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  "type": "article",
  "title": "गैंगरेप के मामले में महिला भी बन सकती है नामजद आरोपी, साझा मंशा साबित होने पर चलेगी अदालती कार्रवाई",
  "summary": "साझा मंशा के तहत किसी पीड़िता के साथ यौन उत्पीड़न कराने में भूमिका निभाने पर महिला को भी गैंगरेप का आरोपी बनाया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून में उल्लिखित व्यक्तियों के समूह में सिर्फ पुरुष होना अनिवार्य नहीं है।",
  "content": "सामूहिक दुष्कर्म जैसे संगीन अपराध में किसी महिला की संलिप्तता और उसकी कानूनी जवाबदेही को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण न्यायिक व्यवस्था सामने आई है। यदि कोई महिला किसी अन्य व्यक्ति के साथ मिलकर किसी पीड़िता के साथ यौन अपराध को अंजाम दिलवाने की साझा मंशा रखती है, तो उसके विरुद्ध भी गैंगरेप के प्रावधानों के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। इसके लिए यह बिल्कुल अनिवार्य नहीं है कि उसने स्वयं पीड़िता पर कोई शारीरिक या यौन हमला किया हो। कानूनी भाषा में प्रयुक्त किए गए व्यक्तियों के समूह शब्द को केवल पुरुषों तक सीमित नहीं माना जा सकता। हालांकि न्यायिक व्यवस्था में यह भी साफ किया गया है कि कोई भी महिला अकेले दम पर अकेले गैंगरेप के आरोप का सामना नहीं कर सकती, क्योंकि कानून में मौजूदा परिभाषा के तहत ऐसी स्थिति सीधे तौर पर लागू नहीं होती।\n\nसाझा मंशा और कानून में व्यक्तियों के समूह की व्याख्या\nइस कानूनी व्याख्या का आधार वैधानिक प्रावधानों के मूल उद्देश्यों में छिपा है। भारतीय दंड संहिता की धारा 376D तथा भारतीय न्याय संहिता की धारा 70 के तहत गैंगरेप को एक स्वतंत्र और अलग अपराध माना गया है। अदालत के समक्ष यह तर्क रखा गया था कि रेप की मूल वैधानिक परिभाषा पुरुष से जुड़ी हुई है, जिसके चलते किसी महिला को सामूहिक दुष्कर्म का आरोपी नहीं ठहराया जा सकता। इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया गया कि जब अपराध एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा साझा मंशा को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है, तो कानून में प्रयुक्त शब्दावली को सीमित दायरे में बांधना तर्कसंगत नहीं है।\n\nअदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि वैधानिक प्रावधानों में एक समूह बनाने वाले एक या अधिक व्यक्ति जैसे शब्दों को महज पुरुषों तक सीमित करने का कोई वैध आधार नहीं बनता। सामूहिक दुष्कर्म के मामले में किसी व्यक्ति की आपराधिक जवाबदेही केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उसने खुद पीड़िता के शरीर पर हमला बोला या नहीं। यदि किसी व्यक्ति की उपस्थिति, सहमति या सक्रिय आचरण उस साझा मंशा को आगे बढ़ाने के लिए था जिसके तहत पीड़िता के साथ दरिंदगी हुई, तो उस पर संबंधित धाराओं के अंतर्गत अभियोग चलाया जा सकता है।\n\nएकल आरोपी के रूप में महिला पर क्यों नहीं लग सकती यह धारा?\nअदालत ने इस न्यायिक फैसले के दायरे और उसकी सीमाओं को भी पूरी तरह स्पष्ट किया है। इस बात पर कोई राय व्यक्त नहीं की गई कि मौजूदा परिभाषा के तहत क्या कोई महिला अकेले स्वयं रेप का कृत्य कर सकती है या नहीं। अदालत के विचाराधीन केवल यही मुख्य प्रश्न था कि क्या किसी समूह का हिस्सा बनने या साझा मंशा के तहत किसी महिला पर गैंगरेप का आरोप तय किया जा सकता है।