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  "title": "दिल्ली में वोटर सूची पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग से पूछा- पुराने मतदाताओं से फॉर्म 6 क्यों भरवाया जा रहा",
  "summary": "दिल्ली में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान 43 लाख नाम हटाए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने सवाल किया कि 2026 की सूची में पहले से दर्ज मतदाताओं से नए रजिस्ट्रेशन का फॉर्म क्यों भरवाया जा रहा है।",
  "content": "दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कड़े सवाल किए हैं। ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से लगभग 43 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने पर शीर्ष अदालत ने गंभीर चिंता जताई। अदालत ने पूछा कि जो नागरिक पहले से ही मतदाता सूची में शामिल हैं, उन्हें नए मतदाताओं के लिए तय किए गए फॉर्म 6 को भरने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है।\n\nपहले से दर्ज मतदाताओं से फॉर्म 6 भरवाने पर अदालत के सवाल\nसुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फॉर्म 6 केवल उन लोगों के लिए बनाया गया है जो पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वा रहे हैं। यदि 2026 की वोटर लिस्ट में पहले से मौजूद नागरिकों ने केवल अपना मकान या इलाका बदला है, तो उन्हें फॉर्म 8 भरने का विकल्प दिया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि पुराने मतदाताओं से यह घोषणा पत्र भरवाना पूरी तरह अनुचित है कि वे पहले कभी मतदाता के रूप में पंजीकृत ही नहीं थे।\n\nशीर्ष अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि काम या अन्य वजहों से एक-दो महीने के लिए घर से बाहर रहने वाले नागरिकों को स्थायी रूप से स्थानांतरित नहीं माना जाना चाहिए। थोड़े समय के लिए अस्थायी रूप से कहीं और जाने का मतलब यह कतई नहीं है कि व्यक्ति ने अपना स्थायी निवास स्थान बदल लिया है या उसका वोट देने का हक खत्म हो गया है।\n\nदिहाड़ी मजदूरों का ध्यान रखने और समय सीमा में छूट की हिदायत\nदिल्ली की जनसांख्यिकीय स्थिति का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि राजधानी में बड़ी संख्या में रेहड़ी-पटरी वाले, मजदूर और दिहाड़ी कामगार रहते हैं जिन्हें आजीविका के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची में नाम बनाए रखने की पूरी जिम्मेदारी केवल नागरिकों पर ही नहीं छोड़ी जा सकती। चुनाव आयोग को खुद आगे बढ़कर ऐसे लोगों तक पहुंचना चाहिए और उनका सत्यापन करना चाहिए।\n\nअदालत ने उन मामलों पर भी चिंता जताई जहां लोग अपने घरों में ही मौजूद थे, लेकिन उन्हें गणना फॉर्म मिला ही नहीं। ऐसे छूटे हुए लोगों की समस्या के समाधान के लिए पारदर्शी व्यवस्था बनाने के निर्देश दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या केवल समय पर फॉर्म जमा न कर पाने के कारण किसी व्यक्ति का मताधिकार हमेशा के लिए छीना जा सकता है? अदालत ने टिप्पणी की कि जब तक अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन नहीं हो जाता, तब तक सिर्फ देरी से जमा किए गए फॉर्मों को खारिज नहीं किया जाना चाहिए। चूंकि दिल्ली में तुरंत कोई चुनाव नहीं होने वाले हैं, इसलिए आयोग को समय सीमा पर अत्यधिक जिद नहीं दिखानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर इसे आगे बढ़ाना चाहिए।\n\nचुनाव आयोग का आश्वासन और दो सप्ताह की मोहलत\nसुप्रीम कोर्ट के इन रुख के बाद चुनाव आयोग की ओर से अदालत को आश्वस्त किया गया कि वह देरी से मिले फॉर्मों को स्वीकार करने पर सकारात्मक विचार करेगा। आयोग ने संकेत दिया कि आवश्यकता महसूस होने पर 30 अक्टूबर की तय समय सीमा को आगे बढ़ाया जा सकता है। अदालत ने चुनाव आयोग को पूरे मामले पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।