# तरबूज और कद्दू की मामूली रंजिश में बही थी खून की नदियां, जानें राजस्थान और मुरादाबाद की ऐतिहासिक जंगों की अनोखी दास्तान

> भारतीय इतिहास में छोटी-छोटी बातों पर हुए भीषण युद्धों के कई उदाहरण मिलते हैं। बीकानेर और नागौर के बीच एक तरबूज के लिए लड़ी गई 'मतीरे की राड़' और 1857 में मुरादाबाद में एक कद्दू की कीमत पर हुआ खूनी दंगा 'कद्दू गर्दी' इसके दो सबसे हैरान करने वाले अध्याय हैं।

**Type:** article · **Category:** कल्चर · **Published:** 2026-09-02 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/culture/tarabuja-aura-kaddu-ki-mamuli-rnjisha-men-bahi-thi-khuna-ki-nadiyan-janen-rajasthan-aura-moradabad-ki-aitihasika-jngon-ki-anokhi-d-26264 · **Language:** Hindi
**Tags:** भारतीय इतिहास, मतीरे की राड़, कद्दू गर्दी, बीकानेर इतिहास, मुरादाबाद दंगा, अमर सिंह राठौर, राजा कर्ण सिंह

इतिहास के पन्नों में कई ऐसी अनोखी घटनाएं दर्ज हैं जो यह साबित करती हैं कि कभी-कभी बेहद मामूली विवाद भी भीषण खूनी संघर्ष का रूप ले लेते हैं। किसी एक भौगोलिक क्षेत्र में घटी घटना का असर केवल वहीं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसकी गूंज दूर-दूर तक सुनाई देती है। भारतीय इतिहास में ऐसी ही दो बेहद दिलचस्प और हैरान कर देने वाली घटनाएं दर्ज हैं, जहां सब्जी और फल के मालिकाना हक को लेकर न केवल रियासतों की सेनाएं आपस में भिड़ गईं, बल्कि दर्जनों लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी। इनमें से पहली घटना राजस्थान की मशहूर 'मतीरे की राड़' है, जो बीकानेर और नागौर रियासत के बीच केवल एक तरबूज के लिए लड़ी गई थी। वहीं दूसरी घटना उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में घटी, जिसे इतिहास में 'कद्दू गर्दी' के नाम से जाना जाता है और जिसमें एक कद्दू के दाम को लेकर दो दिनों तक दंगा भड़क उठा था। इतिहासकार डॉ. राजीव सक्सेना के अनुसार ये दोनों घटनाएं भारतीय इतिहास का एक ऐसा पहलू उजागर करती हैं, जहां अहंकार और सीमा विवाद के कारण मामूली बातें भी जंग का मैदान बन गईं।

## सीमा पर उगी बेल और तरबूज पर बढ़ा विवाद
राजस्थान की 'मतीरे की राड़' का इतिहास 17वीं सदी से जुड़ा हुआ है। उस समय बीकानेर रियासत पर राजा कर्ण सिंह का शासन था, जबकि पड़ोसी नागौर रियासत की कमान अमर सिंह राठौर के हाथों में थी। अमर सिंह राठौर इतिहास में अपने अदम्य साहस और वीरता के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने मुगल बादशाह शाहजहाँ के दरबार में ही उनके साले का सिर धड़ से अलग कर दिया था। दोनों रियासतों की सीमाएं आपस में सटी हुई थीं। बीकानेर का आखिरी गांव सिलवा था और उससे बिल्कुल सटा हुआ नागौर रियासत का जाखड़िया गांव मौजूद था। दोनों गांवों के खेत एक-दूसरे की सीमा से लगे हुए थे।

विवाद की शुरुआत तब हुई जब बीकानेर रियासत के सिलवा गांव के एक किसान ने अपने खेत में तरबूज की एक बेल बोई। स्थानीय भाषा में राजस्थान के लोग तरबूज को 'मतीरा' कहते हैं, जबकि उत्तर प्रदेश और आसपास के इलाकों में इसे सामान्यतः तरबूज के नाम से जाना जाता है। किसान की बोई हुई वह बेल धीरे-धीरे बढ़ती चली गई और फैलते-फैलते पड़ोसी नागौर रियासत के जाखड़िया गांव के एक खेत तक पहुंच गई। कुछ समय बाद उस बेल पर नागौर की सीमा में एक बहुत ही रसीला और बड़ा तरबूज उगा।

