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  "type": "article",
  "title": "पति की मौत के बाद खुद संभाला राज सिंहासन, 50 लड़ाइयां लड़ने वालीं महारानी दुर्गावती को गोंड समाज आज भी पूजता है देवी मानकर",
  "summary": "उत्तर प्रदेश के बांदा में जन्मीं महारानी वीरांगना दुर्गावती ने पति की मौत के बाद खुद अपने राज्य की गद्दी संभाली और शासक के रूप में करीब 50 लड़ाइयां लड़ीं, आखिरी लड़ाई में हार मानने की बजाय उन्होंने खुद अपने खंजर से वीरगति को गले लगाया, जिसके बाद गोंड समाज आज भी उन्हें देवी मानकर पूजता है।",
  "content": "इतिहास में ऐसी बहुत कम महिलाएं मिलती हैं जिन्हें उनका समाज आज भी अपनी देवी मानकर पूजता है। महारानी वीरांगना दुर्गावती देवी ऐसी ही एक शख्सियत हैं, जो अपने समाज के लिए लड़ाई लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुई थीं और इसके बाद उनका समाज उन्हें देवी के रूप में पूजने लगा। आइए जानते हैं कि आखिर कौन थीं महारानी वीरांगना दुर्गावती और क्यों गोंड समाज उन्हें आज भी देवी मानता है।\n\nपप्पू गोंड बताते हैं कि महारानी वीरांगना दुर्गावती उन्हीं के समाज यानी गोंड समाज से आती हैं। उनका जन्म 5 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में हुआ था। बड़ी होने पर उनका विवाह मध्य प्रदेश के जबलपुर में दलपत से हुआ, जो उस दौर में मुगल शासन के अधीन वहां के राजा हुआ करते थे। दोनों का साथ करीब 12 से 14 साल तक रहा और इस दौरान उनके एक पुत्र भी हुआ। लेकिन इसी बीच उनके पति का निधन हो गया और महारानी का यह साथ छूट गया।\n\nपति के निधन के बाद खुद संभाली सत्ता, लड़ीं करीब 50 लड़ाइयां\nपति की मौत के बाद महारानी वीरांगना दुर्गावती ने हिम्मत नहीं हारी और खुद अपने साम्राज्य की गद्दी संभाल ली। उस दौर में एक महिला होते हुए भी उन्होंने शासक के तौर पर राज-काज चलाया और करीब 50 लड़ाइयों का नेतृत्व किया। यह उनके साहस और नेतृत्व क्षमता को दिखाता है कि पति के जाने के बाद भी उन्होंने अपने राज्य की जिम्मेदारी अकेले उठाई।\n\nआसिफ खान से आखिरी लड़ाई में हार की बजाय चुनी वीरगति\n24 जून 1664 ईस्वी में आसिफ खान के साथ हुई आखिरी लड़ाई में भी महारानी वीरांगना दुर्गावती ने हिम्मत नहीं हारी। हालात उनके खिलाफ होते चले गए, लेकिन उन्होंने हार स्वीकार करना गंवारा नहीं समझा। बजाय आसिफ खान के हाथ लगने के, उन्होंने खुद अपने खंजर से खुद को मारकर अपनी मौत को कबूल कर लिया और वीरगति को प्राप्त हो गईं। उनका यह बलिदान ही आगे चलकर उनके समाज के लिए उन्हें देवी का दर्जा दिला गया। कहा जाता है कि गोंड समाज उन्हीं का वंशज है, और यही वजह है कि आज उनकी पूजा बहुत भव्य तरीके से की जाती है तथा जगह-जगह उनके मंदिरों की स्थापना की जा रही है।\n\nमध्य प्रदेश में उनके नाम पर म्यूजियम और रेलवे स्टेशन\nआज के समय में मध्य प्रदेश में महारानी वीरांगना दुर्गावती के नाम पर जगह-जगह म्यूजियम बनाए गए हैं। इतना ही नहीं, उन्हीं के नाम पर एक रेलवे स्टेशन भी है। सरकार की ओर से समय-समय पर उनसे जुड़े स्मृति चिन्हों का अनावरण भी किया जाता रहा है। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद के देवास इलाके में भी उनके मंदिर का अनावरण किया गया है।