रक्षाबंधन पर बस्तर की बेलमेटल राखियों की भारी मांग, चीनी विकल्पों को पछाड़ रही हस्तशिल्प कला रक्षाबंधन के मौके पर बस्तर की पारंपरिक बेलमेटल राखियों की मांग में जबरदस्त इजाफा देखा जा रहा है। स्थानीय कारीगरों की हाथों से बनी मजबूत राखियां चीनी सामान को पछाड़कर ऑनलाइन और स्थानीय बाजारों में खूब बिक रही हैं। रक्षाबंधन के पावन पर्व के करीब आते ही जगदलपुर और बस्तर के बाजारों में एक अनूठा सांस्कृतिक व व्यापारिक बदलाव देखने को मिल रहा है। इस बार भाइयों की कलाई सजाने के लिए विदेशी या चीनी राखियों के बजाय छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध बेलमेटल यानी बेल धातु से बनी राखियों की अभूतपूर्व मांग देखी जा रही है। बस्तर की सदियों पुरानी समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा से तैयार ये राखियां न केवल अपनी सुंदरता से ग्राहकों को मंत्रमुग्ध कर रही हैं, बल्कि बीते कई वर्षों के व्यापारिक रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ रही हैं। पारंपरिक कला की बढ़ती चमक और चीनी उत्पादों पर बढ़त बस्तर की पहचान मानी जाने वाली ढोकरा और बेलमेटल कला अब केवल सजावटी सामानों तक सीमित नहीं रही है, बल्कि त्यौहारों के आधुनिक बाजार में भी अपनी मजबूत पकड़ बना चुकी है। जगदलपुर के स्थानीय बाजारों में सजी बेल धातु की राखियों की मजबूती और हाथों की बारीक कारीगरी लोगों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी हुई है। बाजार में इन राखियों की कीमत 150 रुपये से लेकर 200 रुपये के बीच तय की गई है। इस वाजिब दाम में शुद्ध हस्तशिल्प मिलने के कारण खरीदार प्लास्टिक और चीनी राखियों को छोड़कर बस्तर के स्थानीय कारीगरों के इस काम को प्राथमिकता दे रहे हैं। चिलकुटी के कारीगर लुदर बेसरा की 17 वर्षों की तपस्या इस खूबसूरत कलाकृति के पीछे स्थानीय ग्रामीण कारीगरों का अटूट धैर्य और वर्षों का अनुभव छिपा है। बस्तर के चिलकुटी गांव में रहने वाले कारीगर लुदर बेसरा पिछले 17 साल से बेलमेटल शिल्पकारी के माध्यम से अपनी आजीविका चला रहे हैं और इस धरोहर को जीवित रखे हुए हैं। लुदर बेसरा का कहना है कि यह कार्य अत्यंत बारीकी, ध्यान और कड़ी शारीरिक मेहनत की मांग करता है। ग्राहकों की व्यक्तिगत पसंद का सम्मान करते हुए वे ऑर्डर पर इच्छानुसार कस्टमाइज्ड डिजाइन की राखियां भी तैयार करते हैं। उनकी मेहनत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल 20 पीस राखियों का शुरुआती ढांचा तैयार करने में पूरा एक दिन का समय लगता है। तीन दिनों की कठिन ढलाई प्रक्रिया और मोम की कारीगरी बेल धातु की एक मजबूत और आकर्षक राखी तैयार होने के पीछे चार प्रमुख चरणों वाली एक जटिल निर्माण प्रक्रिया शामिल होती है, जिसमें कुल तीन दिनों की कठिन ढलाई लगती है • पहला दिन (मोम की आकृति तैयार करना): सबसे पहले कारीगर मधुमक्खी के मोम की सहायता से राखी का अत्यंत बारीक, सुंदर और नक्काशीदार ढांचा तैयार करते हैं। • दूसरा दिन (मिट्टी का लेप लगाना): मोम से तैयार इस नाजुक आकृति के ऊपर विशेष गीली मिट्टी की एक मजबूत परत चढ़ाई जाती है और उसे सूखने के लिए रखा जाता है। • तीसरा दिन (भट्टी में ढलाई और पकाई): मिट्टी के सूख जाने के बाद इसे तेज आंच वाली भट्टी में पकाया जाता है, जिससे अंदर का मोम पिघलकर निकल जाता है और