ढाका में घरेलू संकटों के बीच पड़ोसी देश को निशाना बनाने की सियासत क्यों गरमाई बांग्लादेश में बढ़ती महंगाई, ऊर्जा किल्लत और वेतन विवाद के बीच सड़कों पर उग्र प्रदर्शन हो रहे हैं, लेकिन राजनीतिक गुट इन आंदोलनों का रुख नई दिल्ली के विरोध की तरफ मोड़ रहे हैं। बांग्लादेश की राजधानी ढाका सहित कई इलाकों में इन दिनों तेज विरोध प्रदर्शनों का दौर जारी है। रोजमर्रा की जिंदगी में बढ़ती महंगाई, बिजली का गंभीर संकट, ईंधन और गैस की कमी ने आम नागरिकों की परेशानियां बढ़ा दी हैं। इसी माहौल में देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले गारमेंट सेक्टर के कामगार भी अपनी न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। इन आंदोलनों के दौरान मुख्य सड़कों पर जाम लगाया जा रहा है और गाड़ियों में तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आ रही हैं। इन तमाम घरेलू और प्रशासनिक नाकामियों के बीच सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि जनता का गुस्सा संभालने के बजाय कई राजनीतिक समूह इन विरोध प्रदर्शनों का रुख पड़ोसी देश के खिलाफ मोड़ रहे हैं। बीती 30 अक्टूबर को ढाका में नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) द्वारा आयोजित की गई एक बड़ी रैली के दौरान 'दिल्ली ना ढाका? ढाका, ढाका' जैसे उत्तेजक नारे लगाए गए। यह स्थिति गंभीर सवाल खड़े करती है कि जब प्रदर्शन आंतरिक आर्थिक तंगी और प्रशासनिक संकटों को लेकर हैं, तो फिर पड़ोसी मुल्क को बार-बार निशाना क्यों बनाया जाता है। इस पूरे सियासी खेल के पीछे कई गहरे भू-राजनीतिक, ऐतिहासिक और रणनीतिक कारण छिपे हैं, जिनका इस्तेमाल कुछ राजनीतिक ताकतें जनता के गुस्से को भड़काने के लिए कर रही हैं। पूर्व प्रधानमंत्री की शरण को लेकर सुलगता विवाद बांग्लादेश में जब भी बड़े पैमाने पर जनआंदोलन शुरू होते हैं, तो उसमें अक्सर पड़ोसी देश के खिलाफ बयानबाजी तेज हो जाती है। इस तनाव की एक प्रमुख वजह पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का भारत में रहना है। जब देश में लाखों की संख्या में प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे थे, तब शेख हसीना की सरकार गिर गई थी और उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए भारत का रुख करना पड़ा था। उस समय उनके लिए मुल्क में रहना बिल्कुल सुरक्षित नहीं था, जिसके चलते उन्हें वहां शरण दी गई। इस कदम के बाद से बांग्लादेश के कुछ राजनीतिक दल और छात्र संगठनों ने लगातार अपनी नाराजगी जाहिर की है। वे इस बात को लेकर आलोचना करते रहे हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री को संरक्षण देकर उनके घरेलू मामलों में दखल दिया गया है। फिलहाल दिसंबर 2026 में शेख हसीना की संभावित वापसी को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं। हाल ही में शेख हसीना ने यह बयान दिया था कि 'मुझे मार दो या गिरफ्तार कर लो, दिसंबर में बांग्लादेश लौटूंगी।' इस बयान और वापसी की सुगबुगाहट के बीच आंदोलनकारी संगठन इस मुद्दे को फिर से उछालकर विरोधी भावनाओं को भड़का रहे हैं। गंगा जल समझौते की मियाद और हिस्सेदारी की नई मांगें नदी जल बंटवारा दोनों मुल्कों के बीच दशकों से एक संवेदनशील मसला रहा है। साल 1996 में दोनों पक्षों के बीच 30 साल की अवधि के लिए ऐतिहासिक गंगा जल समझौता