# दिल्ली के पीजी और हॉस्टल्स पर मंडरा रहा बड़ा खतरा, 99 फीसदी इमारतों के पास नहीं है फायर एनओसी

> दिल्ली में हाल ही में हुए एक दर्दनाक हादसे के बाद सामने आए नगर निगम के सर्वे ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। आंकड़ों के मुताबिक राजधानी के 99 प्रतिशत पेइंग गेस्ट आवास बिना अग्नि सुरक्षा मंजूरी के चल रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** दिल्ली · **Published:** 2026-09-15 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/delhi/delhi-student-hostels-sitting-on-a-powder-keg-as-99-percent-operate-without-fire-noc-32384 · **Language:** Hindi
**Tags:** दिल्ली पीजी सर्वे, फायर एनओसी, सत्य निकेतन हादसा, एमसीडी जांच, हॉस्टल सुरक्षा, दिल्ली विश्वविद्यालय

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में छात्रों के रहने के लिए बने पेइंग गेस्ट आवासों और हॉस्टलों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बेहद डराने वाले आंकड़े सामने आए हैं। हाल ही में सत्य निकेतन इलाके में एक बॉयज हॉस्टल की बिल्डिंग भरभराकर गिर जाने से सात लोगों की जान चली गई थी। इस भीषण दुर्घटना के तुरंत बाद दिल्ली नगर निगम की तरफ से शहरभर के पीजी और हॉस्टलों की जांच के लिए एक व्यापक सर्वे कराया गया। इस सर्वे के जो नतीजे अब हाथ लगे हैं, उन्होंने प्रशासनिक अमले से लेकर अभिभावकों की नींद पूरी तरह उड़ा दी है। निगम के दस्तावेजों और जमीनी निरीक्षण के मुताबिक, दिल्ली में संचालित कुल पीजी और हॉस्टलों में से लगभग 99 फीसदी इमारतों के पास अग्निशमन विभाग यानी फायर एनओसी का प्रमाण पत्र तक नहीं है। स्थिति इतनी गंभीर है कि हर दस में से तीन इमारतों के पास तो नगर निगम से मंजूर कराया गया लेआउट प्लान या नक्शा तक मौजूद नहीं है। बिना किसी पूर्व अनुमति के लोगों ने नियमों को ताक पर रखकर एक के बाद एक कई अवैध मंजिलें तान दी हैं और इनमें हजारों छात्र रोजाना अपनी जान हथेली पर रखकर जीवन गुजार रहे हैं।

 

## हाईकोर्ट की सख्ती के बाद खुला पोल
 सत्य निकेतन में हुए हादसे के महज एक सप्ताह के भीतर सामने आए इन चौंकाने वाले आंकड़ों के पीछे उच्च न्यायालय की कड़ी फटकार और सख्त रुख मुख्य वजह रहा। अदालत ने इस मामले पर गहरी नाराजगी जताते हुए नगर निगम को लताड़ लगाई थी, जिसके बाद प्रशासन हरकत में आया। इसके परिणाम स्वरूप नगर निगम ने शहर के सभी बारह जोनों में अवैध निर्माणों के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान शुरू करने के साथ-साथ इन छात्र आवासों की सघन जांच शुरू की। इस पूरी जांच प्रक्रिया के दौरान इमारतों की संरचनात्मक मजबूती यानी स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी, ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट और मास्टर प्लान के नियमों का पालन हो रहा है या नहीं, इन सभी बिंदुओं को प्रमुखता से परखा गया। जांच के जो नतीजे सामने आए, वे इस बात की गवाही देते हैं कि किस तरह राजधानी में खुलेआम छात्रों की जिंदगियों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।

 

## बिना नक्शे और तंग गलियों में खड़े विशालकाय ढांचे
 सर्वे के दौरान जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक, केवल 726 पीजी इमारतों के पास ही वैध रूप से स्वीकृत बिल्डिंग प्लान पाया गया है, जो कुल का तीस प्रतिशत से भी कम हिस्सा है। वहीं दूसरी तरफ, यदि बात करें स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट की तो पूरे शहर में केवल आठ इमारतें ऐसी मिलीं जिनके पास यह प्रमाणपत्र मौजूद था। यदि राजधानी क्षेत्र में कोई प्राकृतिक आपदा या भूकंप जैसी स्थिति आ जाती है, तो इन बेतरतीब ढंग से खड़ी की गई इमारतों में रहने वाले लोगों का बच पाना बेहद मुश्किल साबित हो सकता है। संकरी और तंग गलियों के भीतर खड़े किए गए इन विशालकाय पीजी ढांचों का निर्माण किसी भी प्रकार के सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखे बिना किया गया है, जो प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

