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  "type": "article",
  "title": "विभाजन के खौफनाक दौर में दिल्ली में ऐसे जली थी इंसानियत की लौ, स्वयंसेवकों और सेंट स्टीफंस ने बचाई थीं हज़ारों जानें",
  "summary": "1947 के विभाजन के दौरान जब दिल्ली सांप्रदायिक हिंसा और शरणार्थियों के संकट से जूझ रही थी, तब विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं, डॉक्टरों और धार्मिक संगठनों ने धर्म से ऊपर उठकर हज़ारों विस्थापितों की जान बचाई।",
  "content": "अगस्त 1947 में जब देश का विभाजन हुआ, तब सरहद पार से विस्थापित होकर आए लाखों परिवारों में अभिनेता मनोज कुमार का परिवार भी शामिल था। सीमा पार से दिल्ली पहुंचने पर उनका छोटा भाई गंभीर रूप से बीमार पड़ गया था। उस विकट परिस्थिति में उनका इलाज सेंट स्टीफंस अस्पताल में कराया गया, जबकि मनोज कुमार का पूरा परिवार सैकड़ों अन्य शरणार्थियों के साथ सिविल लाइंस स्थित दिल्ली ब्रदरहुड हाउस के परिसर में ठहरा। इन दो संस्थाओं द्वारा संकट के समय दी गई मदद के प्रति कृतज्ञता का भाव मनोज कुमार के मन में ताउम्र बना रहा। दिल्ली ब्रदरहुड सोसाइटी के प्रभारी ब्रदर सोलोमन जॉर्ज के अनुसार, मनोज कुमार जीवन के अंतिम समय तक इस संस्था का गहरा सम्मान करते रहे।\n\n \n\nविभाजन के दौरान दिल्ली का खौफनाक मंजर और जनसांख्यिकी बदलाव\n\nवर्ष 1947 के उस दौर में दिल्ली की स्थिति अत्यंत भयावह हो चुकी थी। एक तरफ जहां सांप्रदायिक दंगों की आग पूरे शहर को अपनी चपेट में ले रही थी, वहीं दूसरी ओर सरहद पार से आने वाले हिंदू और सिख शरणार्थियों की भारी भीड़ शहर में दाखिल हो रही थी। उस समय दिल्ली की कुल आबादी लगभग नौ लाख के आसपास थी। विभाजन की त्रासदी के बीच इस शहर से करीब तीन लाख मुसलमान पाकिस्तान चले गए, जबकि पाकिस्तान वाले इलाकों से आए लगभग पांच लाख हिंदू और सिख शरणार्थी यहां आकर बसने लगे। उस दौर में पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन का दृश्य दिल दहला देने वाला था। वहां आने वाली रेलगाड़ियां खून से लथपथ, गंभीर रूप से घायल और खौफजदा यात्रियों से भरी होती थीं। स्टेशन पर चारों ओर चीख-पुकार, अपनों को खोने का दर्द और अनिश्चितता का माहौल व्याप्त था।\n\n \n\nदिल्ली ब्रदरहुड सोसाइटी और कैंब्रिज मिशन की ऐतिहासिक भूमिका\n\nसरकारी तंत्र की सीमाओं के बीच स्थिति को संभालने के लिए कई स्वयंसेवी संस्थाएं राहत कार्य के लिए आगे आईं। इनमें दिल्ली ब्रदरहुड सोसाइटी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। इस संस्था की नींव 1877 में कैंब्रिज मिशन के साथ राजधानी में रखी गई थी। इसी मिशन ने आगे चलकर 1881 में प्रसिद्ध सेंट स्टीफंस कॉलेज और 1885 में सेंट स्टीफंस अस्पताल की स्थापना की थी। विभाजन की भीषण हिंसा के समय इस संस्था के निडर स्वयंसेवक पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर खुद मौजूद रहते थे। वे ट्रेनों से उतरने वाले घायलों और असहाय शरणार्थियों को तत्काल अस्पताल पहुंचाते थे। अस्पताल में डॉ. रूथ रोजवियर जैसी समर्पित महिला चिकित्सकों की देखरेख में अनगिनत घायलों की शल्यचिकित्सा और इलाज किया गया।\n\n इसके साथ ही सिविल लाइंस में स्थित ब्रदरहुड हाउस परिसर में फादर वेदरवेल के मार्गदर्शन में शरणार्थियों के लिए अस्थायी आश्रय स्थल बनाया गया था। वहां जाति, धर्म और समुदाय की दीवारों को परे रखकर हर विस्थापित व्यक्ति को पीने का साफ पानी, भोजन, दवाइयां, छाया और सुरक्षा उपलब्ध कराई गई। संस्था के कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों ने बिना थके दिन-रात सेवा भाव से काम किया, जिसके चलते सेंट स्टीफंस अस्पताल और कॉलेज संकट के उस दौर में मानवीय सहायता के जीवंत केंद्र बनकर उभरे।