छत्तीसगढ़ में क्यों खास है गेड़ी की परंपरा? जानिए इसका इतिहास और महत्व छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में पारंपरिक गेड़ी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसका उद्देश्य सावन के महीने में खेली जाने वाली इस लोक संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है। बिलासपुर में हाल ही में पारंपरिक गेड़ी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य छत्तीसगढ़ की प्राचीन लोक संस्कृति और विरासत को जीवंत रखना है। छत्तीसगढ़ क्रांति सेवा की तरफ से पंडित लाल बहादुर शास्त्री स्कूल मैदान में इस विशेष आयोजन को संपन्न किया गया, जहां भारी संख्या में लोगों ने उत्साहपूर्वक अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। सावन के महीने की हरियाली, खेतों में भरा पानी और रास्तों के कीचड़ के बीच कभी गेड़ी की टक-टक की आवाज गांवों की पहचान हुआ करती थी। आधुनिकता के दौर में भले ही जीवनशैली बदली है और यह परंपरा सिमटती गई है, लेकिन इस तरह के आयोजनों से इसे नई पहचान मिल रही है। प्रतियोगिता में शामिल लोगों ने गेड़ी पर अपनी रफ्तार और संतुलन का शानदार प्रदर्शन किया, जिससे यह साफ हो गया कि यह सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि ग्रामीण जीवन और प्रकृति के तालमेल की एक अनूठी दास्तान है। गेड़ी बनाने की विधि और उसकी बनावट पारंपरिक तौर पर गेड़ी बांस की मदद से तैयार की जाने वाली एक लंबी और ऊंची काठ या सवारी जैसी होती है। इसे बनाने के लिए दो मजबूत और लंबे बांसों का इस्तेमाल किया जाता है, जिनके निचले सिरों पर पैर टिकाने के लिए ठोस आधार बनाया जाता है। दोनों बांसों पर एक समान ऊंचाई पर पायदान सेट किए जाते हैं, ताकि इंसान उस पर आसानी से खड़े हो सके। व्यक्ति अपने दोनों पैरों को इन पायदानों पर टिकाकर और हाथों से बांसों को मजबूती से पकड़कर संतुलन बनाते हुए आगे बढ़ता है। नियमित अभ्यास के बाद इस पर तेज चाल से चलना और दौड़ लगाना भी पूरी तरह संभव हो जाता है, जिसे ग्रामीण इलाकों के लोग सदियों से सीखते आए हैं। बारिश और कीचड़ से बचाव का पुराना जरिया इतिहास के पन्नों को पलटा जाए तो पता चलता है कि गेड़ी केवल मनोरंजन का साधन नहीं हुआ करती थी, बल्कि यह ग्रामीण जीवन की एक बड़ी व्यावहारिक जरूरत थी। सावन के दिनों में भारी वर्षा के कारण जब खेत-खलिहान, रास्ते और नरवा-नाले पानी से लबालब भर जाते थे और हर तरफ कीचड़ फैल जाता था, तब लोग जमीन से काफी ऊंचाई पर चलने के लिए इसका सहारा लेते थे ताकि उनके पैर सीधे पानी या कीचड़ में न जाएं। इसके अलावा, मानसून के मौसम में घास-फुस और पानी वाले स्थानों पर सांप, बिच्छू जैसे तमाम जहरीले जीव-जंतु बाहर निकलते थे। ऐसी खतरनाक परिस्थितियों से बचने के लिए भी गेड़ी बेहद मददगार साबित होती थी, क्योंकि यह जमीन से ऊपर सुरक्षित सफर का रास्ता देती थी। इतना ही नहीं, जलभराव वाले खेतों को पार करते वक्त इसकी ऊंचाई से पानी की गहराई का सटीक अंदाजा लगाना भी आसान हो जाता था। सावन के उत्सव और संस्कृति का अनूठा मेल छत्तीसगढ़ में सावन का महीना सिर्फ बारिश और हरियाली का पर्याय नहीं है, बल्कि यह अनगिनत लोक-परंपराओं और उत्सवों का भी समय माना जाता है। इसी ऋतु में गांवों की गलियों और मैदानों में गेड़ी पर चढ़ने का दौर विशेष रूप से शुरू होता था। बच्चे और युवा आपस में गेड़ी बनाने, उस पर संतुलन साधने और तेजी से दौड़ने की प्रतियोगिताएं करते थे, जो देखते