\n\nफैसले के अनुसार, किसी भी महिला को एकल रूप से गैंगरेप की आरोपी नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि प्रथम दृष्टया ऐसा आरोप मौजूदा कानूनी परिभाषा के अनुकूल नहीं बैठता। लेकिन यदि वह किसी अन्य व्यक्ति या समूह के साथ मिलकर किसी आपराधिक षड्यंत्र अथवा साझा मंशा को आगे बढ़ाने में सक्रिय सहयोग देती है, तो उस पर सामूहिक दुष्कर्म के गंभीर आरोप पूरी तरह कानूनी रूप से लागू होंगे।\n\nनाबालिग बेटी के यौन शोषण से जुड़ा था विवाद\nयह पूरा कानूनी मामला एक नाबालिग लड़की के साथ हुए गंभीर यौन शोषण और उसकी मां के आचरण से जुड़ा हुआ है। पीड़िता के आरोपों के अनुसार, दिसंबर 2023 से लेकर जुलाई 2024 के दौरान उसकी अपनी मां ने उसे लगातार धमकाया और भय दिखाकर एक अन्य आरोपी के साथ कई बार यौन संबंध बनाने के लिए बाध्य किया। पीड़िता ने अपने बयानों में यह गंभीर तथ्य भी उजागर किया कि जब उसके साथ यौन हमला किया जा रहा होता था, उस वक्त उसकी मां कमरे के भीतर ही मौजूद रहती थी।\n\nनिचली अदालत द्वारा आरोप तय किए जाने के आदेश को मां ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता महिला की ओर से मुख्य तर्क यह प्रस्तुत किया गया था कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 के तहत दुष्कर्म करने वाले के रूप में केवल पुरुष का उल्लेख है, इसलिए किसी महिला के खिलाफ गैंगरेप के आरोप में मुकदमा चलाने का कोई वैधानिक आधार नहीं बनता। अदालत ने गहन समीक्षा के बाद इस दलील को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया।\n\nसाल 2013 के कानूनी बदलाव और आधुनिक प्रावधान\nमामले के कानूनी इतिहास की व्याख्या करते हुए 2013 में किए गए ऐतिहासिक कानूनी संशोधनों की पृष्ठभूमि का विशेष उल्लेख किया गया। साल 2013 के संशोधन के पश्चात कानून में यौन अपराधों की परिभाषा को पहले से कहीं अधिक व्यापक बनाया गया था। उसी समय धारा 376D को जोड़ा गया था, जिसने गैंगरेप को एक बिल्कुल अलग और विशिष्ट अपराध के रूप में स्थापित किया। अब नए कानूनी ढांचे में इसी के समकक्ष प्रावधान भारतीय न्याय संहिता की धारा 70 में समाहित हैं।\n\nसंशोधित प्रावधानों का उद्देश्य उन तमाम व्यक्तियों को कानूनी शिकंजे में लेना है जो किसी साझा मंशा को आगे बढ़ाने के लिए अपराध में अपनी भूमिका निभाते हैं। कानून में ऐसी कोई बंदिश या शर्त नहीं रखी गई है कि समूह के सभी व्यक्ति केवल पुरुष ही होने चाहिए। ऐसे में किसी भी व्यक्ति का आचरण यदि साझा मंशा को पुष्ट करता है, तो वह कानून के दायरे में आता है।\n\nशारीरिक कृत्य की अनिवार्यता और वैधानिक भाषा का महत्व\nकानून की भाषा का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए न्यायालय ने वैधानिक प्रावधानों में इस्तेमाल किए गए शब्द या के महत्व को भी स्पष्ट किया। व्यवस्था के तहत, साझा मंशा के साथ काम करने वाले व्यक्ति का उन लोगों में शामिल होना बिल्कुल जरूरी नहीं है जिन्होंने खुद पीड़िता के साथ शारीरिक रूप से दुष्कर्म किया हो।\n\nप्रावधानों में स्पष्ट रूप से अपराध किया हुआ माना जाएगा जैसी शब्दावली का उपयोग किया गया है। इसका सीधा कानूनी अर्थ यह निकलता है कि सामूहिक दुष्कर्म के अपराध में समूह तैयार करने वाले अथवा साझा मंशा को आगे बढ़ाने वाले प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत रूप से शारीरिक दुष्कर्म करना आवश्यक नहीं होता। यदि अपराध को पूरा कराने में किसी की आपराधिक मंशा और सक्रिय उपस्थिति या मदद सिद्ध होती है, तो उसे भी समान रूप से दोषी और उत्तरदायी माना जाएगा।