जब जाखड़िया गांव के किसान ने देखा कि उसकी जमीन पर एक बड़ा तरबूज लगा है, तो उसने उसे तोड़ने की कोशिश की। उसी वक्त सिलवा गांव का किसान भी वहां पहुंच गया और उसने तरबूज तोड़ने से मना कर दिया। बीकानेर के किसान की दलील थी कि चूंकि बेल की जड़ उसके खेत की जमीन में लगी है और उसने फसल बोई थी, इसलिए उस पर उगने वाले फल पर भी पूरा अधिकार उसी का है। इसके उलट नागौर के किसान का तर्क था कि भले ही बेल कहीं से भी आई हो, लेकिन तरबूज उसकी जमीन और उसकी रियासत की सीमा के भीतर उगा है, इसलिए वह फल उसका है।

## किसानों की बहस से राजाओं की जंग तक
शुरुआत में यह विवाद दो किसानों के बीच की मामूली कहासुनी तक सीमित था। हालांकि, देखते ही देखते बात बढ़ती चली गई और दोनों गांवों के ग्रामीण भी इस बहस में कूद पड़े। सिलवा गांव के निवासी अपने किसान के पक्ष में खड़े हो गए, तो जाखड़िया गांव के लोग अपने किसान के समर्थन में उतर आए। दोनों पक्षों में तनातनी इतनी बढ़ गई कि इसकी सूचना दोनों रियासतों के प्रशासनिक अधिकारियों से होती हुई सीधे राजाओं तक पहुंच गई।

जब इस पूरे घटनाक्रम की खबर बीकानेर के राजा कर्ण सिंह और नागौर के राजा अमर सिंह राठौर तक पहुंची, तब माहौल बेहद तनावपूर्ण हो चुका था। उस दौरान अमर सिंह राठौर दिल्ली में मुगल बादशाह शाहजहाँ की सेवा में तैनात थे और व्यक्तिगत रूप से नागौर में मौजूद नहीं थे। इसके बावजूद दोनों रियासतों की सेनाएं पूरी तैयारी के साथ सीमा पर आमने-सामने आ डटीं। दोनों ओर से भीषण युद्ध शुरू हो गया और भारी मारकाट हुई। इस लड़ाई में दोनों रियासतों के कई सैनिक और नागरिक मारे गए। आखिरकार इस युद्ध में बीकानेर राज्य की सेना विजयी रही। युद्ध समाप्त होने के बाद उस विवादित तरबूज को सम्मानपूर्वक बीकानेर के राजा कर्ण सिंह के समक्ष पेश किया गया।

## मुरादाबाद में जब कद्दू की कीमत पर छिड़ गया खूनी संघर्ष
तरबूज के इस ऐतिहासिक युद्ध की तरह ही उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद शहर में घटी 'कद्दू गर्दी' की घटना भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है। यह घटना वर्ष 1857 के गदर के आसपास की बताई जाती है। उस दौर में मुरादाबाद में सुरक्षा व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए रामपुर के नवाब के सैनिकों की तैनाती की गई थी। रामपुर के ये सैनिक रोजाना अपनी ज़रूरत का सामान, राशन और अन्य रसद खरीदने के लिए मुरादाबाद के स्थानीय बाजारों में आया-जाया करते थे।

एक दिन बाजार में मुरादाबाद का एक स्थानीय किसान अपनी दुकान पर कद्दू बेच रहा था। रामपुर नवाब की सेना का एक पठान सैनिक वहां से गुजरा और उसने किसान से एक कद्दू देने को कहा। किसान ने जब उस कद्दू की कीमत बताई, तो पठान सैनिक को वह दाम बहुत ज्यादा लगा। सैनिक ने कम कीमत में कद्दू लेने की जिद की, लेकिन किसान का कहना था कि वह मेहनत से सब्जी उगाता है, इसलिए उसे कद्दू की उचित कीमत मिलनी चाहिए। किसान ने सैनिक से साफ कहा कि अगर वह सही दाम देगा तभी उसे कद्दू मिलेगा।

