गोद लेने में राजधानी के परिवारों की पहली पसंद बनीं बेटियां, ग्यारह वर्षों में बेटों से 24 फीसदी अधिक बच्चियों को मिला नया घर दिल्ली में बीते 11 वर्षों में गोद लेने के मामलों में बेटियों की हिस्सेदारी बेटों के मुकाबले 24 फीसदी अधिक रही है, जहां एक हजार से ज्यादा बच्चियों को नया परिवार मिला। पारंपरिक सामाजिक मान्यताओं में अक्सर वंश आगे बढ़ाने के लिए बेटों को प्राथमिकता दी जाती रही है, लेकिन आधुनिक दौर में पारिवारिक सोच का दायरा तेजी से बदल रहा है। इस सामाजिक बदलाव का एक उल्लेखनीय प्रमाण राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सामने आया है, जहां पिछले ग्यारह सालों में बच्चों को गोद लेने वाले दंपतियों और परिवारों ने बालिकाओं को खुले दिल से अपनाया है। इस दौरान बालकों की तुलना में बालिकाओं को नया घर और स्नेह देने की प्रवृत्ति काफी मजबूत देखी गई है। महिला एवं बाल विकास विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2015-16 से लेकर 2025-26 के समय में दिल्ली में कानूनी प्रक्रिया के तहत गोद ली गई बेटियों की संख्या बेटों के मुकाबले लगभग 24 प्रतिशत ज्यादा दर्ज की गई है। इस पूरी अवधि में 1,000 से अधिक बालिकाओं को नए अभिभावकों का संरक्षण मिला, जबकि इसी समयावधि में नया आशियाना पाने वाले बालकों की कुल संख्या करीब 760 रही। ग्यारह वर्षों में दत्तक ग्रहण के आंकड़ों में आया उतार-चढ़ाव आंकड़ों का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि बीते ग्यारह वर्षों के दौरान राजधानी में बच्चों को कानूनी रूप से अपनाने का रुझान विभिन्न चरणों से होकर गुजरा है। वित्तीय वर्ष 2015-16 दत्तक ग्रहण के मामले में सबसे सक्रिय दौर साबित हुआ था, जब एक ही वर्ष में रिकॉर्ड 178 बच्चों को नए परिवारों ने स्वीकार किया। इसके बाद के वर्षों में इस संख्या में क्रमशः उतार-चढ़ाव और कमी दर्ज की गई। कोरोना महामारी के दौर और दत्तक ग्रहण से संबंधित प्रशासनिक व कानूनी प्रक्रियाओं में हुए बदलावों के परिणामस्वरूप वर्ष 2021-22 में यह आंकड़ा घटकर केवल 87 रह गया था। महामारी का प्रभाव कम होने के बाद धीरे-धीरे परिस्थितियों में स्थिरता आई और परिवारों ने एक बार फिर आगे बढ़कर बच्चों को गोद लेना शुरू किया। वर्ष 2026 के आंकड़ों की बात करें तो जनवरी से सितंबर के बीच कुल 71 बच्चों को कानूनी तौर पर विभिन्न परिवारों को सौंपा जा चुका है। महिला एवं बाल विकास विभाग के ब्योरे के मुताबिक, वर्ष 2026 में बच्चों को गोद लेने की रफ्तार हर महीने एक जैसी नहीं रही। इस वर्ष सबसे ज्यादा 14 बच्चों को अप्रैल के महीने में नया परिवार मिला, जबकि सबसे कम दत्तक ग्रहण अगस्त के महीने में हुआ जब मात्र 2 बच्चे गोद लिए गए। यह रुझान दिखाता है कि प्रशासनिक अनुमोदन और सत्यापन प्रक्रियाओं के चलते मासिक आंकड़ों में भिन्नता आती रहती है। विशेष देखभाल वाले बच्चों को भी मिलने लगा पारिवारिक सहारा दत्तक ग्रहण से जुड़े आंकड़ों का सबसे संवेदनशील और मानवीय पहलू वर्ष 2025-26 के दौरान सामने आया। आम तौर पर गोद लेने की इच्छा रखने वाले अधिकांश दंपती शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ बच्चों को ही प्राथमिकता देते हैं, ताकि भविष्य में किसी अतिरिक्त चिकित्सा या देखरेख की जटिलता का सामना न करना पड़े। शारीरिक या मानसिक चुनौतियों से जूझ रहे बच्चों को पालना अत्यंत कठिन जिम्मेदारी मानी जाती है, जिसके कारण ऐसे खास बच्चों को गोद लिए जाने की दर पहले लगभग शून्य रहा करती थी। हालांकि, वर्ष 2025-26 में इस पुरानी सोच में ठोस बदलाव देखा गया। इस साल कई संवेदनशील परिवारों ने आगे आकर शारीरिक अथवा मानसिक चुनौतियों का सामना कर रहे लगभग छह विशेष बच्चों को अपनाया। महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा चलाए गए जागरूकता प्रयासों, भावी माता-पिता की निरंतर काउंसलिंग और विशेष कौशल विकास सत्रों के माध्यम से इस कठिन लक्ष्य को साकार किया गया। इन छह विशेष बच्चों में से 2 बच्चों को देश के भीतर रहने वाले परिवारों ने गोद लिया, जबकि 4 बच्चों को विदेश में रहने वाले परिवारों ने अपने घर का सदस्य बनाया। किशोर न्याय अधिनियम के तहत तय हैं गोद लेने के नियम देश में बच्चों को कानूनी रूप से गोद लेने की पूरी व्यवस्था किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम तथा उससे जुड़े वैधानिक नियमों के तहत संचालित होती है। इस प्रक्रिया को पारदर्शी और सुगम बनाने के लिए बच्चों को आयु के आधार पर चार अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया गया है, ताकि इच्छुक माता-पिता अपनी प्राथमिकता और पारिवारिक परिस्थितियों के अनुसार विकल्प चुन सकें। इन नियमों के अनुसार, पहला आयु वर्ग 2 वर्ष तक के नवजात और छोटे शिशुओं का है। दूसरा वर्ग 2 से 4 वर्ष तक के बच्चों का निर्धारित किया गया है। इसके बाद तीसरा वर्ग 4 से 8 वर्ष की उम्र के बच्चों का है, जबकि चौथा और अंतिम वर्ग 8 से 18 वर्ष के किशोरों और बच्चों के लिए बनाया गया है। कानूनी जांच, अभिभावकों की पृष्ठभूमि के सत्यापन और बच्चे की सहमति के आधार पर ही यह प्रक्रिया पूरी की जाती है। इसका आप पर असर यह रिपोर्ट देश और राजधानी में बालिकाओं तथा विशेष देखरेख वाले बच्चों के प्रति बढ़ते पारिवारिक सहयोग और कानूनी गोद लेने की प्रक्रिया में समाज के सकारात्मक नजरिए को दर्शाती है। • भारत में: कानूनी दत्तक ग्रहण को लेकर अभिभावकों की प्राथमिकताएं बदल रही हैं और लिंग भेद की पुरानी सोच टूट रही है। इससे अनाथालयों और बालगृहों में रहने वाली बालिकाओं को सुरक्षित पारिवारिक माहौल मिलने की संभावनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। • दिल्ली में: राजधानी के परिवारों में काउंसलिंग और प्रशासनिक सुगमता के चलते विशेष बच्चों को अपनाने की झिझक कम हो रही है। इच्छुक दंपती महिला एवं बाल विकास विभाग के मार्गदर्शन में उम्र के चार तय वर्गों के अनुसार बच्चों को गोद लेने के लिए आवेदन कर सकते हैं। • भावी माता-पिता के लिए: नियमबद्ध श्रेणियों और विशेष काउंसलिंग सत्रों से परिवारों को मानसिक और व्यावहारिक तैयारी का बेहतर अवसर मिलता है। इससे बच्चों और नए अभिभावकों के बीच समायोजन पहले से अधिक सहज और सुरक्षित हो जाता है। • विशेष बच्चों के लिए: शारीरिक या मानसिक