\n\nपुराने फैसलों की प्रासंगिकता और वर्तमान वैधानिक स्थिति\nयाचिकाकर्ता की ओर से अपनी दलीलों के समर्थन में देश की शीर्ष अदालत के दो पुराने निर्णयों प्रिया पटेल बनाम मध्य प्रदेश राज्य तथा राजस्थान राज्य बनाम हेमराज का संदर्भ दिया गया था। इन पुराने फैसलों के आधार पर यह दावा करने का प्रयास किया गया कि किसी महिला के खिलाफ गैंगरेप की धाराओं में मुकदमा चलाना मान्य नहीं है।\n\nन्यायालय ने इस दलील का विश्लेषण करते हुए साफ किया कि सर्वोच्च न्यायालय के वे दोनों निर्णय साल 2013 के कानूनी संशोधन से पूर्व के प्रावधानों पर आधारित थे। उस दौर में सामूहिक दुष्कर्म को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(g) के तहत दुष्कर्म का ही एक गंभीर रूप माना जाता था। इसके विपरीत, 2013 के संशोधन के जरिए धारा 376D लाई गई और गैंगरेप को एक सर्वथा पृथक अपराध बना दिया गया। अतः पुराने फैसलों को वर्तमान में लागू नए कानूनी प्रावधानों के संदर्भ में ही परखा जाना चाहिए।\n\nआरोप तय करने का आदेश बरकरार, याचिका खारिज\nइस फैसले में उच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती निर्णय सुंदरी गौतम बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार का भी संज्ञान लिया गया। उस मामले में यह स्पष्ट किया गया था कि बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण कानून यानी पॉक्सो के तहत प्रवेशात्मक यौन हमले का अपराध करने वाले व्यक्ति का लिंग कोई निर्णायक पैमाना नहीं होता।\n\nइन सभी कानूनी आधारों को ध्यान में रखते हुए निचली अदालत द्वारा 17 जनवरी 2025 को आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए जाने के आदेश को पूरी तरह से बरकरार रखा गया। आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 70(2), धारा 351(3), धारा 64(2)(m) तथा पॉक्सो कानून की धारा 6 के तहत आरोप तय किए गए थे। अदालत ने आरोपी महिला की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।\n\nइसका आप पर असर\nयह न्यायिक आदेश यौन अपराधों में शामिल सह-आरोपियों और साजिशकर्ताओं के खिलाफ कानून के सख्त क्रियान्वयन को रेखांकित करता है।\n\n• भारत में: यह निर्णय देशभर में साझा आपराधिक मंशा के तहत होने वाले यौन अपराधों के मामलों में सह-अभियुक्तों पर अभियोजन का मार्ग सुगम बनाता है। इससे महिलाओं सहित किसी भी सहयोगी को केवल लिंग के आधार पर आपराधिक दायित्व से छूट नहीं मिल सकेगी।\n• दिल्ली में: स्थानीय अदालतों और जांच एजेंसियों के लिए यह व्यवस्था लंबित मामलों में आरोप तय करने की प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट और प्रभावी बनाती है। पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए पुलिस अब मददगारों और साजिशकर्ताओं के खिलाफ बिना किसी तकनीकी रुकावट के चार्जशीट दाखिल कर सकती है।\n• कानूनी जवाबदेही: यौन अपराधों में मदद करने या पीड़िता पर दबाव बनाने वाले किसी भी व्यक्ति पर अब समान रूप से कठोर धाराएं लागू होंगी। किसी भी साथी के लिए शारीरिक कृत्य न करने का बहाना बनाकर कानूनी बच निकलना संभव नहीं रहेगा।