शिप्रा तट पर बना अनोखा मंदिर जहां रोज की आरती में याद किए जाते हैं देश के 21 परमवीर चक्र विजेता उज्जैन में मां शिप्रा के किनारे स्थित एक विशेष मंदिर में दैनिक पूजा के दौरान देश के अमर शहीदों को नमन किया जाता है, जिसे एक सेवानिवृत्त नागरिक ने अपनी जमा पूंजी से बनवाया था। विश्व प्रसिद्ध बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन न केवल अपने सदियों पुराने धार्मिक रहस्यों और आध्यात्मिक आस्था के लिए जानी जाती है, बल्कि यह पावन अवंतिका नगरी वीरों के बलिदान को नमन करने की एक अद्भुत परंपरा के लिए भी विख्यात है। उज्जैन की पावन भूमि पर एक ऐसा अनूठा मंदिर स्थापित है जहां प्रतिदिन होने वाली सुबह और शाम की आरती के साथ देश की रक्षा में प्राण देने वाले अमर शहीदों का भावपूर्ण स्मरण किया जाता है। मंदिर में आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु भगवान के दर्शन के साथ ही उन वीर जवानों की स्मृति में अपना शीश झुकाता है जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। पूजा-अर्चना के मध्य जब अमर बलिदानियों के नाम गूंजते हैं, तो पूरा वातावरण अगाध देशभक्ति और गहरी संवेदनाओं से सराबोर हो उठता है। यह पावन स्थल हर किसी को यह अहसास दिलाता है कि देश के लिए दिए गए बलिदान कभी भुलाए नहीं जाते। शिप्रा के पावन तट पर देशभक्ति का वातावरण यह अनोखा मंदिर मोक्षदायिनी मानी जाने वाली पवित्र शिप्रा नदी के शांत तट पर स्थित है। नदी का निर्मल प्रवाह, आसपास का शांत वातावरण और मंदिर परिसर में प्रज्वलित श्रद्धा के दीप यहां पहुंचने वाले हर भक्त और पर्यटक के हृदय को छू लेते हैं। वैसे तो वर्ष भर देश और विदेश से हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं, लेकिन वर्ष में एक विशेष दिन ऐसा भी आता है जब सैकड़ों लोग एक साथ एकत्र होकर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उस पावन अवसर पर पूरा मंदिर परिसर भारत माता की जय और वंदे मातरम के ओजस्वी नारों से गूंज उठता है, जिससे वहां उपस्थित हर व्यक्ति देशभक्ति के रंग में रंग जाता है। सेवानिवृत्ति की जमा पूंजी से हुआ मंदिर का निर्माण इस अनूठे मंदिर की स्थापना के पीछे एक आम नागरिक की राष्ट्रभक्ति और त्याग की महान गाथा छिपी है। साल 2008 में दान सिंह चौधरी ने अपनी जीवन भर की जमा पूंजी और सेवानिवृत्ति से प्राप्त पूरी राशि को समर्पित करके इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। उन्हें इस पावन कार्य की प्रेरणा अपने गुरु और अलीराजपुर के निवासी नरसिंहानंद महाराज से मिली थी। इस संकल्प को परमानंद महाराज ने मंदिर की विधिवत स्थापना कराकर पूर्ण कराया। दान सिंह चौधरी का अटूट विश्वास था कि देश के लिए बलिदान होने वाले जवानों को केवल यादों तक सीमित न रखकर रोज की पूजा और आरती में जीवित रखा जाना चाहिए। वर्ष 2016 में दान सिंह चौधरी के निधन और वर्ष 2023 में उनकी माताजी के देहांत के बाद से अब जामोद परिवार पूरी निष्ठा के साथ इस मंदिर की सेवा और दैनिक व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभाल रहा है। 