# तेलंगाना के आदिवासी इलाकों में दिवाली पर दांडारी गुस्साड़ी नृत्य की अनूठी धूम, नटराज बनकर युवक चुनते हैं जीवनसंगिनी

> आदिलाबाद के गोंड, कोलम और आंध समाज के लोग दिवाली पर करीब नौ दिनों तक दांडारी गुस्साड़ी उत्सव मनाते हैं, जिसमें युवा भगवान नटराज के रूप में रातभर नृत्य करते हैं.

**Type:** article · **Category:** कल्चर · **Published:** 2026-11-08 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/culture/telangana-ke-adivasi-ilakon-men-divali-para-dandari-gussadi-nritya-ki-anuthi-dhuma-nataraja-banakara-yuvaka-chunate-hain-jivanasng-57864 · **Language:** Hindi
**Tags:** आदिलाबाद, गुस्साड़ी नृत्य, दांडारी उत्सव, तेलंगाना, गोंड जनजाति, आदिवासी संस्कृति

दीपावली की रात जब पूरा देश दीपों की जगमगाहट में डूबा रहता है, तब तेलंगाना के जंगलों और पहाड़ियों से घिरे आदिवासी गांवों में ढोलक और पारंपरिक वाद्यों की अनोखी गूंज सुनाई देती है. राजधानी हैदराबाद से लगभग 300 किलोमीटर की दूरी पर बसे आदिलाबाद क्षेत्र के मारलावाई, नारनूर और जैनूर जैसे गांवों में यह समय पारंपरिक दांडारी गुस्साड़ी उत्सव का होता है. इस पावन पर्व को मनाने के लिए गोंड, कोलम और आंध समुदाय के लोग एक साथ जुटते हैं और यह आयोजन लगातार 8 से 9 दिनों तक चलता है. सदियों पुरानी इस सांस्कृतिक विरासत में आस्था, कठोर अनुशासन और सामाजिक मेलमिलाप का एक दुर्लभ संगम देखने को मिलता है.

## गांव के मुखिया का फैसला और गुस्साड़ी नर्तकों का चयन
इस पूरे उत्सव के शुभारंभ का दिन और समय हर गांव का मुखिया तय करता है, जिसे स्थानीय स्तर पर पटेल कहा जाता है. पटेल की अगुवाई में यह पर्व आम तौर पर दीपावली से ठीक पहले प्रारंभ होता है और त्योहार बीत जाने के कुछ दिनों बाद तक जारी रहता है. उत्सव के संचालन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी नर्तकों का चयन होता है. गांव का पटेल ही पूरी परख के बाद अपनी बस्ती से दो से आठ सबसे योग्य युवकों को चुनता है. गोंडी बोली में इन चुने हुए युवकों को गुस्साड़ी की संज्ञा दी जाती है, जो इस पूरे पर्व में मुख्य नर्तक की भूमिका निभाते हैं.

## शिव के नटराज स्वरूप का श्रृंगार और कठोर नियम
गुस्साड़ी बनने वाले नौजवान देवाधिदेव भगवान शिव के तांडव स्वरूप नटराज की तरह अपना रूप सजाते हैं. उनके हाथ में लकड़ी का एक मजबूत डंडा थमाया जाता है, जो भगवान शिव के त्रिशूल का प्रतीक माना जाता है. जब 40 से 50 लोगों का पूरा दल एक गांव से दूसरे गांव की यात्रा करता है, तब रात 10 बजे से लेकर सुबह 4 बजे तक ढोल की ताल पर ऊर्जावान नृत्य प्रस्तुत किया जाता है. इस उत्सव की अवधि में चुने गए गुस्साड़ी युवकों को बेहद सख्त नियमों का पालन करना होता है. उन्हें पूरे पर्व के दौरान नंगे पैर रहना पड़ता है और विश्राम के लिए जमीन पर ही सोना अनिवार्य होता है.

