# ब्रिक्स सम्मेलन के लिए दिल्ली आएंगे ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, जानिए पीएम मोदी संग बैठक और चाबहार रणनीति के मायने

> ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन 12 और 13 सितंबर को 18वें ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लेने नई दिल्ली आ रहे हैं, जहां वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता, चाबहार बंदरगाह और ऊर्जा सुरक्षा पर विस्तृत चर्चा करेंगे।

**Type:** article · **Category:** दिल्ली · **Published:** 2026-08-14 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/delhi/brics-sammelana-ke-lie-delhi-aenge-iran-ke-rashtrapati-masoud-pezeshkian-janie-pm-narendra-modi-snga-baithaka-aura-chabahar-ranani-16579 · **Language:** Hindi
**Tags:** मसूद पेजेशकियन, नरेंद्र मोदी, ब्रिक्स सम्मेलन, भारत ईरान संबंध, चाबहार पोर्ट, होर्मुज जलडमरूमध्य, INSTC

वैश्विक कूटनीति के बदलते समीकरणों के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन अगले महीने भारत के महत्वपूर्ण दौरे पर नई दिल्ली पहुंच रहे हैं। अपनी इस आधिकारिक यात्रा के दौरान वे 12 और 13 सितंबर को आयोजित होने जा रहे 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शिरकत करेंगे। संयुक्त राज्य अमेरिका और तेहरान के मध्य जारी तीखे तनाव तथा पश्चिमी एशिया के मौजूदा नाजुक हालात को देखते हुए इस उच्चस्तरीय दौरे को वैश्विक राजनीति के लिहाज से बेहद दूरगामी माना जा रहा है। सम्मेलन के इतर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच एक खास द्विपक्षीय शिखर वार्ता आयोजित होने की भी पूरी संभावना जताई जा रही है। यह महत्वपूर्ण वार्ता न केवल भारत और ईरान के ऐतिहासिक संबंधों को एक नई गति और ऊंचाई प्रदान करेगी, बल्कि पश्चिमी एशिया में उपजे गंभीर संकट और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों पर दोनों देशों को एक साझा रुख बनाने का मंच भी प्रदान करेगी। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के साथ मजबूत और निरंतर कूटनीतिक संबंध भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं, जिससे भारत की वैश्विक स्थिति एक सशक्त मध्यस्थ के रूप में स्थापित होगी।

## पश्चिमी एशिया का संकट और भारत का संतुलनकारी कूटनीतिक दृष्टिकोण
इस समय पूरे पश्चिमी एशिया में अस्थिरता और युद्ध का माहौल बना हुआ है, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला और समुद्री व्यापार पर गहरा असर पड़ा है। इस चुनौतीपूर्ण समय में भारत के लिए तेहरान के साथ सीधा और सीधा कूटनीतिक संपर्क बनाए रखना अत्यंत आवश्यक हो गया है। नई दिल्ली इस बातचीत के माध्यम से खाड़ी क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और स्थिरता बहाल करने का प्रयास कर रही है। भारत एक ऐसा अनूठा कूटनीतिक संतुलन साध रहा है, जहां वह एक तरफ अमेरिका और खाड़ी के अरब देशों के साथ अपने प्रगाढ़ संबंधों को बनाए रखे हुए है, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ भी अपने रणनीतिक जुड़ाव को मजबूती से आगे बढ़ा रहा है। इस अनूठी स्थिति के कारण भारत युद्ध के इस कठिन समय में विभिन्न धड़ों के बीच एक विश्वसनीय पुल का निर्माण करने में सफल हो रहा है।

इसी बीच ब्रिक्स संगठन का दायरा लगातार बढ़ रहा है और इसमें ईरान की पूर्ण सदस्यता ने इस समूह के कूटनीतिक प्रभाव और आर्थिक वजन को काफी बढ़ा दिया है। रूस और चीन जैसी महाशक्तियों के साथ ईरान का एक ही अंतरराष्ट्रीय मंच साझा करना एक नई वैश्विक कूटनीतिक संरचना को जन्म दे रहा है। एक तरफ जहां पड़ोसी देश पाकिस्तान पश्चिमी शक्तियों के साथ अपने सुरक्षा और सैन्य संबंधों को मजबूत करने में लगा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ ईरान ब्रिक्स के भीतर अपनी स्थिति को मजबूती से स्थापित कर रहा है। इन तमाम बहुपक्षीय खींचतानों के बावजूद भारत अपनी संप्रभु रणनीतिक स्वायत्तता को पूरी तरह सुरक्षित रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने में सफल रहा है।

## होर्मुज जलडमरूमध्य, ऊर्जा सुरक्षा और चाबहार बंदरगाह की रणनीतिक भूमिका
भारत की राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से होर्मुज जलडमरूमध्य का समुद्री मार्ग अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण है। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से भी अधिक कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते के जरिए आयात करता है। इतना ही नहीं, भारत के लिए वाणिज्यिक शिपिंग रूट और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस यानी एलपीजी की आपूर्ति भी पूरी तरह से इसी अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पर निर्भर करती है। पिछले दिनों जब इस क्षेत्र में भारी सैन्य और क्षेत्रीय तनाव उत्पन्न हुआ था, तब भारत और ईरान के बीच की शांत और प्रभावी कूटनीति ही सबसे ज्यादा कारगर साबित हुई थी। इसी खामोश कूटनीतिक तालमेल का नतीजा था कि भारतीय तेल और गैस टैंकरों को एक सुरक्षित 'ग्रीन चैनल' के माध्यम से बिना किसी बाधा के निकलने का रास्ता मिला था।

