सुल्तानपुर के एक गांव में आज भी जिंदा है बैलों से चलने वाला 2 क्विंटल का गन्ना कोल्हू, अब बिजली से चलता है सुल्तानपुर के मिश्रपुर पुरैना गांव में श्याम बहादुर यादव के पास 30 साल पुराना दो कुंतल वजनी गन्ना पेराई का कोल्हू आज भी मौजूद है, जिसे अब मॉडिफाई करके बिजली से चलाया जाता है और ग्रामीण इसे परंपरा की अमूल्य धरोहर मानते हैं। आजादी के बाद के दशकों में भारत की खेती ने जो लंबा सफर तय किया है, उसकी एक झलक सुल्तानपुर के एक छोटे से गांव में आज भी देखी जा सकती है। यहां एक ऐसी मशीन मौजूद है जो कभी हर गन्ना उगाने वाले किसान की जरूरत हुआ करती थी, लेकिन वैज्ञानिक शोध, आधुनिक यंत्रों और हल्के-फुल्के उपकरणों के दौर में अब लगभग विलुप्त हो चुकी है। यह है पुराने जमाने का गन्ना पेराई का कोल्हू, जिसे कभी बैलों के सहारे घुमाया जाता था और जिसे आज की पीढ़ी ने शायद ही कभी चलते देखा हो। 30 साल पुरानी मशीन, 20 हजार में खरीदी थी पिता ने सुल्तानपुर जिले के मिश्रपुर पुरैना गांव के रहने वाले श्याम बहादुर यादव बताते हैं कि उनके घर पर लगा यह कोल्हू उनके पिता ने खरीदा था। आज से लगभग 30 साल पहले इसकी कीमत 20000 रुपये थी। शुरुआत में यह पूरी तरह बैलों की ताकत से चलता था, लेकिन समय के साथ परिवार ने इसमें बदलाव किया। अब इसमें विद्युत संयंत्र लगा दिया गया है और इसे बिजली के जरिए चलाया जाता है, ताकि यह पुरानी मशीन आज के जमाने में भी काम कर सके। आज की मशीनों से पांच गुना भारी आज बाजार में जो गन्ना पेराई के कोल्हू आ रहे हैं, उनका वजन बेहद कम होता है। यही कारण है कि किसान उन्हें आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जा सकते हैं। इसके उलट यह पुराना कोल्हू बेहद भारी-भरकम है। श्याम बहादुर यादव के मुताबिक यह वर्तमान के सामान्य कोल्हू की तुलना में करीब 5 गुना अधिक वजनी है, यानी इसका वजन 2 कुंतल से भी ज्यादा है। इतने भारी होने की वजह से इसे इधर-उधर ले जाना आसान नहीं होता। आज के समय में इस तरह के कोल्हू की कीमत 50000 रुपये से अधिक आंकी जाती है, हालांकि अब ऐसा कोल्हू मिलना अपने आप में दुर्लभ हो गया है। अब सिर्फ कुछ गांवों में बची है यह धरोहर श्याम बहादुर यादव TrendKia को बताते हैं कि सुल्तानपुर जनपद के अब चंद गांवों में ही इस तरह का कोल्हू देखने को मिलता है, क्योंकि गन्ने की पेराई का काम अब आधुनिक मशीनों से होने लगा है। यही वजह रही कि ज्यादातर लोगों ने अपने पुराने कोल्हू बेच दिए। लेकिन जिनके पास यह मशीन आज भी बची है, उसे गांव के लोग किसी कीमत पर बिकाऊ सामान नहीं, बल्कि ग्रामीण परंपरा की अमूल्य धरोहर मानते हैं। बुजुर्गों का कहना है कि इन मशीनों को देखकर उनके सामने अपना बीता हुआ जीवन घूम जाता है और पुरानी यादें ताजा हो उठती हैं। कैसे काम करता था बैलों वाला यह कोल्हू पुराने जमाने की इस पेराई मशीन में दो बड़े और वजनदार रोलर लगे होते थे। इन दोनों रोलरों के बीच एक छोटी सी जगह छूटी रहती थी, जिसमें एक बार में दो से तीन गन्ने एक साथ डाले जाते थे। इसके बाद बैल के सहारे रोलर को गोल-गोल यानी वृत्ताकार तरीके से घुमाया जाता था। जैसे-जैसे रोलर घूमता, गन्ना उसके बीच फंसकर पिसता जाता और उसमें से रस निकलने लगता। रोलर के नीचे लोहे का एक त्रिभुजाकार पनारा लगा होता था, जिसके रास्ते यह रस बहकर किसी बर्तन में इकट्ठा कर लिया जाता था। समय बदला, इसकी उपयोगिता घटती गई और आज यही मशीन पूरी तरह विलुप्त होने की कगार पर आ खड़ी हुई है। https://trendkia.com/culture/sultanapura-ke-eka-ganva-men-aja-bhi-jinda-hai-bailon-se-chalane-vala-2-kvintala-747 TrendKia — Har trend, sabse pehle.