 

## जोनवार आंकड़ों में उजागर हुई भयावह स्थिति
 दिल्ली के विभिन्न प्रशासनिक जोनों से मिले आंकड़े और भी ज्यादा चिंताजनक और डरावने हैं। सिविल लाइन्स जोन की बात करें जहां प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय का नॉर्थ कैंपस स्थित है, वहां सबसे अधिक 608 पीजी आवास दर्ज किए गए। इनमें से केवल 364 के पास ही स्वीकृत बिल्डिंग प्लान मिले, जबकि फायर एनओसी पाने वालों की संख्या महज 28 रही और रेगुलराइजेशन अप्रूवल केवल 27 के पास था। सबसे हैरानी की बात यह है कि इस पूरे जोन में एक भी इमारत के पास स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट नहीं मिला। इसी तरह केशव पुरम जोन में 410 पीजी मिले, जिनमें से सिर्फ 54 के पास स्वीकृत नक्शा, दो के पास फायर एनओसी और दो के पास ही संरचनात्मक प्रमाण पत्र था, जबकि ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट किसी के भी पास नहीं था। साउथ जोन की स्थिति तो और भी ज्यादा भयावाह है क्योंकि इस क्षेत्र में डीयू का साउथ कैंपस, आईआईटी दिल्ली और जेएनयू जैसे देश के प्रमुख संस्थान मौजूद हैं। इस इलाके में कुल 390 पीजी दर्ज किए गए, लेकिन जांच में सामने आया कि यहां किसी भी एक भी इमारत के पास न तो फायर क्लीयरेंस है, न स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट, न बिल्डिंग प्लान की मंजूरी और न ही ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट मौजूद है। मास्टर प्लान के नियमों के तहत इन जगहों पर पीजी गतिविधि चलाने की कोई अनुमति भी दर्ज नहीं पाई गई है।

 

## बुनियादी नियमों की अनदेखी और हॉस्टलों की कमी का संकट
 नियमों के प्रावधानों के अनुसार किसी भी व्यावसायिक या आवासीय इमारत के लिए नगर निगम से लेआउट प्लान मंजूर कराना अनिवार्य होता है। इसी तरह फायर एनओसी दिल्ली फायर सर्विस द्वारा जारी की जाती है, जो यह सुनिश्चित करती है कि इमारत में आग से निपटने के पूरे इंतजाम हैं या नहीं, जिसमें आपातकालीन निकासी मार्ग और अग्निशमन उपकरण शामिल होते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि इन सारे नियमों को पूरी तरह दरकिनार करके राजधानी में पीजी कारोबार का जाल फैला हुआ है। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि देश के कोने-कोने से लाखों छात्र उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली आते हैं, लेकिन डीयू, जेएनयू या अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों के पास अपने खुद के छात्रों को समायोजित करने के लिए पर्याप्त हॉस्टल ही उपलब्ध नहीं हैं। यूनिवर्सिटी परिसरों में आवास की भारी कमी के चलते ही शहर के रिहायशी इलाकों में खरपतवार की तरह ये अवैध पीजी उग आए हैं, जहां बिना किसी अग्नि सुरक्षा और प्रशासनिक अनुमति के यह पूरा तंत्र धड़ल्ले से चलाया जा रहा है।

## इसका आप पर असर
दिल्ली के पीजी और हॉस्टलों में सुरक्षा नियमों की अनदेखी का सीधा असर वहां रहने वाले लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों पर पड़ रहा है।

    - **दिल्ली में:** माता-पिता को अपने बच्चों के रहने के लिए चुने गए पीजी और हॉस्टलों की अग्नि सुरक्षा और बिल्डिंग प्लान की वैधता की व्यक्तिगत रूप से जांच करनी चाहिए।

