तेलंगाना के नए सचिवालय के भव्य गुंबदों में रची-बसी है ऐतिहासिक वनपर्ति महल की वास्तुकला हैदराबाद के आधुनिक डॉ. बी. आर. आंबेडकर सचिवालय की रूपरेखा महबूबनगर के वनपर्ति संस्थानम से प्रेरित है, जहां के शासकों ने कभी तकनीकी शिक्षा के लिए अपना महल दान कर दिया था. हैदराबाद के हृदय स्थल में मौजूद डॉ. बी. आर. आंबेडकर राज्य सचिवालय आज अपनी अद्भुत वास्तुकला, सफेद संगमरमरी आभा और गगनचुंबी गुंबदों के कारण देशभर का ध्यान आकर्षित कर रहा है. आधुनिक इंजीनियरिंग और स्थापत्य का यह अनूठा ढांचा केवल समकालीन तकनीक का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके अस्तित्व के तार तेलंगाना के समृद्ध रजवाड़े के इतिहास से जुड़े हुए हैं. बहुत कम नागरिकों को इस तथ्य की जानकारी है कि इस भव्य प्रशासनिक मुख्यालय का बाह्य स्वरूप महबूबनगर क्षेत्र के ऐतिहासिक वनपर्ति संस्थानम के प्राचीन किले और महल की बनावट से प्रेरित है. प्राचीन राजमहल से आधुनिक सचिवालय तक का स्थापत्य सफर सचिवालय का निर्माण कराने वाले मुख्य वास्तुकारों ने इस बात को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि नई इमारत के गुंबदों की बनावट, उनकी नक्काशी और बाहरी स्वरूप को तैयार करते समय वनपर्ति के ऐतिहासिक महल की वास्तुकला को आधार बनाया गया था. सदियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर को आधुनिक प्रशासनिक भवन में पिरोने के इस प्रयास ने तेलंगाना की प्राचीन पहचान को जीवंत कर दिया है. जहां एक तरफ यह इमारत आधुनिक प्रशासनिक तंत्र का केंद्र है, वहीं दूसरी ओर इसका हर कोना वनपर्ति रियासत के स्वर्णिम दौर की स्थापत्य कला का स्मरण कराता है. निज़ाम काल का शक्तिशाली संस्थानम और वीरांगनाओं का सुशासन वनपर्ति संस्थानम का अतीत अत्यंत समृद्ध और प्रभावशाली रहा है. ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार निज़ाम शासन के समय यह इलाका दक्कन की प्रमुख और संपन्न रियासतों में गिना जाता था. इस परिसर के संरक्षण से जुड़े जानकारों के मुताबिक, स्वतंत्रता से पूर्व इस गद्दी पर 13 राजाओं और 3 रानियों ने सफलतापूर्वक शासन किया. वर्तमान भव्य महल और किले का निर्माण 19वीं शताब्दी में राजा द्वितीय रामेश्वर राव के नेतृत्व में कराया गया था. इस रियासत के इतिहास की सबसे अनूठी विशेषता यह रही कि यहां सत्ता केवल राजाओं तक सीमित नहीं थी. रानी शंकरम्मा और रानी जानम्मा जैसी कुशल शासिकाओं ने अपने मजबूत नेतृत्व से राज्य की बागडोर संभाली. इन वीरांगनाओं ने प्रशासनिक तंत्र को सुदृढ़ करने के साथ-साथ क्षेत्र में जल संरक्षण और बुनियादी विकास के लिए कई ऐतिहासिक तालाबों और नहरों का निर्माण करवाया, जिनकी उपयोगिता आज भी देखी जा सकती है. आज़ादी के बाद शिक्षा के लिए महल का ऐतिहासिक समर्पण वनपर्ति राजपरिवार का दृष्टिकोण केवल सत्ता संचालन तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने समाज सुधार और जनहित में भी अनुकरणीय मिसाल पेश की. वर्ष 1947 में आज़ादी और उसके बाद भारतीय संघ में रियासतों के एकीकरण के समय वनपर्ति के तत्कालीन राजा जे. रामेश्वर राव ने एक युगांतरकारी निर्णय लिया. उन्होंने स्थानीय युवाओं के बौद्धिक और