\n• बाल संरक्षण: नाबालिगों के साथ होने वाले अपराधों में यदि अभिभावक या रिश्तेदार शोषण में मदद करते हैं तो उन पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित होगी। पॉक्सो और नए आपराधिक कानूनों के तहत ऐसे संरक्षकों के खिलाफ सख्त कानूनी प्रक्रिया तुरंत शुरू की जा सकेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह कानूनी फैसला एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका की सुनवाई के दौरान उत्पन्न हुए गंभीर वैधानिक सवालों के समाधान के रूप में सामने आया है।\n\n• सीधा कारण: एक नाबालिग लड़की की मां ने निचली अदालत द्वारा तय किए गए सामूहिक दुष्कर्म और पॉक्सो के आरोपों को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि दुष्कर्म की परिभाषा में पुरुष का उल्लेख होने के कारण महिला पर गैंगरेप का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।\n• वैधानिक पृष्ठभूमि: साल 2013 में हुए संशोधनों के बाद कानून में धारा 376D जोड़कर गैंगरेप को एक अलग और स्वतंत्र अपराध का दर्जा दिया गया था, जिसे अब नई संहिता की धारा 70 में शामिल किया गया है। कानून में साझा मंशा रखने वाले व्यक्तियों के समूह का जिक्र है, जिसमें केवल पुरुष होने की कोई पूर्व शर्त नहीं रखी गई है।\n• पुराने फैसलों की सीमा: सुप्रीम कोर्ट के जिन फैसलों का हवाला दिया गया था वे 2013 के संशोधन से पूर्व के कानूनों से संबंधित थे, जब गैंगरेप धारा 376(2)(g) के तहत आता था। नए वैधानिक प्रावधानों के अस्तित्व में आने के बाद पुरानी न्यायिक नज़ीरें मौजूदा कानून पर हूबहू लागू नहीं हो सकती थीं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. क्या किसी महिला पर गैंगरेप का मुकदमा चलाया जा सकता है?\nहां, यदि महिला किसी पीड़िता के साथ दुष्कर्म कराने की साझा मंशा रखती है और उस समूह का हिस्सा बनती है, तो उस पर गैंगरेप का मुकदमा चलाया जा सकता है।\n\n2. क्या महिला अकेले दम पर गैंगरेप की आरोपी बन सकती है?\nनहीं, अदालत ने साफ किया है कि कोई महिला अकेले गैंगरेप की आरोपी नहीं बन सकती क्योंकि कानून की मूल परिभाषा के तहत यह संभव नहीं है।\n\n3. क्या गैंगरेप का आरोपी बनने के लिए शारीरिक कृत्य करना अनिवार्य है?\nनहीं, कानून के तहत साझा मंशा को आगे बढ़ाने वाले प्रत्येक व्यक्ति का खुद शारीरिक हमला करना आवश्यक नहीं है।\n\n4. अदालत ने किस तारीख को यह फैसला सुनाया?\nजस्टिस अनूप जयराम भंभानी की पीठ ने 15 अक्टूबर को यह फैसला सुनाया।\n\n5. निचली अदालत ने आरोपियों के खिलाफ आरोप कब तय किए थे?\nनिचली अदालत ने 17 जनवरी 2025 को आरोपियों के खिलाफ विभिन्न आपराधिक धाराओं में आरोप तय किए थे।\n\n6. इस मामले में पीड़िता ने अपनी मां पर क्या आरोप लगाए थे?\nपीड़िता ने आरोप लगाया था कि दिसंबर 2023 से जुलाई 2024 के बीच उसकी मां ने उसे धमकाकर दूसरे आरोपी के साथ संबंध बनाने पर मजबूर किया और घटना के समय कमरे में मौजूद रही।\n\n7. आरोपियों के खिलाफ किन कानूनी धाराओं में आरोप तय किए गए हैं?\nआरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 70(2), 351(3), 64(2)(m) और पॉक्सो कानून की धारा 6 के तहत आरोप तय किए गए हैं।",
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  "publishedAt": "2026-10-15",
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