हुआ था। अब इस संधि की निर्धारित मियाद पूरी होने के करीब पहुंच चुकी है, क्योंकि यह समझौता 12 दिसंबर 2026 को आधिकारिक रूप से समाप्त हो रहा है। ऐसे में विरोध प्रदर्शनों के दौरान इस समझौते को लेकर भी आवाजें बुलंद की जा रही हैं। सड़कों पर विरोध जताने वाले गुट मांग कर रहे हैं कि गंगा के पानी में उनके देश को पहले के मुकाबले ज्यादा हिस्सेदारी दी जानी चाहिए। नेशनल सिटिजन पार्टी के नेता इस मुद्दे को एक व्यापक राजनीतिक आंदोलन की शक्ल देने की कोशिश में जुटे हैं। पार्टी के संयोजक नाहिद इस्लाम ने खुली चेतावनी दी है कि यदि देश को उसकी मांग के मुताबिक पानी नहीं मिला, तो वे फिर से फरक्का मार्च निकाल सकते हैं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि यदि पानी के सवाल पर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो पड़ोसी मुल्क को मिलने वाली ट्रांजिट सुविधाओं पर भी सवाल खड़े किए जाएंगे। मातरबाड़ी डीप सी पोर्ट और जापान कनेक्टिविटी परियोजना पर सवाल क्षेत्रीय संपर्क और बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़ी परियोजनाएं भी इस समय विवादों के केंद्र में ला दी गई हैं। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने 26 अक्टूबर को जापान की आधिकारिक यात्रा की थी। इस दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच औद्योगिक विकास और परिवहन नेटवर्क को मजबूत करने की योजनाओं पर गहन चर्चा हुई थी। इस पूरी योजना में कॉक्स बाजार स्थित मातरबाड़ी डीप सी पोर्ट की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जापान की एक प्रस्तावित परियोजना यह है कि वह बांग्लादेश के रास्ते भारत के सात पूर्वोत्तर राज्यों को बंगाल की खाड़ी के समुद्री मार्ग से जोड़े। इस योजना का मकसद पूर्वोत्तर राज्यों तक व्यापारिक पहुंच को आसान और तेज बनाना है। हालांकि बांग्लादेश के कुछ विपक्षी नेता इस पूरी परियोजना का कड़ा विरोध कर रहे हैं। इन नेताओं ने अपनी ही सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए यह आरोप मढ़ा है कि कनेक्टिविटी के बहाने पड़ोसी देश को बांग्लादेश के भूभाग से विशेष व्यापारिक सहूलियतें देने की कोशिश की जा रही है। आर्थिक नाकामी छिपाने और दखलंदाजी के आरोप मढ़ने की रणनीति राजनीतिक रूप से खुद को मजबूत बनाए रखने के लिए विपक्षी दल समय-समय पर यह दावा करते रहते हैं कि उनके आंतरिक फैसलों में विदेशी प्रभाव काम कर रहा है। दरअसल बांग्लादेश इस वक्त गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। देश की अर्थव्यवस्था को गति देने वाला रेडीमेड गारमेंट उद्योग गंभीर संकट में फंसा हुआ है। कामगार अपनी न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं, क्योंकि 2023 के बाद से उनके वेतन ढांचे में कोई संशोधन नहीं हुआ है। लगातार बढ़ती महंगाई और सुस्त पड़ती आर्थिक गतिविधियों के कारण कर्मचारियों का गुस्सा चरम पर पहुंच चुका है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि 3 नवंबर तक कम से कम 690 गारमेंट फैक्ट्रियों में कामकाज पूरी तरह ठप होने की बात सामने आई है। इस भारी संकट से सरकार पर दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है। इस आंतरिक असंतोष का सामना करने के बजाय कुछ नेता घरेलू परेशानियों को विदेशी साजिश और कथित हस्तक्षेप से जोड़कर पेश कर रहे