# आईआईटी दिल्ली में इसरो अध्यक्ष ने रखी भारत के अंतरिक्ष सफर की दास्तान, 2035 के स्पेस स्टेशन और 2040 के मून मिशन का पेश किया रोडमैप

> भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के अध्यक्ष डॉ. वी. नारायणन ने आईआईटी दिल्ली में देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआती चुनौतियों, क्रायोजेनिक तकनीक में आत्मनिर्भरता और 2040 तक चांद पर मानव भेजने के विजन को साझा किया.

**Type:** article · **Category:** दिल्ली · **Published:** 2026-09-25 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/delhi/iit-delhi-men-isro-adhyaksha-ne-rakhi-bharata-ke-antariksha-saphara-ki-dastana-2035-ke-spesa-steshana-aura-2040-ke-muna-mishana-ka-38474 · **Language:** Hindi
**Tags:** इसरो, डॉ वी नारायणन, आईआईटी दिल्ली, चंद्रयान 3, गगनयान, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन, क्रायोजेनिक इंजन

साठ के दशक में जब भारत गंभीर खाद्य संकट और बुनियादी साक्षरता जैसी प्राथमिक चुनौतियों से जूझ रहा था, तब देश ने अंतरिक्ष विज्ञान की ओर अपने कदम बढ़ाए थे. उस दौर में प्रक्षेपण के लिए छोटे-छोटे कलपुर्जे भी विदेशी सहयोग से जुटाने पड़ते थे. आज वही भारत अपनी धरती से दुनिया के तमाम मुल्कों के उपग्रहों को व्यावसायिक स्तर पर अंतरिक्ष में भेज रहा है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के अध्यक्ष और अंतरिक्ष विभाग के सचिव डॉ. वी. नारायणन ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली में आयोजित एक विशेष व्याख्यान के दौरान भारत के इस पूरे सफर की परतें खोलीं. ‘भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम: चुनौतियां और आगे की राह’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीकी प्रतिबंधों का सामना करते हुए भारत ने कैसे स्वदेशी ताकत खड़ी की और अब वह अपने अंतरिक्ष स्टेशन तथा चंद्र मानव मिशन की दिशा में अग्रसर है.

## शुरुआती संघर्ष और थुंबा से उड़ी पहली उम्मीद
डॉ. वी. नारायणन ने देश के अंतरिक्ष सफर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को वर्ष 1962 की शुरुआत से जोड़ा. उन्होंने याद दिलाया कि उस जमाने में जब देश के सामने भोजन और आम जनजीवन की मूलभूत जरूरतें सबसे बड़ी चुनौती थीं, तब वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में भविष्य तलाशने की हिम्मत दिखाई. इसी सिलसिले में नवंबर 1963 में केरल के थुंबा तट से भारत का पहला साउंडिंग रॉकेट प्रक्षेपित किया गया था. उस समय रॉकेट तैयार करने के लिए आवश्यक कलपुर्जे और उपकरण दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से जुटाकर एक साथ लाए गए थे. उस मामूली शुरुआत के बाद वैज्ञानिकों ने निरंतर अपनी तकनीकी महारत में इजाफा किया. आज स्थिति यह है कि उपग्रहों का डिजाइन तैयार करने, उनके निर्माण और उन्हें अंतरिक्ष में स्थापित करने में देश पूरी तरह आत्मनिर्भर है, बल्कि वैश्विक स्तर पर उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में अपनी व्यावसायिक सेवाएं भी दे रहा है.