ही देखते एक बड़े सामूहिक उत्सव का रूप ले लेती थीं। हालांकि आधुनिक संसाधनों और दौड़भाग भरी जीवनशैली ने गांवों की इस पारंपरिक तस्वीर को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया है, लेकिन सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से इसे फिर से पुनर्जीवित करने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं। नई पीढ़ी तक विरासत पहुंचाने की मुहिम इस पूरी परंपरा के महत्व पर बात करते हुए छत्तीसगढ़ क्रांति सेवा की महिला प्रदेश अध्यक्ष लता राठौर ने बताया कि छत्तीसगढ़ में गेड़ी चलाने की अपनी एक अलग और अनूठी संस्कृति रही है। सावन के आते ही हर तरफ हरियाली छा जाती है और रास्तों से लेकर खेतों तक पानी व कीचड़ का साम्राज्य हो जाता है, ऐसे समय में बांस की गेड़ी ही लोगों का मुख्य सहारा हुआ करती थी। वहीं इस बारे में ठाकुर शैलू छत्तीसगढ़िया ने भी अपनी बात रखते हुए कहा कि आज हमारी कई सांस्कृतिक धरोहरें तेजी से विलुप्त हो रही हैं, जिन्हें बचाने के लिए गेड़ी प्रतियोगिताओं जैसे आयोजनों का होना बेहद जरूरी है। जब समाज खुद आगे आकर अपनी प्राचीन परंपराओं को सहेजेगा, तभी यह अमूल्य विरासत आने वाली पीढ़ी तक सुरक्षित पहुंच पाएगी। प्रकृति के साथ जुड़ाव का प्रतीक बिलासपुर के पंडित लाल बहादुर शास्त्री स्कूल मैदान में हुई इस गेड़ी प्रतियोगिता ने शहरवासियों और युवाओं को छत्तीसगढ़ की उस मूल परंपरा से दोबारा रूबरू कराया, जिसके बारे में आज की नई पीढ़ी सिर्फ पुरानी तस्वीरों या किस्से-कहानियों में ही जानती है। मैदान पर प्रतिभागियों का जोश और उनका संतुलन देखते ही बनता था। इस आयोजन का सीधा संदेश यही था कि संस्कृति केवल किताबों में बंद इतिहास का पन्ना नहीं है, बल्कि इसे जीना और अगली पीढ़ी को सौंपना हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी है। गेड़ी की यह प्राचीन परंपरा छत्तीसगढ़ के लोकजीवन की एक ऐसी जीवंत पहचान है, जिसमें सावन का सौंदर्य, ग्रामीण जरूरतें, प्रकृति के साथ समन्वय और उत्सव का उल्लास एक साथ नजर आता है। इसका आप पर असर भारत में: यह खबर देश की पारंपरिक लोक संस्कृति और विलुप्त होती क्षेत्रीय खेल परंपराओं को सहेजने के महत्व को रेखांकित करती है। बिलासपुर में: स्थानीय निवासियों और युवाओं को अपनी संस्कृति से जुड़ने और गेड़ी जैसी प्राचीन ग्रामीण विधाओं को देखने व सीखने का अवसर मिला है। सवाल-जवाब 1. छत्तीसगढ़ में गेड़ी क्या है? गेड़ी पारंपरिक रूप से बांस से बनाई जाने वाली एक ऊंची सवारी है, जिस पर खड़े होकर संतुलन बनाते हुए चला जाता है। 2. बिलासपुर में गेड़ी प्रतियोगिता का आयोजन किसने किया? बिलासपुर के पंडित लाल बहादुर शास्त्री स्कूल मैदान में इस प्रतियोगिता का आयोजन छत्तीसगढ़ क्रांति सेवा द्वारा किया गया। 3. पुराने समय में बारिश के दौरान गेड़ी किस प्रकार काम आती थी? बारिश में कीचड़, पानी और जहरीले जीवों से बचने के साथ-साथ पानी की गहराई का अंदाजा लगाने के लिए पुराने समय में लोग गेड़ी का उपयोग करते थे। 4. इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य क्या था? इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य छत्तीसगढ़ की पुरानी लोक संस्कृति को बचाना और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना है। https://trendkia.com/culture/why-gedi-riding-matters-in-chhattisgarh-history-and-traditions-of-the-monsoon-20857 TrendKia — Har trend, sabse pehle.