चुनौतियों का सामना कर रहे बच्चों को घरेलू और विदेशी परिवारों में स्थायी ठिकाना मिलने की नई उम्मीद जगी है। ऐसे बच्चों के चिकित्सा और भावनात्मक विकास के लिए व्यापक सामाजिक स्वीकृति का मार्ग प्रशस्त हुआ है। ऐसा क्यों हुआ गोद लेने के आंकड़ों में बेटियों की अधिक भागीदारी और विशेष बच्चों को अपनाने के पीछे निरंतर प्रशासनिक प्रयास और सामाजिक जागरूकता मुख्य कारण रहे हैं। • जागरूकता और काउंसलिंग: महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा संभावित अभिभावकों के लिए आयोजित विशेष काउंसलिंग सत्रों और कौशल विकास कार्यशालाओं ने लोगों की झिझक दूर की। इस निरंतर संवाद से अभिभावक शारीरिक व मानसिक चुनौतियों से जूझ रहे बच्चों को अपनाने के लिए भी प्रेरित हुए। • महामारी के बाद प्रशासनिक बहाली: वर्ष 2021-22 में कोरोना काल और कानूनी बदलावों के कारण प्रक्रिया धीमी पड़ी थी, जो सामान्य स्थिति लौटने के बाद पुनः तेज हुई। प्रशासनिक प्रक्रियाओं के ऑनलाइन और पारदर्शी होने से भी आवेदन प्रक्रिया अधिक सुगम बनी। • लिंग संवेदनशीलता में वृद्धि: केवल वंश चलाने के लिए बेटों को अपनाने की पारंपरिक मानसिकता पर आधुनिक परिवारों की प्रगतिशील सोच भारी पड़ी है। परिवारों ने बिना किसी भेदभाव के बालिकाओं को प्राथमिकता देकर समाज में बेटियों के प्रति सम्मान का संदेश दिया है। सवाल-जवाब 1. दिल्ली में पिछले 11 सालों में गोद ली गई बेटियों की संख्या बेटों से कितनी अधिक रही? महिला एवं बाल विकास विभाग के अनुसार, बीते 11 वर्षों में दिल्ली में गोद ली गई बेटियों की संख्या बेटों के मुकाबले लगभग 24 प्रतिशत अधिक दर्ज की गई। 2. वर्ष 2015-16 से 2025-26 के बीच दिल्ली में कुल कितने बच्चों को नया परिवार मिला? इस समयावधि में दिल्ली में 1,000 से अधिक बेटियों और करीब 760 बेटों को कानूनी दत्तक ग्रहण के जरिए नया घर और परिवार मिला। 3. दत्तक ग्रहण के मामलों में सबसे ज्यादा और सबसे कम संख्या किस वर्ष रही? वर्ष 2015-16 में रिकॉर्ड 178 बच्चों को गोद लिया गया था, जबकि कोरोना और प्रशासनिक बदलावों के कारण 2021-22 में यह आंकड़ा घटकर 87 पर आ गया था। 4. वर्ष 2026 में जनवरी से सितंबर तक दिल्ली में कितने बच्चे गोद लिए गए? वर्ष 2026 में जनवरी से सितंबर के बीच कुल 71 बच्चे गोद लिए गए, जिनमें सर्वाधिक 14 बच्चे अप्रैल में और सबसे कम 2 बच्चे अगस्त में गोद दिए गए। 5. वर्ष 2025-26 में विशेष देखरेख वाले कितने बच्चों को गोद लिया गया? वर्ष 2025-26 में शारीरिक या मानसिक चुनौतियों का सामना कर रहे लगभग 6 खास बच्चों को गोद लिया गया, जिनमें से 2 को भारतीय और 4 को विदेशी परिवारों ने अपनाया। 6. कानूनी नियमों के तहत गोद लेने के लिए बच्चों को किन आयु वर्गों में बांटा गया है? नियमों के अनुसार बच्चों को चार श्रेणियों में बांटा गया है: 2 साल तक, 2 से 4 साल तक, 4 से 8 साल तक और 8 से 18 साल के बीच। https://trendkia.com/delhi/goda-lene-men-rajadhani-ke-parivaron-ki-pahali-pasnda-banin-betiyan-gyaraha-varshon-men-beton-se-24-phisadi-adhika-bachchiyon-ko-m-48772 TrendKia — Har trend, sabse pehle.