सात समंदर पार से आकर मेहरानगढ़ की तलहटी में मारवाड़ी गा रही जापान की मायूमी, लोग कहते हैं इन्हें 'राजस्थानी मधु' जापान की रहने वाली मायूमी, जिन्हें लोग प्यार से 'मधु' बुलाते हैं, पिछले पंद्रह सालों से राजस्थान की लोक संस्कृति, कालबेलिया नृत्य और मारवाड़ी भाषा को अपने जीवन में पूरी तरह से उतार चुकी हैं। जोधपुर के हालिया दौरे पर उन्होंने स्थानीय महिलाओं के साथ बैठकर पारंपरिक गीत गाए, जो यह साबित करता है कि कला और संस्कृति की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। देशी और विदेशी की पहचान आमतौर पर इंसान के पहनावे, रहन-सहन और सबसे बढ़कर उसकी बोली से हो जाती है। लेकिन, जोधपुर की ऐतिहासिक गलियों में एक ऐसी विदेशी मेहमान की मौजूदगी ने इस अंतर को पूरी तरह से धुंधला कर दिया है। जापान की मूल निवासी मायूमी ने मारवाड़ की लोक परंपराओं, कला और भाषा को अपने भीतर इस कदर समाहित कर लिया है कि स्थानीय निवासी भी उन्हें देखकर सुखद आश्चर्य में पड़ जाते हैं। प्यार से लोग उन्हें 'राजस्थानी मधु' कहकर बुलाते हैं। उनका यह सफर केवल एक विदेशी नागरिक के पर्यटन या शौक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दो भौगोलिक रूप से अलग देशों की सांस्कृतिक विरासतों के बीच एक बेहद गहरा और अटूट पुल बन चुका है। हाल ही के दिनों में उनका जोधपुर आना चर्चा का विषय बन गया, जब उन्हें मेहरानगढ़ किले की शानदार तलहटी में ठेठ राजस्थानी अंदाज में स्थानीय महिलाओं के बीच बैठकर लोकगीत सीखते और गाते हुए देखा गया। कालबेलिया नृत्य की धुन से शुरू हुआ सफर मायूमी उर्फ मधु का इस रेतीले मरुस्थलीय राज्य के साथ जुड़ाव कोई रातों-रात हुआ चमत्कार नहीं है, बल्कि यह लगभग डेढ़ दशक पुराना एक लंबा और भावपूर्ण सफर है। करीब पंद्रह साल पहले, जब उन्होंने पहली बार राजस्थान की धरती पर कदम रखा था, तब उनका परिचय यहां के विश्व प्रसिद्ध कालबेलिया नृत्य से हुआ था। वह इस पारंपरिक नृत्य शैली की अनूठी लय, तेज गति और असीम ऊर्जा से इस हद तक प्रभावित हुईं कि उन्होंने इसे अपने जीवन में उतारने का दृढ़ निश्चय कर लिया। साल दो हजार तेरह में भारत में उनका आगमन इस सांस्कृतिक खोज की दिशा में एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। उस दौर में उन्होंने केवल नृत्य की शारीरिक बारीकियां सीखने पर जोर नहीं दिया, बल्कि उन्होंने इसके पीछे छिपी लोक संस्कृति, यहां की मिट्टी की महक और यहां के लोगों के रहन-सहन को बेहद करीब से समझने का एक गंभीर प्रयास शुरू कर दिया। घाघरा-ओढ़नी और पारंपरिक आभूषणों से गहरा लगाव इस प्रतिभाशाली जापानी कलाकार का राजस्थानी संस्कृति के प्रति प्रेम केवल मंच पर दी जाने वाली किसी कालबेलिया प्रस्तुति तक ही सीमित नहीं रहता है। उनका दैनिक पहनावा और श्रृंगार भी उनके भीतर गहराई तक बसे मारवाड़ी रंग को स्पष्ट रूप से परिलक्षित करता है। उन्हें पारंपरिक राजस्थानी घाघरा-ओढ़नी धारण करना, भारी और पारंपरिक आभूषण पहनना और हाथों में राजस्थानी रंगों से सजी रंग-बिरंगी चूड़ियां पहनना विशेष रूप से पसंद है। जब मधु पूरी तरह से इन पारंपरिक राजस्थानी परिधानों में सज-धज कर सामने आती हैं और लोकगीत गाने लगती हैं, तो एक पल के लिए ऐसा प्रतीत होता है मानो मारवाड़ के ही किसी दूरस्थ गांव की कोई बेटी अपने घर लौट आई हो। उनके इस सहज और प्राकृतिक रूप को देखकर किसी भी नए व्यक्ति के लिए यह अंदाजा लगाना लगभग नामुमकिन हो जाता है कि वह वास्तव में जापान देश की नागरिक हैं। मारवाड़ी बोली और स्थानीय गीतों में गजब की महारत मधु की कला की सबसे बड़ी और हैरान करने वाली खूबी उनकी भाषा और संवाद का प्रभावशाली तरीका है। उन्होंने मारवाड़ी और राजस्थानी भाषा को इतनी सटीकता और