पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली कड़ाही, उत्तराखंड के लोहाघाट के कारीगरों का यह हुनर आज भी बेजोड़ है चंपावत के लोहाघाट में हाथ से बनने वाली लोहे की कड़ाही अपनी मजबूती और टिकाऊपन के लिए मशहूर है, और अब दिल्ली, देहरादून, लखनऊ जैसे शहरों तक इसकी मांग पहुंच रही है. उत्तराखंड के चंपावत जिले का लोहाघाट कस्बा वर्षों से पारंपरिक लोहे के बर्तन बनाने के लिए जाना जाता है, और यहां की लोहे की कड़ाही की मांग आज भी कम नहीं हुई है. इसकी मजबूती, टिकाऊपन और मोटी बनावट इसे बाजार में मिलने वाली आम कड़ाहियों से अलग खड़ा करती है. स्थानीय व्यापारी राजेश कुमार बताते हैं कि पहले दूर दराज के गांवों से लोग सिर्फ लोहाघाट की कड़ाही खरीदने के लिए यहां आते थे. आज भी जब कोई पारंपरिक लोहे की कड़ाही लेने पहुंचता है तो सबसे पहला सवाल यही होता है कि क्या यह लोहाघाट में ही बनी है. यह भरोसा दशकों पुरानी गुणवत्ता और कारीगरों की मेहनत की सबसे बड़ी गवाही मानी जाती है. भट्ठी से लेकर हथौड़े तक, ऐसे तैयार होती है कड़ाही लोहाघाट में आज भी कई कारीगर पुराने तरीकों से ही लोहे की कड़ाही बनाते हैं. सबसे पहले लोहे की मोटी चादर को भट्ठी में तपाया जाता है, फिर उसे हथौड़े से लगातार पीट पीटकर कड़ाही का आकार दिया जाता है. इसके बाद किनारों को मजबूती दी जाती है और अंतिम रूप देकर उसे इस्तेमाल के लिए तैयार किया जाता है. मशीनों के इस दौर में भी हाथ से बनी इन कड़ाहियों की मांग बनी हुई है, क्योंकि इनमें कारीगरों की बारीक मेहनत और मजबूती साफ झलकती है. एक बढ़िया कड़ाही तैयार करने में कारीगरों को कई घंटों तक मेहनत करनी पड़ती है. मेलों में सबसे ज्यादा बिकती हैं ये कड़ाहियां उत्तराखंड के नंदा देवी मेले, उत्तरायणी मेले और अन्य स्थानीय मेलों में लोहाघाट की कड़ाही की दुकानें हमेशा भीड़ खींचती हैं. गांव के परिवार इन्हें रसोई के लिए खरीदना पसंद करते हैं, और कई लोग एक ही कड़ाही सालों साल इस्तेमाल करते हैं क्योंकि यह जल्दी खराब नहीं होती. मेलों में घूमने आने वाले पर्यटक भी इसे उत्तराखंड की पहचान मानकर अपने साथ ले जाते हैं. हर साल इन मेलों में कड़ाहियों की अच्छी बिक्री होती है, जिससे कारीगरों को अपनी कला के लिए सही बाजार मिल जाता है. लोहे के बर्तन में खाना पकाने का असर लोहे के बर्तन में खाना बनाने से भोजन में थोड़ी मात्रा में आयरन शामिल हो सकता है, जो आयरन की कमी से जूझ रहे कुछ लोगों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. हालांकि इसे किसी बीमारी का इलाज नहीं माना जा सकता, और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह लेना ही सही रहता है. पुरानी मान्यता यह भी कहती है कि लोहे की कड़ाही में बना खाना स्वाद में अलग होता है. यही वजह है कि आज भी कई घरों में सब्जी, साग, भट्ट की चुड़कानी जैसे पारंपरिक पकवान लोहे की कड़ाही में ही बनाए जाते हैं. अब गैस और इंडक्शन के लिए भी बन रही कड़ाही पहले लोहे की ज्यादातर कड़ाही सिर्फ लकड़ी और मिट्टी के चूल्हों के हिसाब से बनाई जाती थीं. समय बदलने के साथ कारीगरों ने गैस स्टोव और इंडक्शन चूल्हों पर चलने लायक सपाट तले वाली कड़ाही भी बनानी शुरू कर दी है. इसका फायदा यह हुआ कि शहरों में रहने वाले लोग भी अब आसानी से इस पारंपरिक कड़ाही का इस्तेमाल कर पा रहे हैं. बदलती तकनीक के साथ पुराने शिल्प को जोड़ने की यह कोशिश कारीगरों के लिए नए बाजार खोल रही है, और युवाओं का रुझान भी इस काम की तरफ बढ़ा रही है. दिल्ली से लखनऊ तक पहुंच रही लोहाघाट की कड़ाही ऑनलाइन खरीदारी और बाहर बस चुके उत्तराखंडी परिवारों की वजह से लोहाघाट की कड़ाही अब राज्य की सीमा से बाहर भी अपनी जगह बना रही है. दिल्ली, देहरादून, हल्द्वानी, लखनऊ और कई दूसरे शहरों में रहने वाले लोग अब इसे मंगवा रहे हैं. कुछ लोग