हैं, जिससे जनता का ध्यान मूल समस्याओं से भटक जाए। विपक्षी राजनीति के लिए पुराना और मुफीद औजार साल 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद बांग्लादेश के राजनीतिक परिदृश्य में आमूलचूल बदलाव देखने को मिला था। उस समय छात्र आंदोलन की अगुवाई करने वाले कई चेहरे बाद में संगठित होकर नेशनल सिटिजन पार्टी के रूप में सामने आए। इसके बाद फरवरी 2026 में हुए आम चुनावों के नतीजे आने पर बीएनपी के तारिक रहमान प्रधानमंत्री बने। इसके बावजूद नेशनल सिटिजन पार्टी और जमात-ए-इस्लामी जैसे विपक्षी दल विदेश नीति और द्विपक्षीय संबंधों को लेकर सरकार पर लगातार दबाव बना रहे हैं। एनसीपी के नेता नाहिद इस्लाम अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए इन विरोध प्रदर्शनों का सहारा ले रहे हैं। वे केवल कथित हस्तक्षेप के आरोप तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने असम और पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यकों के कथित उत्पीड़न के साथ-साथ सीमा सुरक्षा बलों से जुड़ी घटनाओं को भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाया। हालांकि इन आरोपों को साबित करने के लिए उनकी तरफ से कोई ठोस सबूत कभी पेश नहीं किए गए, फिर भी राजनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए ऐसे संवेदनशील बयानों का इस्तेमाल किया जा रहा है। द्विपक्षीय रिश्तों पर नकारात्मक असर की गंभीर चिंताएं भले ही आंतरिक राजनीति के तहत इन नारों और बयानों का इस्तेमाल सियासी फायदे के लिए किया जा रहा हो, लेकिन इसका सीधा असर दोनों देशों के दीर्घकालिक संबंधों पर पड़ रहा है। दोनों पड़ोसी मुल्क व्यापार, सीमा सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति, जल प्रबंधन और क्षेत्रीय संपर्क जैसे कई महत्वपूर्ण स्तंभों पर एक-दूसरे के साथ गहराई से जुड़े हुए हैं। इस तरह के विरोध प्रदर्शन और अविश्वास का माहौल दोनों मुल्कों के बीच सहयोग की संभावनाओं को कमजोर करता है। जब आंतरिक असंतोष और बुनियादी प्रशासनिक विफलताओं को हल करने के बजाय द्विपक्षीय साझेदारी को बलि का बकरा बनाया जाता है, तो इससे क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक प्रगति दोनों के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा हो जाती हैं। इसका आप पर असर बांग्लादेश में जारी राजनीतिक तनाव और विरोध प्रदर्शनों से सीमावर्ती क्षेत्रों, द्विपक्षीय व्यापार और क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। • व्यापार और आपूर्ति पर: दोनों देशों के बीच सड़क और रेल मार्ग से होने वाले माल ढुलाई नेटवर्क में रुकावट आ सकती है। इसके चलते भारतीय निर्यातकों और स्थानीय आयातकों को बंदरगाहों व सीमाओं पर अतिरिक्त ढुलाई खर्च उठाना पड़ सकता है। • पूर्वोत्तर राज्यों के लिए: जापान की मदद से पूर्वोत्तर राज्यों को बंगाल की खाड़ी से जोड़ने वाले पारगमन कॉरिडोर में राजनीतिक अड़चनें आ सकती हैं। इससे असम, त्रिपुरा और मेघालय जैसे राज्यों के लिए समुद्री व्यापारिक पहुंच का काम धीमा हो सकता है। • सीमा सुरक्षा प्रबंधन: उग्र राजनीतिक माहौल के कारण सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा एजेंसियों को अतिरिक्त निगरानी रखनी होगी। सीमा पार आवाजाही और वीजा प्रक्रियाओं में सख्ती बढ़ने से आम यात्रियों और कामगारों को