## नृत्य की विभिन्न शैलियां और जीवनसाथी चुनने का अवसर
दांडारी गुस्साड़ी उत्सव के दौरान मुख्य रूप से तीन प्रकार के नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं. इनमें पहला केंद्रीय गुस्साड़ी नृत्य है, जिसके अंतर्गत पांच अलग अलग उप शैलियां शामिल होती हैं. दूसरा नृत्य पोलाक कहलाता है, जिसमें पुरुष महिलाओं की वेशभूषा धारण करके गुस्साड़ी नर्तकों के संग कदम मिलाते हैं. तीसरा अद्यान नृत्य होता है, जिसे मुख्य रूप से महिलाएं प्रस्तुत करती हैं. जब यह सांस्कृतिक टोली दूसरे गांवों में पहुंचती है, तो वहां की युवतियां इन नर्तकों की कला देखने एकत्र होती हैं. यदि किसी युवती को कोई नर्तक पसंद आ जाए या युवक किसी कन्या में रुचि दिखाए, तो वे इस बात की सूचना अपने कुल के बुजुर्गों को देते हैं. इसके पश्चात दोनों परिवारों के वरिष्ठ सदस्य बैठकर रिश्ते को औपचारिक रूप से आगे बढ़ाते हैं. यद्यपि यह इस पर्व का मूल उद्देश्य नहीं है, फिर भी यह उत्सव जीवनसाथी चुनने का एक सहज माध्यम बन जाता है.

## वेशभूषा में ऐतिहासिक बदलाव और सरकारी सहायता
समय के साथ गुस्साड़ी नर्तकों की वेशभूषा में कई रोचक बदलाव आए हैं. पूर्व में नर्तक त्रिशूल की बनावट वाली टोपी पहनते थे, लेकिन वर्तमान समय में इसका स्थान मोरपंखों और छोटे शीशों से जड़ी गोल टोपी ने ले लिया है. वन्यजीव सुरक्षा कानूनों का आदर करते हुए अब हिरण की खाल की जगह बकरी की खाल का प्रयोग किया जाता है. कुछ युवा आधुनिकता का पुट जोड़ते हुए धूप के चश्मे और चमकीले लहंगे भी पहनने लगे हैं. इतिहासकारों का मानना है कि इस परंपरा का इतिहास करीब 2,500 साल पुराना है और इसका उल्लेख प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में भी मिलता है. इस अमूल्य धरोहर को सुरक्षित रखने के मकसद से तेलंगाना सरकार ने 1.5 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की है, जिसके माध्यम से करीब 1,000 सांस्कृतिक मंडलियों को 15-15 हजार रुपये की आर्थिक मदद दी जा रही है.

## इसका आप पर असर
यह प्राचीन परंपरा भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता और जनजातीय विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

- **तेलंगाना में:** राज्य के लगभग 1,000 सांस्कृतिक दलों को 15-15 हजार रुपये की सरकारी सहायता प्रदान की जा रही है. इससे स्थानीय जनजातीय युवाओं को अपनी 2,500 साल पुरानी कला शैली को बिना किसी वित्तीय संकट के जारी रखने में मदद मिलेगी.
- **भारत में:** राष्ट्रीय स्तर पर यह उत्सव देश की अनूठी जनजातीय धरोहर और पर्यावरण अनुकूल सांस्कृतिक बदलावों को दर्शाता है. यह आम नागरिकों और शोधकर्ताओं को भारत की प्राचीन परंपराओं तथा सामाजिक बंधनों को समझने का अवसर देता है.
- **युवाओं के लिए:** यह आयोजन युवाओं को अनुशासन, सामुदायिक सहयोग और सांस्कृतिक गौरव का व्यावहारिक अनुभव कराता है. इसमें भाग लेने वाले नर्तक नंगे पैर रहकर और जमीन पर सोकर अपनी प्राचीन जीवनशैली से गहरे जुड़े रहते हैं.
- **पर्यटन एवं शोध:** इस उत्सव के जरिए आदिलाबाद के गांवों में लोककला प्रेमियों और समाजशास्त्रियों की रुचि बढ़ रही है. स्थानीय अर्थव्यवस्था को सांस्कृतिक पर्यटन और उत्सव से जुड़े आयोजनों के माध्यम से अप्रत्यक्ष समर्थन मिलता है.

