# स्क्रीन टाइम के दौर में राजस्थान के करौली का देसी खेल तान-चक्कर बरकरार, बच्चे मोबाइल छोड़ गलियों में चला रहे लोहे का पहिया

> स्मार्टफ़ोन और ऑनलाइन गेम्स के दबदबे के बीच राजस्थान के करौली में आज भी पारंपरिक खेल 'तान-चक्कर' का खुमार बरकरार है। लोहे की छड़ी और चक्र से चलने वाला यह ज़ीरो-कॉस्ट खेल बच्चों को स्क्रीन से दूर रख रहा है।

**Type:** article · **Category:** कल्चर · **Published:** 2026-08-19 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/culture/screen-time-ke-daura-men-rajasthan-ke-karauli-ka-desi-khela-taan-chakkar-barakarara-bachche-mobaila-chhora-galiyon-men-chala-rahe--18447 · **Language:** Hindi
**Tags:** करौली, राजस्थान, तान-चक्कर, देसी खेल, पारंपरिक खेल, स्क्रीन टाइम, तुलसीदास मुद्गल

डिजिटल क्रांति और स्मार्टफ़ोन के इस आधुनिक दौर में जहां बच्चों का अधिकांश समय स्क्रीन, ऑनलाइन गेमिंग, सोशल मीडिया वीडियो और रील्स के सामने बीत रहा है, वहीं राजस्थान के करौली जिले में एक पुरानी परंपरा आज भी जीवंत है। पबजी जैसे ग्राफिक्स वाले आधुनिक गेम्स ने बच्चों की दिनचर्या और खेलने के पारंपरिक तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। अधिकांश स्थानों पर पुराने समय के देसी खेल गांवों की गलियों, आंगनों और चौपालों से ओझल होकर केवल बुजुर्गों की पुरानी कहानियों का हिस्सा बनकर रह गए हैं। लेकिन करौली के ग्रामीण इलाकों की तस्वीर इस मामले में काफी अलग और अनोखी दिखाई देती है। यहां के बच्चे आज भी बिना किसी महंगे गैजेट या खिलौने के, पूरी तरह जुगाड़ से बने पारंपरिक खेल 'तान-चक्कर' के साथ अपना समय बिताते हैं।

## तान-चक्कर का रोमांच और खेलने का खास तरीका
करौली के गांवों और कस्बों में बच्चों को हाथ में लोहे की पतली छड़ लिए और जमीन पर तेजी से भागते लोहे के चक्र को नियंत्रित करते देखना एक आम नजारा है। इस खेल को स्थानीय भाषा में तान-चक्कर कहा जाता है। इसमें 'तान' लोहे की पतली छड़ी को कहा जाता है, जबकि 'चक्कर' लोहे का एक गोल छल्ला या पहिया होता है। देखने में भले ही यह खेल बेहद साधारण और सरल प्रतीत होता है, लेकिन इसे सही संतुलन के साथ तेज गति में चलाना आसान काम नहीं है। खिलाड़ी को लोहे की छड़ी के सहारे उस घूमते हुए चक्र को संभालना होता है ताकि वह संतुलन न खोए और जमीन पर गिरे बिना आगे बढ़ता रहे।

यह देसी खेल केवल मनोरंजन का जरिया नहीं है, बल्कि बच्चों के बीच एक रोमांचक प्रतियोगिता का रूप भी ले लेता है। गांव की गलियों में अक्सर बच्चे एक साथ मिलकर प्रतिस्पर्धा करते हैं। बच्चों में इस बात को लेकर बेहद उत्साह रहता है कि किसका चक्कर बिना गिरे सबसे लंबी दूरी तय करेगा, कौन सबसे तेज गति से अपने चक्र को दौड़ा पाएगा और कौन बिना रोके लंबे समय तक उसे नियंत्रित रख सकेगा। यही प्रतिस्पर्धी भावना बच्चों को घंटों तक मैदान और गलियों में जोड़े रखती है।