तकनीकी विकास के लिए अपने इस विशाल ऐतिहासिक महल का एक बड़ा हिस्सा शासन को दान में दे दिया. इस ऐतिहासिक महल के प्रांगण में राज्य का पहला सरकारी पॉलिटेक्निक कॉलेज स्थापित किया गया. इस ऐतिहासिक शैक्षणिक संस्थान का औपचारिक लोकार्पण स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 11 अक्टूबर 1959 को अपने कर-कमलों से किया था. किसी पूर्व राजपरिवार द्वारा जनता की शिक्षा के लिए अपने निजी महल को सौंप देना भारतीय इतिहास के दुर्लभ उदाहरणों में गिना जाता है. युवा पीढ़ी को सशक्त बना रहा कृष्णदेवराय पॉलिटेक्निक कॉलेज आज दशकों बाद भी इस ऐतिहासिक किले के भीतर ‘कृष्णदेवराय सरकारी पॉलिटेक्निक कॉलेज’ पूरी गरिमा के साथ संचालित हो रहा है. यहां हर वर्ष विभिन्न ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों से आने वाले सैकड़ों छात्र तकनीकी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और विभिन्न उद्योगों में अपनी जगह बना रहे हैं. यह प्राचीन परिसर केवल पत्थरों और चूने की पारंपरिक चारदीवारी नहीं है, बल्कि यह लोक कल्याण, सामाजिक त्याग और दूरदर्शी सोच का सजीव प्रमाण है. एक तरफ यह धरोहर युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने की प्रयोगशाला बनी हुई है, वहीं दूसरी तरफ इसकी अनूठी स्थापत्य शैली राज्य के सर्वोच्च प्रशासनिक सचिवालय के रूप में अमर हो चुकी है. इसका आप पर असर यह ऐतिहासिक तथ्य आम नागरिकों और छात्रों के लिए अपनी स्थानीय सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण और शिक्षा के महत्व को रेखांकित करता है. • भारत में: देश के नागरिक यह समझ सकते हैं कि कैसे रियासतों की प्राचीन स्थापत्य कला को आधुनिक सार्वजनिक इमारतों में सफलतापूर्वक शामिल किया जा सकता है. यह हमारे ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण और उन्हें उपयोगी शैक्षिक परिसरों में बदलने का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है. • तेलंगाना में: राज्य के छात्रों और युवाओं के लिए यह जानना गर्व की बात है कि हैदराबाद का नया सचिवालय महबूबनगर के गौरवशाली इतिहास का प्रतिनिधित्व करता है. इसके अलावा, कृष्णदेवराय पॉलिटेक्निक कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र सीधे तौर पर एक ऐतिहासिक धरोहर परिसर से तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं. ऐसा क्यों हुआ सचिवालय के डिज़ाइन में वनपर्ति महल की स्थापत्य कला को इसलिए शामिल किया गया ताकि आधुनिक तेलंगाना का प्रशासनिक ढांचा अपनी ही मिट्टी की ऐतिहासिक जड़ों और विरासत को प्रदर्शित कर सके. • स्थापत्य प्रेरणा: नए सचिवालय के मुख्य वास्तुकारों ने इमारत के बाहरी गुंबदों और संरचनात्मक विवरणों के लिए 19वीं सदी के वनपर्ति महल के डिज़ाइनों का गहन अध्ययन किया. इस चयन का उद्देश्य ऐतिहासिक पहचान को समकालीन सरकारी मुख्यालय में जीवंत रूप देना था. • रियासत का ऐतिहासिक योगदान: वनपर्ति संस्थानम निज़ाम काल की एक प्रभावशाली रियासत थी, जहां रानी शंकरम्मा और रानी जानम्मा जैसी वीरांगनाओं ने प्रशासनिक सुधार और जल संरक्षण के बड़े काम किए थे. इस ऐतिहासिक प्रतिष्ठा ने इसे राज्य की सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख प्रतीक बनाया. • शिक्षा के लिए राजसी समर्पण: स्वतंत्रता के बाद राजा जे. रामेश्वर राव द्वारा तकनीकी शिक्षा के प्रसार हेतु अपने महल का बड़ा हिस्सा दान करने के फैसले ने इस इमारत को एक विशेष सम्मान और जनहितैषी पहचान दिलाई. सवाल-जवाब 1. हैदराबाद के नए डॉ. बी. आर. आंबेडकर सचिवालय का डिज़ाइन किस ऐतिहासिक इमारत से प्रेरित है? इस सचिवालय के बाहरी ढांचे और भव्य गुंबदों का डिज़ाइन तेलंगाना के महबूबनगर क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक वनपर्ति संस्थानम के महल की वास्तुकला से प्रेरित है. 2. वनपर्ति महल और किले का निर्माण किस शासक ने करवाया था? इस भव्य महल और किले का निर्माण 19वीं सदी के दौरान वनपर्ति के शासक राजा द्वितीय रामेश्वर राव द्वारा करवाया गया था. 3. आज़ादी से पहले वनपर्ति रियासत पर कितने शासकों ने राज किया था? इतिहासकारों और महल के संरक्षकों के अनुसार, आज़ादी से पहले इस रियासत पर कुल 13 राजाओं और 3 रानियों ने शासन किया था. 4. वनपर्ति रियासत की प्रमुख महिला शासक कौन थीं और उनका क्या योगदान था? रानी शंकरम्मा और रानी जानम्मा यहां की प्रमुख महिला शासक थीं, जिन्होंने मजबूत प्रशासन देने के साथ-साथ विकास कार्यों और जल संरक्षण के लिए ऐतिहासिक कदम उठाए. 5. वनपर्ति के महल में पॉलिटेक्निक कॉलेज की शुरुआत कब और किसके द्वारा की गई थी? राजा जे. रामेश्वर राव द्वारा महल दान किए जाने के बाद, 11 अक्टूबर 1959 को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने यहां राज्य के पहले सरकारी पॉलिटेक्निक कॉलेज का उद्घाटन किया था. 6. वर्तमान में वनपर्ति के इस ऐतिहासिक किले में कौन सा संस्थान चल रहा है? वर्तमान में इस महल परिसर में ‘कृष्णदेवराय सरकारी पॉलिटेक्निक कॉलेज’ संचालित हो रहा है, जहां सैकड़ों छात्र तकनीकी शिक्षा हासिल कर रहे हैं. प्रेरणा और सबक वनपर्ति संस्थानम का इतिहास यह सिखाता है कि वास्तविक शक्ति और नेतृत्व निजी विशेषाधिकारों में नहीं, बल्कि समाज के उत्थान और शिक्षा के प्रसार में निहित है. • निजी संपत्ति से जनहित को प्राथमिकता: राजा जे. रामेश्वर राव ने राजशाही ठाठ-बाट को त्यागकर अपना ऐतिहासिक महल युवाओं की तकनीकी शिक्षा के लिए दान कर दिया. यह कदम सिखाता है कि व्यक्तिगत संपदा से ऊपर उठकर समाज के भविष्य में निवेश करना सबसे बड़ा नेतृत्व है. • समावेशी और दूरदर्शी महिला नेतृत्व: रानी शंकरम्मा और रानी जानम्मा ने प्रशासनिक सुधारों और जल संरक्षण परियोजनाओं के जरिए सुशासन की मिसाल पेश की. यह दर्शाता है कि स्थानीय समस्याओं का समाधान दूरदर्शी योजना और मजबूत इच्छाशक्ति से ही संभव है. • विरासत और आधुनिकता का संतुलन: दशकों पुराना किला आज भी पॉलिटेक्निक कॉलेज के रूप में युवाओं का करियर संवार रहा है और सचिवालय को प्रेरित कर रहा है. यह सबक देता है कि पुरानी धरोहरों को नष्ट करने के बजाय उन्हें उपयोगी बनाकर संरक्षित किया जाना चाहिए. https://trendkia.com/culture/telangana-ke-nae-sachivalaya-ke-bhavya-gunbadon-men-rachi-basi-hai-aitihasika-vanaparthy-mahala-ki-vastukala-49400 TrendKia — Har trend, sabse pehle.