\n\nहर साल 24 जून को धूमधाम से मनाया जाता है बलिदान दिवस\nमहारानी वीरांगना दुर्गावती के बलिदान की याद में हर साल 24 जून को बलिदान दिवस मनाया जाता है, जो पूरी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस साल भी मऊ में हजारों की संख्या में लोग इकट्ठा हुए और उनका बलिदान दिवस मनाया। यह परंपरा बरसों से चली आ रही है, क्योंकि गोंड समाज खुद को महारानी वीरांगना दुर्गावती का वंशज मानता है और उन्हें अपनी देवी मानकर उनकी पूजा-अर्चना करता है।\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: यह कहानी दिखाती है कि गोंड जैसे आदिवासी समाज अपनी वीरांगनाओं की स्मृति को देवी रूप में कैसे सहेज कर रखते हैं, जिससे देश की सांस्कृतिक और आदिवासी विरासत को समझने में मदद मिलती है।\n• उत्तर प्रदेश के मऊ में: हर साल 24 जून को होने वाले बलिदान दिवस समारोह में हजारों लोग जुटते हैं, इसलिए स्थानीय लोगों और प्रशासन को उस दिन भीड़ और आवागमन को लेकर पहले से तैयारी रखनी चाहिए।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. महारानी वीरांगना दुर्गावती का जन्म कब और कहां हुआ था?\nउनका जन्म 5 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में हुआ था।\n\n2. उनका विवाह किससे हुआ था?\nउनका विवाह मध्य प्रदेश के जबलपुर में दलपत से हुआ, जो उस दौर में मुगल शासन के अधीन वहां के राजा हुआ करते थे।\n\n3. पति की मौत के बाद उन्होंने क्या किया?\nपति के निधन के बाद उन्होंने खुद अपने साम्राज्य की गद्दी संभाली और शासक के तौर पर करीब 50 लड़ाइयां लड़ीं।\n\n4. उनकी मृत्यु कैसे हुई?\n24 जून 1664 ईस्वी में आसिफ खान से आखिरी लड़ाई में हार स्वीकार न करते हुए उन्होंने खुद अपने खंजर से खुद को मारकर वीरगति प्राप्त की।\n\n5. गोंड समाज उन्हें देवी क्यों मानता है?\nगोंड समाज खुद को उनका वंशज मानता है और उनके बलिदान की वजह से उन्हें अपनी देवी के रूप में पूजता है।\n\n6. 24 जून को क्या मनाया जाता है?\n24 जून को उनका बलिदान दिवस पूरी धूमधाम से मनाया जाता है, जिसमें हर साल हजारों लोग शामिल होते हैं।\n\n7. उनके नाम पर आज क्या-क्या मौजूद है?\nमध्य प्रदेश में उनके नाम पर म्यूजियम और एक रेलवे स्टेशन बना है, और उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के देवास में उनका मंदिर भी बनाया गया है।\n\nप्रेरणा और सबक\n• विपरीत हालात में जिम्मेदारी उठाना: पति की मौत के बाद हार मानने की बजाय उन्होंने खुद राज-काज की बागडोर संभाली।\n• बाधाओं से न डरना: उस दौर में महिला होते हुए भी उन्होंने शासक के तौर पर करीब 50 लड़ाइयों का नेतृत्व किया।\n• आखिरी वक्त तक हिम्मत बनाए रखना: आसिफ खान से आखिरी लड़ाई में हालात प्रतिकूल होने पर भी उन्होंने लड़ना जारी रखा और हार नहीं मानी।\n• सम्मान के साथ जीना और मरना: हार स्वीकार करने के बजाय उन्होंने खुद अपने खंजर से वीरगति को गले लगाया, जो आज भी उनके समाज के लिए प्रेरणा बना हुआ है।",
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  "category": "कल्चर",
  "publishedAt": "2026-07-03",
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