ऊर्जा सुरक्षा के अलावा दक्षिण-पूर्वी ईरान में स्थित चाबहार बंदरगाह भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टि का एक गेम चेंजर प्रोजेक्ट साबित हो रहा है। भारत ने इस बंदरगाह के विकास में भारी निवेश किया है और इसे विशेष रूप से विकसित किया है। यह रणनीतिक बंदरगाह भारत को सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों से जोड़ता है। इस बंदरगाह के चालू होने से भारत को अपनी व्यापारिक गतिविधियों और पारगमन के लिए अब पाकिस्तान के भू-भाग या उसके रास्तों पर निर्भर रहने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं पड़ती है। यह बंदरगाह भारत के लिए पश्चिमी एशिया और मध्य एशिया के बाजारों में प्रवेश का एक सुरक्षित और सीधा द्वार बन चुका है।

## अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद व्यापारिक रिश्ते और INSTC का विस्तार
वाशिंगटन ने ईरान पर अत्यंत कड़े आर्थिक और वाणिज्यिक प्रतिबंध लागू कर रखे हैं, जिससे कई देश ईरान के साथ व्यापारिक संबंध रखने से बचते हैं। हालांकि, इन अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद नई दिल्ली और तेहरान के बीच आर्थिक तथा व्यापारिक संबंध लगातार प्रगाढ़ हो रहे हैं। भारत ने अपनी कुशल कूटनीति के बल पर चाबहार बंदरगाह परियोजना के संचालन के लिए अमेरिकी प्रतिबंधों से विशेष अस्थायी छूट प्राप्त करने में सफलता हासिल की थी। इस खास और महत्वपूर्ण छूट की अवधि को 26 अप्रैल 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया है, जिससे इस महत्वाकांक्षी परियोजना का काम बिना किसी रुकावट के जारी है।

चाबहार बंदरगाह अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे यानी INSTC का एक बेहद महत्वपूर्ण और केंद्रीय हिस्सा है। यह 7,200 किलोमीटर लंबा बहु-स्तरीय व्यापारिक नेटवर्क भारत को ईरान और कैस्पियन सागर के रास्ते सीधे रूस और उत्तरी यूरोप से जोड़ता है। ब्रिक्स ब्लॉक का विस्तार दोनों देशों को एक सुरक्षित, निष्पक्ष और तटस्थ वित्तीय प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा रहा है। ईरान अब ब्रिक्स के वैकल्पिक वित्तीय भुगतान तंत्र से पूरी तरह जुड़ने की दिशा में तेजी से प्रयास कर रहा है, जिससे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम होगी और आपसी व्यापार तथा निवेश के नए द्वार खुलेंगे। भारत और ईरान के बीच संयुक्त आर्थिक समिति की नियमित बैठकें भी लगातार आयोजित हो रही हैं। व्यापारिक आंकड़ों के अनुसार भारत मुख्य रूप से ईरान को चाय और चावल जैसी कृषि वस्तुओं का बड़े पैमाने पर निर्यात करता है, जबकि ईरान से भारत में ताजे और सूखे फलों का आयात किया जाता है।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** पश्चिमी एशिया में जारी तनाव के बावजूद भारत की कुशल कूटनीति से देश में कच्चे तेल और एलपीजी की आपूर्ति सुरक्षित रहेगी।

**व्यापार और उद्योग के लिए:** चाबहार बंदरगाह और INSTC कॉरिडोर के विस्तार से भारतीय निर्यातकों को मध्य एशिया और रूस तक बिना पाकिस्तान के सीधा और सुरक्षित व्यापारिक मार्ग प्राप्त होगा।

## सवाल-जवाब

### 1. ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन भारत दौरे पर कब आ रहे हैं?
वे 12 और 13 सितंबर को आयोजित होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए नई दिल्ली आ रहे हैं।

### 2. क्या इस दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मसूद पेजेशकियन की द्विपक्षीय वार्ता होगी?
हां, सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं के बीच एक विशेष द्विपक्षीय बैठक होने की प्रबल संभावना है, जिसमें चाबहार पोर्ट और वेस्ट एशिया के संकट पर चर्चा होगी।

### 3. होर्मुज जलडमरूमध्य भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल और एलपीजी आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से प्राप्त करता है, जो देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है।

### 4. चाबहार पोर्ट पर अमेरिकी प्रतिबंधों से छूट की क्या स्थिति है?
भारत को चाबहार पोर्ट परियोजना के लिए अमेरिकी प्रतिबंधों से मिली अस्थायी छूट को 26 अप्रैल 2026 तक बढ़ा दिया गया है।

### 5. भारत और ईरान के बीच मुख्य रूप से किन वस्तुओं का व्यापार होता है?
भारत ईरान को चावल और चाय का मुख्य रूप से निर्यात करता है, जबकि ईरान से ताजे और सूखे फलों का भारत में आयात किया जाता है।

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