के पार्थिव शरीर से उतारी गई जनेऊ का कुल वजन 9 मण था। वहीं, विधवा हुई माताओं और बहनों द्वारा उतारे गए हाथीदांत के चूड़ों का वजन 84 मण दर्ज किया गया था। इन पवित्र धार्मिक अवशेषों को आक्रांताओं द्वारा अपवित्र किए जाने से बचाने के लिए पाली के 'धौला चौतरा' स्थित ऐतिहासिक कुएं में ससम्मान दफना दिया गया, जो आज भी इस अप्रतिम बलिदान की गवाही देता है। सामूहिक परित्याग और जैसलमेर में 84 गांवों की स्थापना इस भीषण विध्वंस और नरसंहार के पश्चात, जीवित बचे पालीवाल समाज के प्रबुद्धजनों ने अपने आत्मसम्मान से समझौता न करने का संकल्प लिया। उसी रक्षाबंधन के दिन पूरे समाज ने सर्वसम्मति से अपनी प्रिय जन्मभूमि पाली नगर का सामूहिक रूप से परित्याग कर दिया। समृद्ध हवेलियों और व्यापार को छोड़कर समाज देश के विभिन्न क्षेत्रों की ओर पलायन कर गया। इनमें से एक बड़ा वर्ग जैसलमेर रियासत में पहुंचा, जहां उन्होंने अपनी मेहनत और दूरदर्शिता से कुलधरा और खाभा सहित 84 नए समृद्ध गांवों की स्थापना की। आज भी इस समाज का प्रत्येक सदस्य अपनी प्राचीन परंपरा का निष्ठापूर्वक पालन करता है। पालीवाल धाम पर श्रद्धांजलि और वर्तमान परंपरा राजस्थान पालीवाल समाज के उपाध्यक्ष ऋषिदत्त पालीवाल के अनुसार, श्रावणी पूर्णिमा के दिन पालीवाल समाज रक्षाबंधन का त्योहार हर्षोल्लास से नहीं मनाता। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र नहीं बांधतीं, बल्कि पूरा समाज एकजुट होकर तालाबों के तट पर तर्पण करता है। पाली स्थित धौला चौतरा तथा करोड़ों रुपये की लागत से विकसित पालीवाल धाम पर देशभर से हजारों की संख्या में समाजजन एकत्र होकर अपने अमर पूर्वजों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। यह स्थान आज भी धर्म, त्याग और स्वाभिमान की अमर गाथा की प्रेरणा देता है। इसका आप पर असर • भारत में: यह ऐतिहासिक गाथा देशवासियों को सामूहिक सहकार, धर्म रक्षा और स्वाभिमान के लिए दिए गए अभूतपूर्व त्याग की प्रेरणा देती है। • पाली मारवाड़ में: स्थानीय निवासियों और पालीवाल समाज के लिए धौला चौतरा तथा पालीवाल धाम पूर्वजों के अप्रतिम बलिदान का एक पवित्र प्रतीक स्थल है। सवाल-जवाब 1. पालीवाल समाज रक्षाबंधन पर राखी क्यों नहीं बांधता? विक्रम संवत 1347-48 में श्रावणी पूर्णिमा के दिन सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान हजारों पालीवाल ब्राह्मणों ने धर्म और स्वाभिमान की रक्षा में वीरगति प्राप्त की थी, इसलिए यह समाज इस दिन को शोक और तर्पण दिवस के रूप में मनाता है। 2. पालीवाल समाज की 'एक ईंट और एक रुपया' की परंपरा क्या थी? पाली में नए आने वाले किसी भी निर्धन ब्राह्मण परिवार को बसाने के लिए नगर का प्रत्येक घर एक ईंट और एक रुपया सहयोग में देता था, जिससे नया परिवार रातों-रात सक्षम हो जाता था। 3. धौला चौतरा पर 9 मण जनेऊ और 84 मण चूड़े क्यों दफनाए गए थे? खिलजी के आक्रमण के बाद शहीद हुए ब्राह्मणों के शरीर से उतारी गई 9 मण जनेऊ और विधवा हुई महिलाओं के 84 मण हाथीदांत के चूड़ों को अपवित्र होने से बचाने के लिए धौला चौतरा के कुएं में दफनाया गया था। 4. पाली छोड़कर पलायन करने के बाद पालीवाल समाज ने कहां नए गांव बसाए? पालीवाल समाज के लोगों ने रक्षाबंधन के दिन सामूहिक रूप से शहर छोड़ दिया और जैसलमेर रियासत में जाकर कुलधरा और खाभा सहित 84 नए गांव बसाए। 5. पाली में युद्ध के समय पालीवाल समाज के रक्षक कौन थे? पाली की सुरक्षा का दायित्व राठौड़ शासक राव सीहा के पुत्र राव आस्थान पर था, जो खिलजी की सेना से युद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। प्रेरणा और सबक पालीवाल समाज का इतिहास विपरीत परिस्थितियों में एकजुटता और स्वाभिमान से जीने की अमूल्य सीख देता है: • सामूहिक सहकार की शक्ति: 'एक ईंट और एक रुपया' की परंपरा यह सिखाती है कि परस्पर सहयोग से किसी भी बेघर या जरूरतमंद परिवार को स्वावलंबी बनाया जा सकता है। • स्वाभिमान सर्वोपरि: अनैतिक दबाव या उत्पीड़न के आगे झुकने के बजाय अपने सिद्धांतों और आत्मसम्मान के लिए खड़ा होना चाहिए। • विपदा में नया निर्माण: जन्मभूमि छूटने के बाद भी पालीवाल समाज ने हताश होने के बजाय जैसलमेर में 84 नए समृद्ध गांव बसाकर पुननिर्माण की मिसाल पेश की। https://trendkia.com/culture/pali-marwar-ka-aitihasika-balidana-jaba-sultan-khilji-ke-akramana-para-paliwal-brahmins-ne-tyaga-tha-apana-shahara-18388 TrendKia — Har trend, sabse pehle.