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  "title": "रोसड़ा की एक छोटी दुकान से हाथों से गढ़ा हारमोनियम अब दिल्ली तक पहुंच रहा है",
  "summary": "समस्तीपुर के रोसड़ा बाजार में दिनेश कुमार शर्मा अपने दादाजी से मिली विरासत को आगे बढ़ाते हुए आज भी हाथों से हारमोनियम बनाते हैं, जिनकी मांग बक्सर, सहरसा से लेकर दिल्ली तक है।",
  "content": "भजन-कीर्तन हो, कव्वाली हो या शास्त्रीय संगीत की कोई महफिल, हारमोनियम की मधुर आवाज के बिना बात अधूरी रह जाती है। बहुत से लोग सोचते हैं कि इस वाद्ययंत्र के भीतर कोई आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक तकनीक लगी होती है, लेकिन असल में यह लकड़ी, रबर, धातु की रीड और कारीगर के हाथों की बारीक मेहनत से तैयार होता है। समस्तीपुर जिले के रोसड़ा बाजार में यही पुरानी कारीगरी आज भी जिंदा है, जहां परंपरागत तरीके से हारमोनियम बनाए जाते हैं।\n\nपीढ़ियों से चली आ रही विरासत\nरोसड़ा बाजार के रहने वाले दिनेश कुमार शर्मा पिछले कई वर्षों से यह काम कर रहे हैं। उनके लिए यह सिर्फ रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि परिवार की विरासत है। पहले उनके दादाजी हारमोनियम बनाया करते थे और अब यही जिम्मेदारी दिनेश ने अपने कंधों पर उठा रखी है। उनकी छोटी सी दुकान ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है, जहां नए हारमोनियम तैयार करने के साथ-साथ पुराने खराब हारमोनियम की मरम्मत भी होती है।\n\nसागवान की लकड़ी और हाथों की मेहनत\nदिनेश हारमोनियम बनाने के लिए सागवान की लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं, जबकि इसकी रीड उन्हें बाजार से खरीदनी पड़ती है। बाकी पूरा काम, यानी लकड़ी को तराशना, ढांचा तैयार करना और उसमें सुर भरना, उनके अपने अनुभव और हाथों की सफाई का नतीजा होता है। इस पूरी प्रक्रिया में बारीकी का खास ख्याल रखा जाता है, तभी जाकर एक हारमोनियम से सही और मीठी आवाज निकलती है।\n\nबिहार से दिल्ली तक ग्राहकों की कतार\nदिनेश बताते हैं कि उनके हाथों से तैयार हारमोनियम की मांग सिर्फ समस्तीपुर या आसपास के इलाकों तक सीमित नहीं है। बिहार के बक्सर और सहरसा जैसे जिलों के अलावा दिल्ली तक से लोग उनकी दुकान पर पहुंचते हैं। उनके यहां हारमोनियम की शुरुआती कीमत करीब 8000 रुपये से शुरू होकर 15000 रुपये तक जाती है। बरसों के अनुभव और मजबूत क्वालिटी की वजह से दूर-दूर से ग्राहक उनकी तलाश करते हुए रोसड़ा तक चले आते हैं।\n\nमशीनों के दौर में जिंदा है यह पारंपरिक हुनर\nदिनेश का कहना है कि आज जब हर चीज मशीनों से बनने लगी है, तब भी हाथों की यह पुरानी कारीगरी पूरी तरह जिंदा है और यही उनकी सबसे बड़ी पहचान भी है। संगीत को समझने वाले और इसके शौकीन लोग इस हुनर को खूब सम्मान देते हैं, और यही वजह है कि ग्राहक खुद खोजते हुए उनकी छोटी सी दुकान तक पहुंच जाते हैं।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: संगीत प्रेमियों और भजन-कीर्तन, कव्वाली या शास्त्रीय संगीत से जुड़े लोगों को हाथ से बना असली हारमोनियम अब भी सीधे कारीगर से मिल सकता है, जिसकी कीमत करीब 8000 से 15000 रुपये के बीच है।\n\n• समस्तीपुर/रोसड़ा में: दिनेश कुमार शर्मा की दुकान स्थानीय स्तर पर रोजगार और पीढ़ियों पुरानी कारीगरी को जिंदा रखे हुए है, जिससे इलाके की पहचान भी मजबूत हो रही है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. दिनेश कुमार शर्मा कहां के रहने वाले हैं?\nवे समस्तीपुर जिले के रोसड़ा बाजार के रहने वाले हैं और वहीं अपनी दुकान में हारमोनियम बनाते हैं।\n\n2. उन्हें यह हुनर कहां से मिला?\nयह काम उनके परिवार की विरासत है, पहले उनके दादाजी हारमोनियम बनाया करते थे और अब यह जिम्मेदारी दिनेश ने संभाल रखी है।\n\n3. हारमोनियम बनाने में किस लकड़ी का इस्तेमाल होता है?\nदिनेश हारमोनियम तैयार करने के लिए सागवान की लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं, जबकि रीड उन्हें बाजार से खरीदनी पड़ती है।\n\n4. उनके यहां बने हारमोनियम की कीमत कितनी है?\nउनके यहां तैयार हारमोनियम की शुरुआती कीमत करीब 8000 रुपये से शुरू होकर 15000 रुपये तक जाती है।\n\n5. उनके ग्राहक कहां-कहां से आते हैं?\nउनके ग्राहक समस्तीपुर के अलावा बिहार के बक्सर, सहरसा जैसे जिलों और दिल्ली तक से आते हैं।\n\n6. क्या वे सिर्फ नए हारमोनियम ही बनाते हैं?\nनहीं, वे नए हारमोनियम बनाने के साथ-साथ पुराने खराब हारमोनियम की मरम्मत भी करते हैं।\n\nप्रेरणा और सबक\nदिनेश कुमार शर्मा की कहानी बताती है कि परिवार से मिली विरासत को सम्मान के साथ आगे बढ़ाने से एक छोटी दुकान भी बड़ी पहचान बन सकती है।\n\n• विरासत को अपनाना: दादाजी से मिले हुनर को उन्होंने खुद की जिम्मेदारी बनाया, ना कि उसे भुला दिया।\n• गुणवत्ता पर टिके रहना: मशीनों के दौर में भी उन्होंने हाथों की बारीक कारीगरी और मानक बनाए रखा, जिसकी वजह से ग्राहक खुद उन्हें खोजते हैं।\n• छोटे स्तर से बड़ी पहचान: एक छोटी सी दुकान से काम शुरू कर वे बक्सर, सहरसा और दिल्ली तक अपनी पहचान बना पाए।\n• मरम्मत की सेवा भी जोड़ना: नए हारमोनियम के साथ पुराने हारमोनियम की रिपेयरिंग की सुविधा देकर उन्होंने अपने काम का दायरा और भरोसा दोनों बढ़ाया।",
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  "category": "कल्चर",
  "publishedAt": "2026-07-02",
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