\n\n \n\nधार्मिक, सामाजिक और सिख संगठनों का राहत अभियान\n\nविभाजन की विभीषिका के समय केवल ईसाई मिशनरी ही नहीं, बल्कि अन्य सामाजिक और धार्मिक संगठन भी पूरी ताकत से राहत कार्यों में जुटे हुए थे। सनातन धर्म और आर्य समाज से जुड़े कार्यकर्ताओं ने सीमा पार से आ रहे विस्थापितों की सुरक्षा का जिम्मा संभाला। उन्होंने शहर भर में राहत शिविर लगाए और भोजन सामग्री का सुचारू वितरण सुनिश्चित किया।\n\n दूसरी ओर, सिख समुदाय ने भी अभूतपूर्व एकजुटता का परिचय दिया। जत्थेदार संतोख सिंह के कुशल नेतृत्व में सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समितियों तथा विभिन्न सिख सामाजिक संगठनों ने शरणार्थियों के लिए लंगर, चिकित्सा शिविर और सुरक्षा का पुख्ता प्रबंध किया। इन स्वयंसेवकों ने स्टेशन से लेकर शिविरों तक दिन-रात पहरा दिया। ऐतिहासिक रूप से यही निस्वार्थ प्रयास आगे चलकर दिल्ली में शिक्षा के प्रसार का माध्यम बने, जिनसे माता सुंदरी कॉलेज और हरकिशन पब्लिक स्कूल जैसी प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थाओं की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।\n\n \n\nरेड क्रॉस, महिला समूहों और डॉ. एनसी जोशी का बलिदान\n\nस्वास्थ्य सेवाओं और आवश्यक दवाओं की आपूर्ति में रेड क्रॉस ने भी बड़ा योगदान दिया। वहीं लेडी माउंटबेटन की अध्यक्षता में गठित 'यूनाइटेड काउंसिल फॉर रिलीफ एंड वेलफेयर' ने विभिन्न गैर-सरकारी स्वयंसेवी संगठनों के कार्यों में समन्वय स्थापित किया, जिससे राहत सामग्री सही स्थानों तक पहुंच सकी।\n\n इसके अतिरिक्त भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राहत समितियों, कस्तूरबा कार्यकर्ताओं तथा अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की दिल्ली शाखा से जुड़ी महिला कार्यकर्ताओं ने शरणार्थी शिविरों में बच्चों की देखभाल, भोजन पकाने और वस्त्र वितरण का जिम्मा संभाला। इसी दौर में करोल बाग क्षेत्र के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. एनसी जोशी अपनी जान की परवाह किए बिना दंगों में घायल हुए लोगों का इलाज कर रहे थे। निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा करते हुए दंगाइयों ने उनकी हत्या कर दी। आज उन्हीं की स्मृति में करोल बाग स्थित जोशी रोड पर डॉ. एनसी जोशी अस्पताल संचालित हो रहा है, जो उनके बलिदान की याद दिलाता है।\n\n \n\nअस्पतालों में 18 घंटे की ड्यूटी और डॉ. सुशीला नैयर का योगदान\n\nउस भीषण संकट के समय दिल्ली के प्रमुख अस्पतालों पर घायलों का भारी दबाव था। इरविन अस्पताल (जिसे अब लोक नायक अस्पताल के नाम से जाना जाता है) और लेडी हार्डिंग अस्पताल दिन-रात घायलों के इलाज में लगे हुए थे। लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज की तत्कालीन प्रधानाचार्या डॉ. के.जे. मैक्डरमेट और उनकी सहयोगी डॉ. ओ.पी. बाली बिना विश्राम किए लगातार 18-18 घंटे तक मरीजों का इलाज और देखभाल करती थीं।\n\n राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की निजी चिकित्सक डॉ. सुशीला नैयर भी संकट की इस घड़ी में शरणार्थियों और पीड़ितों की सेवा में जुटी रहीं। वे गांधी जी के साथ हिंसा प्रभावित संवेदनशील इलाकों का दौरा करती थीं और लोगों से शांति व भाईचारे की अपील करती थीं। स्वतंत्रता के बाद डॉ. सुशीला नैयर आगे चलकर दिल्ली की पहली स्वास्थ्य मंत्री बनीं और उन्होंने स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार किए।\n\n \n\nमानवता की अमिट मिसाल और ऐतिहासिक सीख\n\n1947 के विभाजन ने दिल्ली को गहरे सामाजिक और भावनात्मक जख्म दिए। इस विभीषिका में लाखों लोग बेघर हो गए और हजारों निर्दोष लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। लेकिन उस घोर अंधकार के बीच स्वयंसेवकों, डॉक्टरों और नागरिक समूहों द्वारा जलाई गई इंसानियत की मशाल ने अनगिनत जिंदगियों को नई राह दिखाई।