\n\nइसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि ड्राफ्ट सूची से हटाए गए 43 लाख लोगों का ब्योरा सार्वजनिक किया जाना चाहिए। आम जनता की सुविधा के लिए सरल हिंदी और स्थानीय भाषाओं में स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि किसी व्यक्ति का नाम क्यों हटाया गया है और तय अवधि में जवाब न देने पर क्या परिणाम होंगे। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि बिहार से जुड़े पुराने न्यायिक आदेशों से SIR प्रक्रिया के सभी जटिल सवाल हल नहीं हो जाते। उन्होंने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में तार्किक गलतियों की जांच करने की संवैधानिक व कानूनी वैधता पर अभी अंतिम फैसला होना बाकी है।\n\nइसका आप पर असर\nयह फैसला दिल्ली में रहने वाले लाखों नागरिकों, खासकर प्रवासियों और किराएदारों के मताधिकार की रक्षा करने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण है।\n\n• भारत में: देश भर के मतदाताओं के लिए यह स्पष्ट हुआ है कि निवास स्थान बदलने पर केवल फॉर्म 8 भरना होता है, न कि नया रजिस्ट्रेशन करना। इससे चुनावी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ेगी और किसी भी नागरिक का मताधिकार बेवजह समाप्त नहीं होगा।\n• दिल्ली में: दिल्ली के लगभग 43 लाख नागरिक जिनके नाम ड्राफ्ट सूची से हटाए गए हैं, उन्हें अपनी आपत्ति दर्ज कराने और फॉर्म जमा करने का अतिरिक्त अवसर मिल सकता है। 30 अक्टूबर की समय सीमा बढ़ने से रेहड़ी-पटरी वालों और दिहाड़ी मजदूरों को राहत मिलेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nदिल्ली में चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के दौरान लगभग 43 लाख नाम ड्राफ्ट सूची से हटा दिए गए थे, जिससे विवाद पैदा हुआ।\n\n• प्रक्रियात्मक खामियां: चुनाव आयोग ने अनुपस्थित, स्थानांतरित या मृत पाए गए लोगों के नाम सूची से बाहर कर दिए, लेकिन कई मामलों में प्रक्रिया का पालन सही से नहीं हुआ।\n• गलत फॉर्म की मांग: पहले से पंजीकृत मतदाताओं से पहली बार वोटर बनने वाला फॉर्म 6 भरवाया जाने लगा, जिससे मतदाताओं को गलत घोषणाएं देनी पड़ रही थीं।\n• सूचना का अभाव: कई लोगों तक गणना फॉर्म पहुंचे ही नहीं और अचानक उनका नाम सूची से गायब हो गया, जिसके बाद इस प्रक्रिया को चुनौती दी गई।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से किस बारे में जवाब मांगा है?\nअदालत ने दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान पुराने मतदाताओं से फॉर्म 6 भरवाने और 43 लाख नाम हटाए जाने पर जवाब मांगा है।\n\n2. फॉर्म 6 और फॉर्म 8 में क्या अंतर है?\nफॉर्म 6 केवल पहली बार मतदाता बनने वालों के लिए होता है, जबकि फॉर्म 8 पहले से पंजीकृत उन मतदाताओं के लिए है जो अपना पता या विवरण बदलना चाहते हैं।\n\n3. क्या दिल्ली में फॉर्म जमा करने की 30 अक्टूबर की अंतिम तिथि बढ़ेगी?\nचुनाव आयोग ने कोर्ट में संकेत दिया है कि जरूरत पड़ने पर वह 30 अक्टूबर की समय सीमा को आगे बढ़ाने पर विचार करेगा।\n\n4. सुप्रीम कोर्ट ने प्रवासियों और मजदूरों के बारे में क्या टिप्पणी की?\nअदालत ने कहा कि काम के सिलसिले में एक-दो महीने बाहर रहने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति ने स्थायी रूप से निवास बदल लिया है, और आयोग को खुद उनसे संपर्क करना चाहिए।",
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  "category": "दिल्ली",
  "publishedAt": "2026-10-28",
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