इसे अपनी पारंपरिक रसोई का जरूरी हिस्सा मानते हैं, तो कुछ सेहत और टिकाऊपन को देखते हुए इसे खरीदते हैं. बढ़ती मांग से स्थानीय कारीगरों को रोजगार के नए मौके मिल रहे हैं, और इस पुराने उद्योग को एक नई पहचान भी मिल रही है. महंगाई और सस्ती नकल से जूझते कारीगर बढ़ती महंगाई, कच्चे माल के दाम में उछाल और मशीन से बने सस्ते बर्तनों की टक्कर के चलते पारंपरिक कारीगरों के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं. इसके बावजूद कई परिवार पीढ़ियों से इस हुनर को आगे बढ़ाते आ रहे हैं. अगर सरकार, हस्तशिल्प विभाग और विपणन से जुड़ी संस्थाओं का साथ मिले तो इस कला को देशभर में नई पहचान दिलाई जा सकती है. प्रशिक्षण और आधुनिक मार्केटिंग की सुविधाएं मिलने पर युवा भी इस व्यवसाय की तरफ आकर्षित हो सकते हैं. सिर्फ बर्तन नहीं, उत्तराखंड की शिल्प विरासत की पहचान लोहाघाट की लोहे की कड़ाही सिर्फ रसोई का एक बर्तन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पारंपरिक शिल्प विरासत का प्रतीक बन चुकी है. यह वहां के कारीगरों की मेहनत, हुनर और सालों के अनुभव की पहचान है. अगर इस हस्तकला को भौगोलिक पहचान यानी GI टैग जैसे संरक्षण, बेहतर ब्रांडिंग और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जोड़ दिया जाए तो इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाया जा सकता है. नई पीढ़ी अगर इस कला को अपनाती रहे तो आने वाले वर्षों में भी लोहाघाट की लोहे की कड़ाही उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान बनकर मजबूती से टिकी रहेगी. इसका आप पर असर • भारत में: जो लोग टिकाऊ और सेहत के लिहाज से बेहतर बर्तन खोज रहे हैं, वे अब दिल्ली, देहरादून, हल्द्वानी और लखनऊ जैसे शहरों से भी लोहाघाट की कड़ाही ऑनलाइन मंगवा सकते हैं. • उत्तराखंड में: चंपावत के लोहाघाट के स्थानीय कारीगरों को बढ़ती मांग से रोजगार के नए मौके मिल रहे हैं, जिससे यह पारंपरिक उद्योग जीवित रह पा रहा है. सवाल-जवाब 1. लोहाघाट कहां स्थित है? लोहाघाट उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्थित है और यह पारंपरिक लोहे के बर्तनों के लिए प्रसिद्ध है. 2. लोहाघाट की कड़ाही इतनी खास क्यों मानी जाती है? इसकी मजबूती, मोटी बनावट और टिकाऊपन इसे आम बाजार की कड़ाहियों से अलग बनाते हैं, इसलिए खरीदार पहले यही पूछते हैं कि क्या यह लोहाघाट में बनी है. 3. कड़ाही किस तरीके से बनाई जाती है? लोहे की मोटी चादर को भट्ठी में गर्म करके हथौड़े से लगातार पीटा जाता है, फिर किनारे मजबूत कर अंतिम रूप दिया जाता है. 4. यह कड़ाही किन मेलों में मिलती है? उत्तराखंड के नंदा देवी मेले, उत्तरायणी मेले और अन्य स्थानीय मेलों में इनकी दुकानें खास आकर्षण होती हैं. 5. लोहे की कड़ाही में खाना बनाने का क्या फायदा है? इसमें बना खाना थोड़ी मात्रा में आयरन ले सकता है जो आयरन की कमी वाले लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है, हालांकि यह किसी बीमारी का इलाज नहीं है. 6. क्या अब यह कड़ाही गैस चूल्हे पर भी इस्तेमाल हो सकती है? हां, कारीगरों ने अब गैस स्टोव और इंडक्शन चूल्हों के लिए सपाट तले वाली कड़ाही भी बनानी शुरू कर दी है. 7. लोहाघाट की कड़ाही किन शहरों में मंगाई जा रही है? दिल्ली, देहरादून, हल्द्वानी, लखनऊ और कई अन्य शहरों में रहने वाले लोग इसे ऑनलाइन और प्रवासी उत्तराखंडवासियों के जरिए मंगवा रहे हैं. 8. कारीगरों के सामने कौन सी चुनौतियां हैं? बढ़ती महंगाई, कच्चे माल की बढ़ती कीमतें और मशीन से बने सस्ते बर्तनों की प्रतिस्पर्धा उनके सामने मुख्य चुनौतियां हैं. https://trendkia.com/culture/pirhi-dara-pirhi-chalane-vali-karahi-uttarakhand-ke-lohaghat-ke-karigaron-ka-yaha-hunara-aja-bhi-bejora-hai-4343 TrendKia — Har trend, sabse pehle.