आत्मविश्वास के साथ बोलना सीख लिया है कि उनके बोल सुनकर कोई भी अवाक रह सकता है। उनका उच्चारण, शब्दों का ठहराव और लहजा बिल्कुल वैसा ही है जैसा राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में आम लोग बोलते हैं। जोधपुर में अपने प्रवास के समय, उन्होंने मेहरानगढ़ किले के नीचे बैठी महिलाओं के समूह के साथ पूरे उत्साह से भाग लिया। उन्होंने वहां न केवल महिलाओं से स्थानीय गीत सुने, बल्कि उन्हें बहुत ही कम समय में सीखा और उनके साथ सुर में सुर मिलाकर खुद भी गीत गाए। राजस्थान के किसी भी छोटे-बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम या लोक महफिल में उनकी उपस्थिति पूरे माहौल में एक नया उत्साह और ऊर्जा का संचार कर देती है। विदेशी धरती पर राजस्थान की सांस्कृतिक राजदूत आज के समय में मधु के लिए राजस्थान केवल घूमने-फिरने का कोई स्थान या पर्यटन केंद्र नहीं रह गया है। उनके लिए यह भावनाओं, सहज अपनेपन और गहरे सम्मान से जुड़ी एक पूरी दुनिया बन चुका है। यहां के लोगों का सीधापन और सहज अपनापन उन्हें इतना भाया कि उन्होंने इसे अपनी पहचान का हिस्सा बना लिया। इससे भी अधिक खास बात यह है कि वह इस अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को अपने साथ वापस अपनी मातृभूमि जापान भी ले गई हैं। वह वर्तमान में अपने देश जापान में भी लोगों को राजस्थानी लोक नृत्य और पारंपरिक गीत सिखाने का सराहनीय कार्य कर रही हैं। अपनी कला, कड़ी मेहनत और अटूट समर्पण के माध्यम से, वह आज विदेशी धरती पर भी मारवाड़ की संस्कृति की एक बेहद खूबसूरत और जीवंत पहचान बन गई हैं। इसका आप पर असर • भारत में: विदेशी नागरिकों द्वारा भारतीय संस्कृति को अपनाने की ऐसी कहानियां हमें अपनी ही लोक विरासत और परंपराओं पर गर्व करने के लिए प्रेरित करती हैं। • राजस्थान में: जोधपुर और मारवाड़ के लोगों के लिए यह एक सीधा संदेश है कि उनकी स्थानीय भाषा और कालबेलिया नृत्य की वैश्विक अपील कितनी मजबूत है। सवाल-जवाब 1. जापान की मधु कौन हैं? मधु, जिनका असली नाम मायूमी है, जापान की एक कलाकार हैं जो राजस्थानी कालबेलिया नृत्य और लोकगीतों में पूरी तरह से पारंगत हैं। 2. मायूमी को राजस्थान की संस्कृति से जुड़े हुए कितना समय हो गया है? उन्हें राजस्थान की संस्कृति से जुड़े हुए लगभग पंद्रह साल हो चुके हैं, और उन्होंने साल 2013 में भारत आकर इसे करीब से समझना शुरू किया था। 3. हाल ही में मायूमी को जोधपुर में क्या करते हुए देखा गया? हाल ही में जोधपुर में मेहरानगढ़ किले की तलहटी में वह स्थानीय महिलाओं के साथ बैठकर मारवाड़ी भाषा में लोकगीत गाती और सीखती हुई नजर आईं। 4. क्या मधु केवल राजस्थान में ही अपनी कला का प्रदर्शन करती हैं? नहीं, वह जापान में भी लोगों को राजस्थानी लोकनृत्य और पारंपरिक गीत सिखाकर मारवाड़ की संस्कृति का विदेशों में प्रचार कर रही हैं। प्रेरणा और सबक • कला की कोई सीमा नहीं: मायूमी का सफर यह सिखाता है कि अगर आपके भीतर सच्ची लगन हो, तो भाषा और देश की भौगोलिक सीमाएं कला को सीखने में बाधा नहीं बन सकतीं। • संस्कृति का सम्मान: केवल किसी नृत्य को सीखना काफी नहीं है; उसके पीछे की पूरी संस्कृति और लोगों की भावनाओं को समझना एक कलाकार को सच्चा सम्मान दिलाता है। • निरंतर अभ्यास का महत्व: पंद्रह सालों के लंबे जुड़ाव और अभ्यास के कारण ही आज वह मारवाड़ी भाषा और राजस्थानी लोकगीतों को इतने स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत कर पाती हैं। https://trendkia.com/culture/sata-samndara-para-se-akara-mehrangarh-ki-talahati-men-maravari-ga-rahi-japan-ki-mayumi-loga-kahate-hain-inhen-rajasthani-madhu-9144 TrendKia — Har trend, sabse pehle.