\n\n बिना किसी राजनीतिक स्वार्थ के, धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर जिन लोगों ने पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाया, वे सच्चे अर्थों में मानवता के रक्षक थे। पुरानी दिल्ली स्टेशन से घायलों को अस्पताल पहुंचाना, शिविरों में भोजन-पानी की व्यवस्था करना और हिंसा पर अंकुश लगाना इन समर्पित लोगों की कड़ी मेहनत का ही नतीजा था। आज भी दिल्ली में ऐसे बुजुर्ग मिल जाएंगे जिन्होंने अपनी आंखों से उन कठिन दिनों में फरिश्तों की तरह काम करने वाले स्वयंसेवकों को देखा था। ब्रदरहुड हाउस और सेंट स्टीफंस अस्पताल आज भी उस दौर की गवाही देते हैं, जब इंसानियत ने हर तरह के भेदभाव को भुलाकर केवल मानव सेवा को अपना धर्म बनाया था।\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: यह ऐतिहासिक विवरण देशवासियों को संकट के समय सांप्रदायिक सद्भाव, सामाजिक एकजुटता और निस्वार्थ जनसेवा के स्थायी महत्व की याद दिलाता है।\n• दिल्ली में: यह गाथा राजधानी के निवासियों को सेंट स्टीफंस अस्पताल, जोशी रोड और लोक नायक अस्पताल जैसे ऐतिहासिक संस्थानों की विरासत और 1947 के शरणार्थी पुनर्वास इतिहास से जोड़ती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. 1947 के विभाजन के समय मनोज कुमार के परिवार की मदद किस अस्पताल और संस्था ने की थी?\nविभाजन के समय दिल्ली पहुंचने पर मनोज कुमार के बीमार छोटे भाई का इलाज सेंट स्टीफंस अस्पताल में हुआ था, और उनका परिवार दिल्ली ब्रदरहुड हाउस परिसर में ठहरा था।\n\n2. 1947 में दिल्ली की आबादी में क्या बड़ा जनसांख्यिकी बदलाव आया था?\nउस समय नौ लाख की आबादी वाली दिल्ली से लगभग तीन लाख मुसलमान पाकिस्तान चले गए थे, जबकि सीमा पार से आए करीब पांच लाख हिंदू और सिख शरणार्थी दिल्ली में आकर बस गए थे।\n\n3. दिल्ली ब्रदरहुड सोसाइटी की स्थापना कब हुई थी और इसका सेंट स्टीफंस से क्या संबंध है?\nदिल्ली ब्रदरहुड सोसाइटी की जड़ें 1877 के कैंब्रिज मिशन से जुड़ी हैं, जिसने 1881 में सेंट स्टीफंस कॉलेज और 1885 में सेंट स्टीफंस अस्पताल की नींव रखी थी।\n\n4. करोल बाग के डॉ. एनसी जोशी का विभाजन के दौरान क्या योगदान रहा था?\nडॉ. एनसी जोशी करोल बाग और आसपास के इलाकों में दंगों के घायलों का इलाज कर रहे थे, जहां सेवा करते समय उनकी हत्या कर दी गई। आज करोल बाग की जोशी रोड पर उन्हीं के नाम पर अस्पताल चल रहा है।\n\n5. विभाजन के दौरान सिख संगठनों ने राहत कार्य में क्या भूमिका निभाई?\nजत्थेदार संतोख सिंह के नेतृत्व में सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समितियों और अन्य सिख संगठनों ने शरणार्थियों के लिए लंगर, चिकित्सा सहायता और सुरक्षा का काम संभाला, जिससे आगे चलकर माता सुंदरी कॉलेज और हरकिशन पब्लिक स्कूल की स्थापना हुई।\n\n6. गांधी जी की निजी चिकित्सक डॉ. सुशीला नैयर की विभाजन के समय क्या भूमिका थी?\nडॉ. सुशीला नैयर ने शरणार्थियों की सेवा की और गांधी जी के साथ दंगा प्रभावित इलाकों में जाकर शांति की अपील की। वे बाद में दिल्ली की पहली स्वास्थ्य मंत्री बनीं।\n\nप्रेरणा और सबक\n• मानवता धर्म से ऊपर: 1947 की विभीषिका में स्वयंसेवकों ने बिना जाति या धर्म का भेद किए हर पीड़ित को शरण, दवा और सुरक्षा प्रदान की।\n• सामूहिक एकजुटता की शक्ति: कैंब्रिज मिशन, सिख गुरुद्वारा समितियों, सनातन धर्म, आर्य समाज और महिला संगठनों ने मिलकर एक विशाल राहत नेटवर्क खड़ा किया।\n• संकट में निस्वार्थ नेतृत्व: डॉ. एनसी जोशी, डॉ. सुशीला नैयर और डॉ. के.जे. मैक्डरमेट जैसे डॉक्टरों ने अपनी जान जोखिम में डालकर लगातार 18-18 घंटे सेवा की।\n• स्थायी सामाजिक विरासत: तत्कालीन स्वयंसेवी प्रयासों ने बाद में माता सुंदरी कॉलेज और हरकिशन पब्लिक स्कूल जैसे दूरगामी शैक्षणिक संस्थानों को जन्म दिया।",
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  "category": "कल्चर",
  "publishedAt": "2026-08-13",
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    "विभाजन 1947",
    "दिल्ली का इतिहास",
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