## प्रतिबंधों के दौर में क्रायोजेनिक आत्मनिर्भरता का उदय
भारत की तकनीकी यात्रा में क्रायोजेनिक प्रणोदन तकनीक का विकास एक ऐसा मोड़ था, जिसने पूरे परिदृश्य को बदल दिया. डॉ. नारायणन ने व्याख्यान में बताया कि 1990 के दशक की शुरुआत में कुछ शक्तिशाली देशों ने भारत को क्रायोजेनिक तकनीक देने से साफ मना कर दिया था. इस वैश्विक इनकार ने देश के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ी बाधा खड़ी कर दी थी, लेकिन इसे एक अवसर की तरह लिया गया. उन्होंने कहा, “जब दुनिया ने हमें यह तकनीक देने से इनकार कर दिया, तो हमने इसे खुद विकसित करने का फैसला किया.” भारत ने किसी पर निर्भर रहने के बजाय अपनी प्रयोगशालाओं में दिन-रात मेहनत की. डॉ. नारायणन ने गर्व के साथ बताया कि आज भारत ने पूरी तरह अपने दम पर तीन अलग-अलग क्रायोजेनिक प्रणोदन प्रणालियां सफलतापूर्वक तैयार कर ली हैं, जो देश के भारी रॉकेटों को शक्ति प्रदान कर रही हैं.

## चंद्रयान-3 और अंतरिक्ष में डॉकिंग की ऐतिहासिक सफलताएं
डॉ. नारायणन ने 23 अगस्त 2023 की तारीख को भारतीय अंतरिक्ष इतिहास का स्वर्णिम पन्ना करार दिया. इसी दिन भारत के चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय इलाके के पास अपनी ऐतिहासिक सॉफ्ट लैंडिंग दर्ज की थी. इस सफलता के साथ भारत चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग की क्षमता प्रदर्शित करने वाला दुनिया का चौथा देश बना, जबकि चंद्रमा के दुर्गम दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के पास पहुंचने वाला विश्व का पहला देश बनकर इतिहास रचा. इसके अलावा, उन्होंने भारत के हालिया अंतरिक्ष डॉकिंग प्रयोग का उल्लेख किया. इस परीक्षण के जरिए भारत अंतरिक्ष में दो अलग-अलग यानों को आपस में जोड़ने की जटिल तकनीक हासिल करने वाला दुनिया का चौथा देश बन चुका है. उन्होंने चंद्रमा पर पानी के अणुओं की खोज और पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंचने जैसी उपलब्धियों को भी भारतीय वैज्ञानिकों की अद्वितीय क्षमता का प्रमाण बताया.

## गगनयान, 2035 का अंतरिक्ष स्टेशन और 2040 का मून विजन
भावी योजनाओं पर बात करते हुए डॉ. नारायणन ने बताया कि भारत अब अंतरिक्ष में इंसानों की स्थायी उपस्थिति दर्ज कराने की दिशा में काम कर रहा है. गगनयान परियोजना के तहत देश अपनी पहली मानवरहित उड़ान की तैयारियों में जुटा है, जिससे इंसानों को सुरक्षित अंतरिक्ष में भेजने और वापस लाने की क्षमता को प्रमाणित किया जा सके. इसके बाद देश का बड़ा लक्ष्य भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन की स्थापना है. इस अंतरिक्ष स्टेशन के पहले मॉड्यूल को आधिकारिक स्वीकृति मिल चुकी है और इसे वर्ष 2028 तक अंतरिक्ष में स्थापित करने की योजना है. इसके बाद वर्ष 2035 तक स्टेशन के बाकी हिस्सों और मॉड्यूल्स को चरणबद्ध तरीके से जोड़ा जाएगा. चंद्र अन्वेषण के क्षेत्र में चंद्रयान-4 की तैयारी है, जिसका मुख्य काम चांद की सतह से मिट्टी और पत्थरों के नमूने धरती पर वापस लाना होगा. इसके बाद चंद्रयान-5 और शुक्र ग्रह के लिए प्रस्तावित मिशनों पर भी काम आगे बढ़ रहा है, जिसका अंतिम शिखर वर्ष 2040 तक चंद्रमा पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री को उतारना तय किया गया है.

## इसका आप पर असर
भारत के महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष मिशनों के विस्तार से देश के उच्च शिक्षण संस्थानों, रक्षा तकनीक और उच्च कौशल वाले रोजगार क्षेत्रों में व्यापक अवसर खुल रहे हैं.