## ऐसा क्यों हुआ
दांडारी गुस्साड़ी उत्सव का आयोजन गोंड, कोलम और आंध समुदायों की सदियों पुरानी धार्मिक आस्था और सामाजिक व्यवस्था की निरंतरता के कारण होता है.

- **आध्यात्मिक मान्यता:** जनजातीय युवा भगवान शिव के नटराज स्वरूप को सम्मान देने और उनकी आराधना करने के लिए यह वेशभूषा धारण करते हैं. उनका मानना है कि लकड़ी का डंडा शिव के त्रिशूल की शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है.
- **सामुदायिक एकजुटता:** दिवाली के मौसम में फसल कटाई और पर्व के समय विभिन्न गांवों के बीच मैत्रीपूर्ण रिश्ते मजबूत करने के लिए यह दल एक बस्ती से दूसरी बस्ती जाता है. रातभर चलने वाले सामूहिक नृत्य से पड़ोसी गांवों के बीच आपसी सहयोग बढ़ता है.
- **वैवाहिक मेलजोल:** दूरदराज के क्षेत्रों में बसे परिवारों के लिए यह उत्सव आपसी जान पहचान और रिश्ते तय करने का स्वाभाविक मंच तैयार करता है. दोनों पक्षों के बुजुर्ग इस उत्सव के दौरान युवाओं की पसंद जानकर विवाह प्रस्तावों को आगे बढ़ाते हैं.
- **ऐतिहासिक निरंतरता:** लगभग 2,500 वर्षों से बौद्ध ग्रंथों में दर्ज यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक और व्यावहारिक रूप से आगे बढ़ती रही है. राज्य सरकार की आर्थिक सहायता ने इस लोककला के विलुप्त होने के खतरे को कम कर दिया है.

## सवाल-जवाब

### 1. दांडारी गुस्साड़ी उत्सव मुख्य रूप से किन क्षेत्रों में मनाया जाता है?
यह उत्सव तेलंगाना के आदिलाबाद क्षेत्र के मारलावाई, नारनूर और जैनूर जैसे आदिवासी गांवों में मनाया जाता है.

### 2. इस उत्सव में कौन से जनजातीय समुदाय भाग लेते हैं?
इस सांस्कृतिक उत्सव में मुख्य रूप से गोंड, कोलम और आंध समुदाय के लोग एक साथ मिलकर हिस्सा लेते हैं.

### 3. गुस्साड़ी नर्तकों का चयन कौन करता है और उनकी संख्या कितनी होती है?
गांव का मुखिया यानी पटेल प्रत्येक गांव से दो से आठ युवकों को मुख्य गुस्साड़ी नर्तक के रूप में चुनता है.

### 4. नर्तकों को इस दौरान किन विशेष नियमों का पालन करना पड़ता है?
चुने गए गुस्साड़ी नर्तकों को पूरे उत्सव के दौरान नंगे पैर रहना होता है और रात में जमीन पर ही सोना पड़ता है.

### 5. उत्सव में प्रस्तुत किए जाने वाले तीन प्रमुख नृत्य कौन से हैं?
इसमें मुख्य गुस्साड़ी नृत्य, पुरुषों द्वारा स्त्री वेश में किया जाने वाला पोलाक नृत्य और महिलाओं का अद्यान नृत्य शामिल है.

### 6. तेलंगाना सरकार इस परंपरा के संरक्षण के लिए क्या सहायता दे रही है?
सरकार ने 1.5 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं, जिसके तहत करीब 1,000 मंडलियों को 15-15 हजार रुपये की मदद दी जा रही है.

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