उत्तराखंड के जनकवि गिरीश तिवारी 'गिर्दा', जिनके गीतों और संघर्ष ने बदल दी थी जनआंदोलनों की दिशा उत्तराखंड के प्रसिद्ध जनकवि और गीतकार गिरीश तिवारी 'गिर्दा' की पुण्यतिथि पर उनके संघर्ष, जन आंदोलनों में उनकी भूमिका और पहाड़ की आवाज बनने की कहानी। उत्तराखंड के इतिहास में कुछ ऐसी शख्सियतें दर्ज हैं जिन्हें किसी एक निश्चित दायरे में समेट पाना संभव नहीं है। गिरीश तिवारी 'गिर्दा' भी उन्हीं विशिष्ट व्यक्तित्वों में शामिल थे। उत्तराखंड के लोग उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धा के साथ याद करते हैं। वह महज एक कवि या गीतकार ही नहीं थे, बल्कि आम जनता के हक और सरोकारों को अपनी कला में पिरोने वाले सच्चे जनकवि थे। उन्होंने अपनी कविताओं और ओजस्वी गीतों के माध्यम से हमेशा पर्वतीय क्षेत्र के निवासियों की मुश्किलों, उनकी उम्मीदों और उनके बुनियादी अधिकारों को मुखरता से उठाया। गिर्दा ने अपनी कला को केवल किसी मंच की चकाचौंध तक सीमित नहीं रखा। वह हर बड़े जन आंदोलन के दौरान सीधे मैदान में लोगों के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे और अपनी रचनाओं के जरिए जनता में नया जोश तथा साहस भरते रहे। उत्तराखंड के पृथक राज्य आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी और भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उनके रचे गए जनगीत उस संघर्ष की असल पहचान बने, जिन्होंने अनगिनत लोगों को एक मंच पर एकजुट करने का अभूतपूर्व काम किया। कौन थे गिरीश तिवारी 'गिर्दा' गिर्दा का जुड़ाव उत्तराखंड की धरती पर हुए कई ऐतिहासिक आंदोलनों से गहराई से रहा। वर्ष 1977 के प्रसिद्ध वन बचाओ आंदोलन से लेकर वर्ष 1984 के नशा नहीं, रोजगार दो आंदोलन और वर्ष 1994 के उत्तराखंड राज्य आंदोलन तक उनकी रचनाएं हर संघर्षरत इंसान की जुबान पर थीं। वह अपने गीतों के जरिए पहाड़ के जंगलों, जमीनों, रोजगार के अवसरों और आम नागरिकों के अधिकारों की पुरजोर वकालत करते थे। राज्य गठन के उस दौर में उनके गीतों ने जनमानस में एक नई ऊर्जा का संचार किया। उनकी हर कृति में पर्वतीय क्षेत्र के सामान्य आदमी की पीड़ा और उसकी सीधी आवाज साफ झलकती थी, जिसके चलते वह धीरे-धीरे उत्तराखंड के जनसंघर्षों का पर्याय बन गए। लखनऊ में रिक्शा चलाने से लेकर पहाड़ की मुखर आवाज बनने तक का सफर गिर्दा का व्यक्तिगत जीवन काफी कड़े संघर्षों के बीच बीता। उन्होंने उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर में रिक्शा चलाकर भी अपनी रोजी-रोटी चलाई, लेकिन बाद में वह पूरी तरह से जनहित के सरोकारों और सामाजिक मुद्दों के साथ जुड़ गए। पर्वतीय इलाकों में उठने वाले आंदोलनों और तमाम सामाजिक विषयों पर उन्होंने निरंतर लेखन किया और गांवों से लेकर शहरों तक लोगों के बीच जाकर अपनी बात रखी। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह जटिल और गंभीर राजनीतिक व सामाजिक बातों को भी बेहद सरल आम बोलचाल की भाषा में कह देते थे। उनकी कविताएं और गीत सीधे सुनने वाले के हृदय तक उतर जाते थे, यही वजह थी कि पढ़े-लिखे बुद्धिजीवियों से लेकर दूर-दराज के गांवों में रहने वाले सामान्य लोगों तक उनकी रचनाओं की गहरी पहुंच थी। राजनीतिक और व्यवस्था की खामियों पर बेबाक राय गिर्दा ने अपनी कविताओं और गीतों के माध्यम से समाज तथा शासन-प्रशासन की व्यवस्था में मौजूद कमियों पर भी कड़े सवाल खड़े किए। उन्होंने उन तमाम मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाया जो सीधे तौर पर आम जनजीवन