21 परमवीर चक्र विजेताओं और 41 प्रतिमाओं का अनूठा संग्रह मंदिर परिसर के भीतर प्रवेश करते ही ऐसा प्रतीत होता है जैसे भारत के गौरवशाली और पराक्रमी इतिहास का सजीव साक्षात दर्शन हो रहा हो। परिसर में स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय रक्षा बलों में प्रथम पद धारण करने वाले महान सेनानायकों की भव्य प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। इनमें थलसेना के प्रथम अध्यक्ष जनरल के.एम. करियप्पा, फील्ड मार्शल मानेकशॉ और वायुसेना प्रमुख अर्जुन सिंह की प्रतिमाएं प्रमुख रूप से शामिल हैं। इसके साथ ही देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान से अलंकृत 21 परमवीर चक्र विजेताओं को भी यहां विशेष स्थान और सम्मान दिया गया है। संपूर्ण परिसर में लगभग 41 वीर सपूतों और नारी शक्ति को दर्शाती प्रतिमाएं सुशोभित हैं। इसके अतिरिक्त परिसर में दर्शाई गई अमर जवान, अमर किसान और अमर विज्ञान की झलकियां हर नागरिक के मन में राष्ट्रसेवा और गौरव की भावना को पुनः जाग्रत कर देती हैं। इसका आप पर असर • भारत में: यह स्थल देशवासियों के लिए भक्ति और राष्ट्रप्रेम के अद्भुत संगम का एक प्रेरणादायक प्रतीक है। • उज्जैन में: महाकाल दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के लिए शिप्रा तट का यह मंदिर एक विशेष देशभक्तिपूर्ण अनुभव प्रदान करता है। सवाल-जवाब 1. उज्जैन में शहीदों को समर्पित यह मंदिर किस नदी के तट पर स्थित है? यह मंदिर उज्जैन में पवित्र और मोक्षदायिनी शिप्रा नदी के तट पर स्थित है। 2. इस अनोखे मंदिर का निर्माण किसने और कब करवाया था? इस मंदिर का निर्माण साल 2008 में दान सिंह चौधरी ने अपनी सेवानिवृत्ति की राशि और जीवन भर की जमा पूंजी से करवाया था। 3. मंदिर परिसर में किन प्रमुख हस्तियों और सम्मानों की प्रतिमाएं स्थापित हैं? मंदिर में प्रथम थलसेना अध्यक्ष जनरल के.एम. करियप्पा, फील्ड मार्शल मानेकशॉ, वायुसेना प्रमुख अर्जुन सिंह तथा 21 परमवीर चक्र विजेताओं समेत कुल 41 प्रतिमाएं स्थापित हैं। 4. दान सिंह चौधरी के निधन के बाद मंदिर की व्यवस्था कौन संभाल रहा है? वर्ष 2016 में दान सिंह चौधरी और वर्ष 2023 में उनकी माताजी के निधन के बाद अब जामोद परिवार इस मंदिर की सेवा और व्यवस्था संभाल रहा है। प्रेरणा और सबक दान सिंह चौधरी के इस पुनीत कार्य से हमें जीवन में कई महत्वपूर्ण सीख मिलती है: • मातृभूमि के प्रति निस्वार्थ सेवा: अपनी सेवानिवृत्ति की पूरी जमा पूंजी देश के अमर शहीदों के सम्मान में समर्पित कर देना सच्ची देशभक्ति का प्रमाण है। • संकल्प की सिद्धि: अध्यात्मिक गुरु की प्रेरणा से शुरू किए गए संकल्प को विपरीत परिस्थितियों के बावजूद एक स्थायी स्वरूप देना। • पीढ़ियों का दायित्व: परिवार और समाज द्वारा एक सकारात्मक और राष्ट्रहितकारी परंपरा को आगे संभालकर रखना। https://trendkia.com/culture/shipra-tata-para-bana-anokha-mndira-jahan-roja-ki-arati-men-yada-kie-jate-hain-desha-ke-21-param-vir-chakra-vijeta-16573 TrendKia — Har trend, sabse pehle.