    - **छात्रों के लिए:** बिना फायर एनओसी और आपातकालीन निकास वाले कमरों में रहना जानलेवा साबित हो सकता है, इसलिए सुरक्षित आवास चुनना प्राथमिकता होनी चाहिए।

    - **मकान मालिकों के लिए:** नगर निगम के सख्त सर्वे और संभावित सीलिंग कार्रवाई के चलते बिना वैध दस्तावेजों के पीजी चलाने वालों पर कानूनी शिकंजा कस सकता है।

    - **प्रशासन स्तर पर:** हाई कोर्ट के निर्देश के बाद अब एमसीडी सभी जोनों में अवैध रूप से चल रहे हॉस्टलों और पीजी पर सख्त कार्रवाई और सीलिंग अभियान तेज करेगी।

    - **किराएदारों पर:** अचानक हो रही जांच और कार्रवाई के कारण छात्रों को अचानक कमरा खाली करने या किराए में बदलाव का सामना करना पड़ सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
राजधानी के पीजी और हॉस्टलों में सुरक्षा मानकों की इस घोर अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही के पीछे कई व्यावहारिक और प्रणालीगत कारण जिम्मेदार हैं।

    - **हाईकोर्ट का हस्तक्षेप:** सत्य निकेतन में सात लोगों की जान लेने वाले हादसे के बाद उच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए नगर निगम को शहरभर में औचक जांच करने का निर्देश दिया।

    - **विश्वविद्यालयों में हॉस्टल की कमी:** दिल्ली यूनिवर्सिटी, जेएनयू और आईआईटी जैसे बड़े संस्थानों के पास अपने परिसरों में सभी छात्रों को आवास देने के लिए पर्याप्त हॉस्टल की भारी कमी है।

    - **आवास की उच्च मांग:** देश भर से हर साल लाखों छात्र उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली आते हैं, जिससे निजी आवासीय क्षेत्रों में अवैध और अनियोजित पीजी का व्यवसाय तेजी से फला-फूलता है।

    - **नियामक निगरानी की ढिलाई:** वर्षों तक स्थानीय प्रशासन और अग्निशमन विभाग द्वारा नियमित निरीक्षण न किए जाने के कारण भवन मालिकों ने बिना नक्शा पास कराए बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर लीं।

## सवाल-जवाब

### 1. दिल्ली के पीजी और हॉस्टलों पर यह सर्वे क्यों किया गया?
सत्य निकेतन इलाके में एक बॉयज हॉस्टल की बिल्डिंग गिरने से सात लोगों की मौत के बाद दिल्ली हाईकोर्ट के कड़े निर्देशों पर यह सर्वे किया गया।

### 2. सर्वे में कितने प्रतिशत पीजी के पास फायर एनओसी नहीं मिली?
नगर निगम के सर्वे के अनुसार, जांच में शामिल लगभग 99 प्रतिशत पीजी इमारतों के पास अग्निशमन विभाग की एनओसी नहीं थी।

### 3. कितने प्रतिशत पीजी के पास मंजूर बिल्डिंग प्लान मौजूद था?
सर्वे में शामिल कुल पीजी इमारतों में से केवल 30 प्रतिशत से भी कम यानी 726 इमारतों के पास ही वैध रूप से स्वीकृत बिल्डिंग प्लान पाया गया।

### 4. स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट की क्या स्थिति पाई गई?
पूरी दिल्ली के सर्वे में केवल आठ इमारतें ऐसी मिलीं जिनके पास अपनी संरचनात्मक मजबूती का वैध प्रमाणपत्र मौजूद था।

### 5. किस जोन में सबसे अधिक पीजी आवास दर्ज किए गए?
सिविल लाइन्स जोन में सबसे अधिक 608 पीजी आवास दर्ज किए गए, जहाँ दिल्ली यूनिवर्सिटी का नॉर्थ कैंपस स्थित है।

### 6. साउथ जोन के पीजी हॉस्टलों की जांच में क्या सामने आया?
साउथ जोन में दर्ज सभी 390 पीजी में से किसी भी इमारत के पास फायर क्लीयरेंस, स्ट्रक्चरल सर्टिफिकेट या बिल्डिंग प्लान की मंजूरी नहीं थी।

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