## दो दिनों तक भड़का दंगा और असरहीन अंत
दाम को लेकर शुरू हुई यह बहस देखते ही देखते तीखी नोकझोंक में बदल गई। गुस्साए पठान सैनिक ने बहस बढ़ानी शुरू कर दी। आवाज सुनकर आसपास मौजूद रामपुर नवाब के अन्य सैनिक भी अपने साथी के समर्थन में वहां पहुंच गए। दूसरी तरफ स्थानीय दुकानदार और नागरिक भी किसान के पक्ष में जमा हो गए। मामूली कहासुनी ने अचानक एक बड़े खूनी संघर्ष का रूप ले लिया और दोनों पक्षों के बीच लाठी-डंडे और हथियार चल गए।

इस घटना को लेकर इतिहासकारों के बीच अलग-अलग मत पाए जाते हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस विवाद को स्थानीय स्तर पर जल्द ही शांत करा लिया गया था। वहीं दूसरी ओर, कई प्रमुख अंग्रेज इतिहासकारों और स्थानीय अभिलेखों का दावा है कि इस कद्दू के विवाद को लेकर मुरादाबाद शहर में लगातार दो दिनों तक दंगा भड़का रहा। इस दंगे में लगभग 40 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। दो दिनों के भीषण उपद्रव के बाद भी इस 'कद्दू गर्दी' का कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। आखिरकार शहर के एक प्रभावशाली ठाकुर ने अपने प्रभाव और मध्यस्थता का इस्तेमाल करते हुए इस दंगे को शांत कराया।

डॉ. राजीव सक्सेना का कहना है कि राजस्थान की 'मतीरे की राड़' और मुरादाबाद की 'कद्दू गर्दी', दोनों ही घटनाएं इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि भारतीय इतिहास में अहंकार और छोटी-छोटी बातों को लेकर किस तरह बड़े-बड़े विवाद पैदा होते रहे हैं। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि जब समझदारी की जगह जिद ले लेती है, तो एक मामूली फल या सब्जी भी भारी जनहानि का कारण बन सकती है।

## सवाल-जवाब

### 1. 'मतीरे की राड़' का युद्ध किन दो रियासतों के बीच हुआ था?
यह युद्ध राजस्थान की बीकानेर रियासत (राजा कर्ण सिंह) और नागौर रियासत (राजा अमर सिंह राठौर) के बीच 17वीं सदी में हुआ था।

### 2. तरबूज को लेकर विवाद की मुख्य वजह क्या थी?
बीकानेर के सिलवा गांव में बोई गई तरबूज की बेल नागौर के जाखड़िया गांव तक फैल गई थी। बीकानेर का किसान बेल की जड़ के आधार पर और नागौर का किसान जमीन की सीमा के आधार पर तरबूज पर अपना हक जता रहा था।

### 3. 'मतीरे की राड़' युद्ध का नतीजा क्या रहा?
दोनों राज्यों की सेनाओं के बीच हुए भीषण युद्ध में बीकानेर राज्य की सेना विजयी हुई और तरबूज राजा कर्ण सिंह को सौंपा गया।

### 4. मुरादाबाद में 'कद्दू गर्दी' की घटना कब घटी थी?
यह घटना वर्ष 1857 के गदर के आसपास मुरादाबाद में घटी थी, जब रामपुर के नवाब के सैनिक शहर में तैनात थे।

### 5. 'कद्दू गर्दी' दंगे में कितने लोग मारे गए थे?
इतिहासकारों और अंग्रेज अभिलेखों के अनुसार एक कद्दू के दाम पर शुरू हुए दो दिवसीय दंगे में लगभग 40 लोगों की जान चली गई थी।

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