जांच के लंबे दौर से गुजरना पड़ सकता है। • वस्त्र उद्योग पर प्रभाव: बांग्लादेश में गारमेंट फैक्ट्रियों के बंद होने से अंतरराष्ट्रीय परिधान आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होगी। इससे वैश्विक खरीदार अपनी खरीद के लिए भारतीय कपड़ा निर्माताओं का रुख कर सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ बांग्लादेश में जारी हिंसक विरोध प्रदर्शनों का मुख्य कारण देश की आंतरिक आर्थिक विफलताएं हैं, जिन्हें राजनीतिक लाभ के लिए पड़ोसी देश विरोधी विमर्श में बदला जा रहा है। बुनियादी जरूरतों की किल्लत और वेतन विवाद ने जनता में भारी रोष पैदा किया है। • आर्थिक व ऊर्जा संकट: देश में बढ़ती महंगाई, गैस-ईंधन की किल्लत और बिजली कटौती ने आम नागरिकों के जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। इसके साथ ही 2023 से गारमेंट कामगारों का न्यूनतम वेतन न बढ़ने के कारण सैकड़ों फैक्ट्रियों में हड़ताल शुरू हो गई। • हसीना की शरण और राजनीतिक बदलाव: वर्ष 2024 में सरकार गिरने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री का भारत में शरण लेना विपक्षी गुटों के लिए एक संवेदनशील मुद्दा बन गया। उनकी दिसंबर 2026 में संभावित वापसी की चर्चाओं ने इस अविश्वास को और हवा दी है। • जल समझौते की समयसीमा: वर्ष 1996 में हुआ 30 वर्षीय गंगा जल समझौता 12 दिसंबर 2026 को समाप्त हो रहा है। स्थानीय राजनीतिक दल पानी में अधिक हिस्सेदारी की मांग को चुनावी हथियार बनाकर जनता की भावनाएं भड़का रहे हैं। • क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं पर विरोध: जापान द्वारा समर्थित मातरबाड़ी पोर्ट से भारतीय पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़ने वाली व्यापारिक कनेक्टिविटी को कुछ विपक्षी दल विशेष रियायत बताकर सरकार के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं। सवाल-जवाब 1. ढाका में प्रदर्शनकारी सड़कों पर क्यों उतरे हैं? लोग महंगाई, बिजली संकट, ईंधन और गैस की भारी कमी तथा गारमेंट उद्योग में वेतन वृद्धि की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। 2. प्रदर्शनों के दौरान भारत विरोधी नारेबाजी क्यों की जा रही है? कुछ राजनीतिक दल और संगठन आंतरिक आर्थिक असंतोष का रुख भटकाने और शेख हसीना के भारत में रहने के मुद्दे को भुनाने के लिए ऐसा कर रहे हैं। 3. गंगा जल समझौता कब समाप्त हो रहा है? भारत और बांग्लादेश के बीच 1996 में हुआ 30 साल का गंगा जल समझौता 12 दिसंबर 2026 को समाप्त होने वाला है। 4. मातरबाड़ी पोर्ट प्रोजेक्ट को लेकर क्या विवाद है? जापान की योजना इस बंदरगाह के जरिए भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को बंगाल की खाड़ी से जोड़ने की है, जिसका बांग्लादेश के विपक्षी नेता विरोध कर रहे हैं। 5. गारमेंट सेक्टर में हड़ताल का क्या असर पड़ा है? वेतन संशोधन न होने के विरोध में 3 नवंबर तक कम से कम 690 गारमेंट फैक्ट्रियों में उत्पादन बंद हो चुका है। 6. बांग्लादेश में वर्तमान प्रधानमंत्री कौन हैं? फरवरी 2026 के चुनावों के बाद बीएनपी के नेता तारिक रहमान बांग्लादेश के प्रधानमंत्री बने हैं। https://trendkia.com/delhi/dhaka-men-gharelu-snkaton-ke-bicha-new-delhi-ko-nishana-banane-ki-siyasata-kyon-garamai-55651 TrendKia — Har trend, sabse pehle.