चंद्रशेखर आजाद पर टिप्पणी मामले में अजीत भारती की अग्रिम जमानत खारिज, दिल्ली हाईकोर्ट ने माना प्रथम दृष्टया बनता है केस दिल्ली हाईकोर्ट ने नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद और अनुसूचित जाति वर्ग पर आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में यूट्यूबर अजीत भारती की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि इस मामले में प्रथम दृष्टया एससी/एसटी एक्ट लागू होता है। यूट्यूबर अजीत भारती को कानूनी मोर्चे पर बड़ा झटका लगा है, जहां दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को उनकी अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी। यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश के नगीना लोकसभा क्षेत्र से सांसद चंद्रशेखर आजाद और अनुसूचित जाति समुदाय के खिलाफ सोशल मीडिया पर कथित तौर पर अपमानजनक और जातिसूचक बयानबाजी से जुड़ा है। अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट रुख अपनाया कि आरोपी के खिलाफ शुरुआती साक्ष्यों को देखते हुए एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला साफ तौर पर बनता है, जिसके चलते उन्हें गिरफ्तारी से पूर्व राहत नहीं दी जा सकती। किन कानूनी धाराओं के दायरे में आया मामला इस पूरे प्रकरण की सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की एकल पीठ के समक्ष हुई। अदालत ने मामले के तमाम तथ्यों का अवलोकन करने के बाद स्पष्ट किया कि अजीत भारती के खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(r) और धारा 3(1)(s) के तहत अपराध बनता है। इसके साथ ही याचिकाकर्ता पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम यानी IT एक्ट और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के विभिन्न दंडात्मक प्रावधान भी लागू होते हैं। न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने कानूनी पहलुओं पर विचार करते हुए रेखांकित किया कि एससी/एसटी एक्ट के विशेष प्रावधानों के तहत ऐसे मामलों में गिरफ्तारी से पहले जमानत यानी अग्रिम जमानत देने पर वैधानिक रोक लगी हुई है। अदालत ने साफ कहा कि जहां प्राथमिक तौर पर जातिगत उत्पीड़न और सार्वजनिक अपमान का केस स्थापित होता दिखता है, वहां कानूनन अग्रिम जमानत याचिका सुनवाई योग्य नहीं रह जाती। इसी आधार पर पीठ ने यूट्यूबर की याचिका को सीधे तौर पर निरस्त करने का निर्णय सुनाया। निचली अदालत से शुरू होकर हाईकोर्ट तक पहुंची कानूनी लड़ाई विवाद की जड़ें सोशल मीडिया पर प्रसारित एक विशेष कार्यक्रम से जुड़ी हैं। इस कार्यक्रम के दौरान नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद को लेकर तीखी और आपत्तिजनक बातें कही गई थीं। बातचीत का यह वीडियो इंटरनेट के तमाम मंचों पर तेजी से वायरल हो गया, जिसके बाद भारी आक्रोश देखने को मिला और मामले में आपराधिक शिकायत दर्ज करवाई गई। हाईकोर्ट से पहले यह मामला ट्रायल कोर्ट के समक्ष पहुंचा था। पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 7 सितंबर को अजीत भारती की अग्रिम जमानत याचिका को नामंजूर कर दिया था। निचली अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी की थी कि रिकॉर्ड पर मौजूद वीडियो से यह संकेत मिलता है कि जानबूझकर अपमानित करने का प्रयास किया गया और इसमें बार-बार जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। इस झटके के बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अदालत कक्ष में वकीलों की जोरदार जिरह हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के वकीलों ने अपने-अपने मजबूत तर्क रखे। अजीत भारती के वकील ने अदालत से आग्रह किया कि उनके मुवक्किल का इरादा किसी व्यक्ति की जाति को नीचा दिखाने या उसका अपमान करने का कतई नहीं था। बचाव पक्ष ने दलील दी कि सोशल मीडिया पर उनकी बहन के खिलाफ की गई अमर्यादित टिप्पणियों के संदर्भ और प्रतिक्रिया में यह बयान दिया गया था। दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस और शिकायतकर्ता के अधिवक्ताओं ने इस जमानत अर्जी का कड़ा विरोध किया। अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि सार्वजनिक मंच पर जातिसूचक शब्दों का खुलकर इस्तेमाल किया गया है, इसलिए कानून के सख्त प्रावधान पूरी तरह से प्रभावी होते हैं और इसमें कोई ढिलाई नहीं बरती जानी चाहिए। सभी पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे सुनाते हुए याचिका खारिज कर दी गई। मामले में विस्तृत