से जुड़े हुए थे। राज्य के आंदोलन के दौरान उनके गीत और उत्तराखंड बुलेटिन काफी चर्चा का केंद्र रहे। नैनीताल के डीएसबी कॉलेज की प्रोफेसर डॉ. सावित्री केड़ा जंतवाल के अनुसार, गिर्दा ने अपनी रचनाओं के जरिए समाज के बिखरे हुए लोगों को एक सूत्र में पिरोने और सार्थक सामाजिक बदलाव लाने का सराहनीय कार्य किया। वह केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि जन आंदोलनों की नब्ज़ को बहुत करीब से समझने वाले प्रबुद्ध व्यक्ति थे। दूरदर्शी सोच के धनी थे जनकवि गिर्दा की रचनाओं में उस वक्त के ज्वलंत सवालों के साथ-साथ भविष्य में आने वाली चुनौतियों की गहरी चिंता भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी। यही कारण है कि उनकी कही कई बातें और कविताएं बाद के वर्षों में उत्तराखंड के सामने आई विभिन्न परिस्थितियों से बिल्कुल मेल खाती नजर आईं। उनके साथ आंदोलनों में कंधे से कंधا मिलाकर चलने वाले लोग आज भी उन्हें केवल एक कवि के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे सच्चे साथी के रूप में याद करते हैं जो हर विकट परिस्थिति में जनता के साथ खड़ा रहा। उनकी सबसे बड़ी शक्ति यह थी कि वह किसी बड़े मंच की मोहताज हुए बिना सीधे लोगों के दिलों में उतर जाते थे। उनकी रचनाएं किसी बंद किताब के पन्नों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि वे सीधे आंदोलनों और आम जनता की जुबान का स्थायी हिस्सा बन गईं। वर्ष 2010 में हमेशा के लिए थम गई वह ओजस्वी आवाज उत्तराखंड के इस महान जनकवि का 22 अगस्त 2010 को निधन हो गया। उनके इस तरह दुनिया से चले जाने के बाद उत्तराखंड ने एक ऐसी बेबाक आवाज हमेशा के लिए खो दी जो सीधे आम जनता के बीच से उठकर सामने आती थी। आज भले ही गिर्दा शारीरिक रूप से इस दुनिया में मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनके ओजस्वी गीत और प्रेरणादायक कविताएं आज भी लोगों के दिलों और स्मृतियों में पूरी तरह जीवंत हैं। सवाल-जवाब 1. गिरीश तिवारी 'गिर्दा' कौन थे? गिरीश तिवारी 'गिर्दा' उत्तराखंड के एक प्रसिद्ध जनकवि, गीतकार और सामाजिक कार्यकर्ता थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए पहाड़ के मुद्दों को उठाया। 2. गिर्दा का निधन कब हुआ था? गिरीश तिवारी 'गिर्दा' का निधन 22 अगस्त 2010 को हुआ था। 3. किन प्रमुख आंदोलनों से जुड़े रहे थे गिर्दा? गिर्दा 1977 के वन बचाओ आंदोलन, 1984 के रोजगार आंदोलन और 1994 के उत्तराखंड राज्य आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े रहे थे। 4. गिर्दा के जीवन से जुड़ा संघर्ष क्या था? अपने शुरुआती जीवन में गिर्दा ने अपनी आजीविका चलाने के लिए लखनऊ में रिक्शा भी चलाया था। प्रेरणा और सबक संघर्ष से पहचान: अभावों और लखनऊ में रिक्शा चलाने जैसी कठिन परिस्थितियों के बावजूद गिर्दा ने जनसरोकारों का दामन नहीं छोड़ा, जो सिखाता है कि कठिन परिस्थितियां आपके बड़े लक्ष्यों को नहीं रोक सकतीं। कला को जन-जन तक पहुंचाना: उन्होंने अपनी कविताओं और गीतों को मंचों या किताबों तक सीमित न रखकर आम आदमी की जुबान बनाया, जिससे कला समाज में वास्तविक बदलाव का माध्यम बन सकती है। दूरदर्शिता और संवेदनशीलता: सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर उनकी पैनी नजर और दूरदर्शी सोच ने उन्हें केवल एक रचनाकार नहीं बल्कि समाज का सच्चा मार्गदर्शक बनाया। https://trendkia.com/culture/uttarakhand-ke-janakavi-girish-tiwari-girda-20309 TrendKia — Har trend, sabse pehle.