- **भारत में:** देश में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, रोबोटिक्स और प्रणोदन प्रणाली से जुड़े उच्च तकनीक वाले उद्योगों में हजारों नए रोजगार और रिसर्च फेलोशिप सृजित होंगे. जो छात्र वैज्ञानिक अनुसंधान या रक्षा तकनीक में अपना करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए घरेलू स्तर पर बड़े प्रोजेक्ट्स उपलब्ध होंगे.
- **दिल्ली में:** आईआईटी दिल्ली जैसे प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ने वाले शोधकर्ताओं और छात्रों को इसरो के आगामी स्पेस स्टेशन और डॉकिंग प्रोजेक्ट्स में सीधे रिसर्च का मौका मिलेगा. राजधानी के तकनीकी संस्थानों को अंतरिक्ष विभाग से उन्नत लैब और अनुसंधान ग्रांट की सीधी साझेदारी हासिल होगी.
- **विज्ञान प्रेमियों और युवाओं के लिए:** गगनयान और 2040 के चंद्र मानव मिशन से देश भर के युवाओं में एसटीईएम विषयों के प्रति भारी रुचि और राष्ट्रीय गौरव की भावना मजबूत होगी. स्कूल और कॉलेज स्तर के छात्र अब अंतरिक्ष को केवल एक विषय नहीं, बल्कि एक व्यवहार्य भविष्य के रूप में देख सकेंगे.
- **उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए:** 2028 और 2035 के अंतरिक्ष स्टेशन मॉड्यूल्स के निर्माण के लिए घरेलू निजी कंपनियों और एमएसएमई को कंपोनेंट सप्लाई के बड़े ठेके मिलेंगे. इससे मेक इन इंडिया विजन के तहत एयरोस्पेस विनिर्माण की सप्लाई चेन काफी मजबूत होगी.

## ऐसा क्यों हुआ
इसरो द्वारा दीर्घकालिक अंतरिक्ष रोडमैप की घोषणा दशकों के सफल अनुसंधान, वैश्विक तकनीक प्रतिबंधों के खिलाफ स्वदेशी विकास और रणनीतिक स्वायत्तता की दिशा में उठाए गए कदमों का सीधा परिणाम है.

- **तकनीक प्रतिबंधों से स्वदेशी विकास:** 1990 के दशक में विदेशी ताकतों द्वारा क्रायोजेनिक तकनीक साझा करने से इनकार करने के बाद भारत ने आयात पर निर्भरता खत्म करने का संकल्प लिया. वैज्ञानिकों ने वर्षों के कड़े अनुसंधान के बाद तीन स्वदेशी क्रायोजेनिक प्रणालियां बनाकर इस बाधा को आत्मनिर्भरता में बदल दिया.
- **चंद्रयान-3 और डॉकिंग परीक्षणों की सफलता:** 23 अगस्त 2023 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफल लैंडिंग और हालिया इन-ऑर्बिट डॉकिंग परीक्षण ने भारत को दुनिया के शीर्ष अंतरिक्ष देशों की कतार में ला खड़ा किया. इन तकनीकी सफलताओं ने भविष्य के मानव मिशन और सैंपल रिटर्न मिशन के लिए आवश्यक इंजीनियरिंग विश्वास प्रदान किया.
- **भू-रणनीतिक और वैज्ञानिक नेतृत्व की आवश्यकता:** पृथ्वी की निचली कक्षा में अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करना और चंद्रमा के संसाधनों का अध्ययन करना 21वीं सदी के वैज्ञानिक नेतृत्व के लिए जरूरी माना जा रहा है. 2028 में पहला मॉड्यूल और 2040 में मानव चंद्र लैंडिंग इसी रणनीतिक विजन को पूरा करने के लिए तय की गई है.

## सवाल-जवाब

### 1. इसरो अध्यक्ष डॉ. वी. नारायणन ने भारत के अंतरिक्ष सफर की जानकारी कहां दी?
उन्होंने आईआईटी दिल्ली में आयोजित ‘भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम: चुनौतियां और आगे की राह’ विषय पर व्याख्यान देते हुए यह जानकारी दी.