उसकी जगह पिघली हुई बेल धातु ढाल दी जाती है। भट्टी से बाहर निकालने के बाद इन राखियों को ठंडी हवा में रखा जाता है, मिट्टी के आवरण को हटाया जाता है और फिर धातु की घिसाई व सफाई करके उन्हें बाजार में बिक्री के लिए पूरी तरह तैयार किया जाता है। जिला पंचायत और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए व्यापक बिक्री हाथ से बनने के कारण इन राखियों के निर्माण में समय और श्रम अधिक लगता है, लेकिन इसके बावजूद बाजार में इनकी उपलब्धता होते ही लोग इन्हें हाथों-हाथ खरीद रहे हैं। बस्तर के हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय बाजारों के साथ-साथ जिला पंचायत के सहयोग से भी इनकी बिक्री सुनिश्चित की जा रही है। इसके अतिरिक्त ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से भी देश भर से इन राखियों के लिए भारी संख्या में ऑर्डर प्राप्त हो रहे हैं। मांग में आई इस ऐतिहासिक बढ़ोतरी ने स्थानीय हस्तशिल्पियों के चेहरे पर खुशी ला दी है और बस्तर की प्राचीन विधा को नई पहचान दिलाई है। इसका आप पर असर • भारत में: त्यौहारों के दौरान स्थानीय हस्तशिल्प और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा मिलने से पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ विकल्पों का चलन बढ़ रहा है। • बस्तर (छत्तीसगढ़) में: पारंपरिक बेलमेटल कला की मांग बढ़ने से चिलकुटी जैसे गांवों के स्थानीय कारीगरों को बेहतर आय और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है। सवाल-जवाब 1. बस्तर की राखियों की मुख्य विशेषता क्या है? बस्तर की राखियां पारंपरिक बेल धातु (बेलमेटल) से पूरी तरह हाथों द्वारा बनाई जाती हैं, जिससे ये बहुत मजबूत और टिकाऊ होती हैं। 2. बेलमेटल राखी की बाजार में कीमत कितनी रखी गई है? जगदलपुर और ऑनलाइन बाजारों में इन बेलमेटल राखियों की कीमत 150 रुपये से लेकर 200 रुपये के बीच रखी गई है। 3. बेल धातु की राखी बनाने में कितने दिनों का समय लगता है? इन राखियों की ढलाई प्रक्रिया तीन दिनों में पूरी होती है, जबकि 20 राखियों की शुरुआती मोम आकृति तैयार करने में 1 दिन लगता है। 4. कारीगर लुदर बेसरा कितने सालों से बेलमेटल कला का काम कर रहे हैं? चिलकुटी गांव के रहने वाले कारीगर लुदर बेसरा पिछले 17 सालों से बेलमेटल शिल्पकारी का काम कर रहे हैं। 5. इन राखियों को किन-किन माध्यमों से बेचा जा रहा है? ये राखियां जगदलपुर के स्थानीय बाजारों, जिला पंचायत के माध्यम से और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर बेची जा रही हैं। प्रेरणा और सबक • प्रामाणिकता की ताकत: आधुनिक बाजार की प्रतिस्पर्धा में भी पारंपरिक और प्रामाणिक कला अपनी गुणवत्ता के बल पर अलग पहचान बना सकती है। • पारंपरिक कौशल का संरक्षण: वर्षों के समर्पण और कड़ी मेहनत (जैसे 17 सालों का अनुभव) से पुरानी विधाओं को रोजगार के नए अवसरों में बदला जा सकता है। • आधुनिक बाजार से जुड़ाव: पारंपरिक कला को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और स्थानीय संस्थागत सहयोग से जोड़कर उसकी पहुंच को कई गुना बढ़ाया जा सकता है। https://trendkia.com/culture/rakshabandhan-para-bastar-ki-belametala-rakhiyon-ki-bhari-manga-chini-vikalpon-ko-pachhara-rahi-hastashilpa-kala-22477 TrendKia — Har trend, sabse pehle.