## 30-40 साल पुराना इतिहास और शिक्षक की यादें
तान-चक्कर का करौली क्षेत्र में एक समृद्ध इतिहास रहा है। स्थानीय अध्यापक तुलसीदास मुद्गल बताते हैं कि आज से लगभग 30 से 40 वर्ष पूर्व करौली में यह खेल हर बच्चे का मनपसंद शगल हुआ करता था। उस दौर में मनोरंजन के आधुनिक साधन, टेलीविजन या डिजिटल उपकरण बेहद सीमित या न के बराबर थे। ऐसे वातावरण में बच्चे अपने खाली समय का आनंद लेने के लिए इसी प्रकार के मैदानी और देसी खेलों पर निर्भर रहते थे। तुलसीदास मुद्गल याद करते हैं कि बचपन में वे खुद इस खेल के दीवाने थे और दोस्तों के साथ खेलते हुए समय का अंदाजा ही नहीं रहता था।

वे आगे बताते हैं कि हालांकि आज की इंटरनेट और मोबाइल से जुड़ी पीढ़ी के लिए तान-चक्कर किसी अजूबे या बीते जमाने की वस्तु जैसा लग सकता है, लेकिन करौली के ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी निरंतरता यह साबित करती है कि पारंपरिक खेलों का अपना एक अलग आकर्षण है। जब राह चलते बुजुर्ग बच्चों को तान-चक्कर खेलते देखते हैं, तो वे कुछ क्षणों के लिए ठहरकर अपने बचपन के दिनों की यादों में खो जाते हैं।

## ज़ीरो बजट जुगाड़ और हुनर का विकास
तान-चक्कर खेल की सबसे बड़ी विशेषता इसका पूरी तरह से किफायती और ज़ीरो बजट होना है। इसे खेलने के लिए किसी महंगे बाज़ारू खिलौने या इंटरनेट डेटा की आवश्यकता नहीं होती। केवल एक लोहे की पतली छड़ और एक पुराने लोहे के चक्र की मदद से यह पूरा खेल तैयार हो जाता है। यही कारण है कि यह खेल समाज के हर वर्ग के बच्चों के लिए आसानी से उपलब्ध रहा है। इसके अतिरिक्त, इस खेल के दौरान यदि चक्र मुड़ जाता है या तान में कोई खराबी आ जाती है, तो बच्चे किसी वयस्क की मदद लिए बिना खुद ही उसे सीधा करने और ठीक करने का प्रयास करते हैं।

इस प्रक्रिया से बच्चों में खेल-खेल में ही व्यावहारिक समझ, आत्म-निर्भरता और छोटी-मोटी मरम्मत करने का हुनर विकसित होता है। शारीरिक स्वास्थ्य के लिहाज से भी यह खेल बच्चों की एकाग्रता, शारीरिक संतुलन, हाथ और आंखों के तालमेल तथा दौड़-भाग के कारण शारीरिक तंदुरुस्ती को बढ़ावा देता है। यही वजह है कि डिजिटल युग की चुनौतियों के बावजूद करौली में तान-चक्कर का क्रेज आज भी बरकरार है।

## इसका आप पर असर
- **भारत में:** डिजिटल युग में पारंपरिक भारतीय खेलों के संरक्षण और बच्चों को स्क्रीन टाइम से दूर रखने की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण है।
- **करौली (राजस्थान) में:** स्थानीय बच्चों में मैदानी खेलों, शारीरिक गतिविधि और बिना खर्च की रचनात्मकता को प्रोत्साहन मिल रहा है।

## सवाल-जवाब

### 1. तान-चक्कर खेल क्या है?
तान-चक्कर राजस्थान के करौली का एक पारंपरिक देसी खेल है जिसमें बच्चे लोहे की पतली छड़ी (तान) के सहारे लोहे के गोल छल्ले (चक्कर) को संतुलित करते हुए जमीन पर दौड़ाते हैं।

### 2. तान-चक्कर खेल को बनाने में कितना खर्च आता है?
यह खेल पूरी तरह ज़ीरो-कॉस्ट या जुगाड़ पर आधारित है। इसे कबाड़ या पुरानी लोहे की छड़ और चक्र से आसानी से बनाया जा सकता है।

### 3. स्थानीय शिक्षक तुलसीदास मुद्गल ने तान-चक्कर के बारे में क्या बताया?
तुलसीदास मुद्गल के अनुसार करीब 30-40 साल पहले करौली में बच्चे घंटों यह खेल खेलते थे और आज के डिजिटल दौर में भी यह परंपरा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

### 4. तान-चक्कर खेल से बच्चों को क्या सीखने को मिलता है?
इस खेल से बच्चों का शारीरिक संतुलन और तालमेल सुधरता है, साथ ही उपकरण खराब होने पर वे खुद मरम्मत करना और व्यावहारिक जुगाड़ सीख जाते हैं।

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