आदेश आना अभी बाकी है। इसका आप पर असर यह अदालती आदेश डिजिटल मंचों पर सार्वजनिक संवाद और जातिगत टिप्पणियों को लेकर सख्त कानूनी जवाबदेही तय करता है। • सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के लिए: इंटरनेट और सोशल प्लेटफॉर्म पर जातिगत या आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करने पर तत्काल कानूनी कार्रवाई हो सकती है। किसी व्यक्तिगत विवाद या बहस की आड़ में भी जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करने पर कोई कानूनी छूट नहीं मिलती। • कानूनी प्रक्रियाओं के संदर्भ में: एससी/एसटी एक्ट की विशेष धाराओं के तहत अग्रिम जमानत हासिल करना बेहद मुश्किल है। अदालतों का यह रुख स्पष्ट करता है कि प्रथम दृष्टया केस बनने पर गिरफ्तारी से पूर्व राहत की याचिकाएं खारिज की जा सकती हैं। • सार्वजनिक हस्तियों और प्रतिनिधियों के लिए: जनप्रतिनिधियों और विभिन्न समुदायों के प्रति सार्वजनिक अपमान के मामलों में त्वरित आपराधिक मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। शिकायतकर्ताओं के लिए अदालती स्तर पर सख्त धाराएं लागू होने से कानूनी संरक्षण मजबूत होता है। • न्यायिक निगरानी के दायरे में: ट्रायल कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक ऐसे मामलों में वीडियो फुटेज और डिजिटल साक्ष्यों को आधार बनाकर सख्त रुख अपनाया जा रहा है। जांच एजेंसियां सोशल मीडिया सामग्री को मुख्य सबूत मानकर जांच आगे बढ़ाती हैं। ऐसा क्यों हुआ यह कानूनी कार्रवाई सोशल मीडिया पर प्रसारित एक वीडियो में नगीना सांसद और अनुसूचित जाति समुदाय के प्रति कथित अपमानजनक और जातिसूचक टिप्पणियों के बाद शुरू हुई। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में विशेष कानूनों के तहत एफआईआर दर्ज की थी। • कथित आपत्तिजनक बयानबाजी: यूट्यूबर अजीत भारती ने अपने सोशल मीडिया कार्यक्रम में सांसद चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक बातें कहीं। इस कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद व्यापक विरोध और शिकायतें सामने आईं। • विशेष कानूनों का लागू होना: मामले में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के साथ-साथ आईटी एक्ट और बीएनएस की धाराएं लगाई गईं। इन कानूनों की धाराओं के तहत सार्वजनिक रूप से जातिगत अपमान को गंभीर संज्ञेय अपराध माना गया है। • अग्रिम जमानत पर वैधानिक पाबंदी: एससी/एसटी एक्ट के तहत कानून में अग्रिम जमानत दिए जाने पर स्पष्ट रोक का प्रावधान है। जब अदालत ने पाया कि प्रथम दृष्टया अपराध बनता है, तो इस वैधानिक प्रावधान के कारण जमानत याचिका खारिज कर दी गई। • ट्रायल कोर्ट का प्रारंभिक मूल्यांकन: 7 सितंबर को पटियाला हाउस कोर्ट ने वीडियो का विश्लेषण कर जानबूझकर अपमान और जातिसूचक शब्दों के बार-बार प्रयोग की बात कही थी। इसी आधार को हाईकोर्ट में भी अभियोजन द्वारा मजबूती से प्रस्तुत किया गया। सवाल-जवाब 1. दिल्ली हाईकोर्ट ने अजीत भारती को लेकर क्या आदेश दिया है? दिल्ली हाईकोर्ट ने कथित तौर पर जातिसूचक टिप्पणियों के मामले में यूट्यूबर अजीत भारती की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। 2. अजीत भारती पर किन मुख्य कानूनों के तहत मामला दर्ज है? उनके खिलाफ एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s), आईटी एक्ट और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत मामला दर्ज है। 3. अदालत ने अग्रिम जमानत अर्जी खारिज करने की क्या मुख्य वजह बताई? अदालत ने कहा कि मामले में पहली नजर में एससी/एसटी एक्ट का अपराध बनता है और इस कानून में गिरफ्तारी से पहले जमानत पर वैधानिक रोक है। 4. इससे पहले ट्रायल कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया था? पटियाला हाउस कोर्ट ने 7 सितंबर को अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा था कि वीडियो में जानबूझकर अपमान और जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल के संकेत हैं। 5. बचाव पक्ष के वकील ने अदालत में क्या दलील पेश की थी? वकील ने तर्क दिया कि यह टिप्पणी जाति के अपमान के इरादे से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर उनकी बहन को लेकर की गई टिप्पणियों के संदर्भ में दी गई थी। https://trendkia.com/delhi/chandrashekhar-azad-para-tippani-mamale-men-ajeet-bharti-ki-agrima-jamanata-kharija-delhi-high-court-ne-mana-prathama-drishtaya-ba-37768 TrendKia — Har trend, sabse pehle.