### 2. भारत का पहला रॉकेट कब और कहां से प्रक्षेपित किया गया था?
भारत का पहला रॉकेट नवंबर 1963 में केरल के थुंबा से प्रक्षेपित किया गया था, जिसे तैयार करने के लिए विभिन्न देशों से उपकरण जुटाए गए थे.

### 3. क्रायोजेनिक तकनीक को लेकर भारत के सामने क्या चुनौती आई थी?
1990 के दशक की शुरुआत में कुछ देशों ने भारत को क्रायोजेनिक तकनीक देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद भारत ने अपने दम पर तीन क्रायोजेनिक प्रणालियां विकसित कीं.

### 4. चंद्रयान-3 मिशन ने चंद्रमा पर क्या ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया?
चंद्रयान-3 ने 23 अगस्त 2023 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के निकट सफल सॉफ्ट लैंडिंग की, जिससे भारत दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला विश्व का पहला देश बना.

### 5. अंतरिक्ष में डॉकिंग को लेकर भारत ने कौन सा मुकाम हासिल किया है?
भारत अंतरिक्ष में दो यानों को सफलतापूर्वक आपस में जोड़ने (डॉकिंग) की क्षमता हासिल करने वाला दुनिया का चौथा देश बन चुका है.

### 6. भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन को लेकर इसरो की क्या समयसीमा तय की गई है?
इसके पहले मॉड्यूल को 2028 तक प्रक्षेपित करने की योजना है, जबकि 2035 तक स्टेशन के बाकी मॉड्यूल्स को जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है.

### 7. चंद्रयान-4 मिशन का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?
चंद्रयान-4 मिशन का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा की सतह से नमूने एकत्र करके सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाना है.

### 8. भारत ने चंद्रमा पर मानव उतारने का लक्ष्य किस वर्ष तक का रखा है?
भारत ने अपने महत्वाकांक्षी विजन के तहत वर्ष 2040 तक चंद्रमा की सतह पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री को उतारने का लक्ष्य तय किया है.

## प्रेरणा और सबक
भारत का अंतरिक्ष सफर यह साबित करता है कि बुनियादी अभावों और विदेशी प्रतिबंधों के बावजूद निरंतर नवाचार और आत्मसम्मान से किसी भी क्षेत्र में विश्व चैंपियन बना जा सकता है.

- **अभाव को लक्ष्य की रुकावट न बनने दें:** 1962 में देश जब साक्षरता और खाद्य सुरक्षा जैसी भारी समस्याओं से जूझ रहा था, तब भी वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में भविष्य देखा और आगे बढ़े. सीमित संसाधनों के बीच भी बड़ा सपना देखना और उस पर अडिग रहना सबसे बड़ी सीख है.
- **इनकार को आत्मनिर्भरता के अवसर में बदलें:** जब 1990 के दशक में दुनिया ने क्रायोजेनिक तकनीक देने से मना कर दिया, तो भारतीय वैज्ञानिकों ने शिकायत करने के बजाय खुद तीन प्रणालियां विकसित कर लीं. किसी भी बाहरी संकट या असुविधा को खुद की क्षमता बढ़ाने का अवसर बनाना चाहिए.
- **चरणबद्ध और निरंतर प्रयास ही सफलता दिलाते हैं:** 1963 में थुंबा से विदेशी पुर्जों के साथ शुरू हुआ सफर आज चंद्रयान-3 और अंतरिक्ष स्टेशन तक पहुंचा है. जीवन में कोई भी बड़ी कामयाबी रातों-रात नहीं मिलती, बल्कि दशकों की धैर्यपूर्ण और अनुशासित मेहनत का नतीजा होती है.
- **अपनी विशिष्ट पहचान और रास्ते खुद बनाएं:** चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला पहला देश बनकर भारत ने दिखाया कि दूसरों के नक्शेकदम पर चलने के बजाय अपनी अलग लकीर खींचना ही असली नेतृत्व है.

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