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  "type": "article",
  "title": "जंतर-मंतर प्रदर्शन मामले में सीजेपी नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई अर्जी पर एसईएम अदालत में आज फैसला संभव",
  "summary": "जंतर-मंतर पर बिना अनुमति प्रवेश और प्रदर्शन के मामले में न्यायिक हिरासत में भेजे गए सीजेपी नेता सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई याचिका पर एसईएम अदालत में आज आदेश आ सकता है।",
  "content": "कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत खत्म होने के बाद उनकी रिहाई को लेकर मंदिर मार्ग स्थित स्पेशल एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की अदालत में कानूनी प्रक्रिया तेज हो गई है। दोनों नेताओं की ओर से अदालत के समक्ष रिहाई की औपचारिक अर्जी पेश की गई है, जिस पर आज अंतिम निर्णय सुनाए जाने की पूरी संभावना है। अदालत के पिछले आदेश के तहत दोनों नेता फिलहाल पांच दिनों की न्यायिक हिरासत के चलते जेल में बंद हैं।\n\nजंतर-मंतर पर दीवार फांदकर दाखिल होने और नारेबाजी का पूरा मामला\nइस कानूनी विवाद की शुरुआत 13 अक्टूबर को हुई थी, जब सौरव दास और आशुतोष रांका को निषेधाज्ञा वाले इलाके में बिना इजाजत कदम रखने के आरोप में एहतियातन हिरासत में लेकर गिरफ्तार किया गया था। आरोप के मुताबिक, कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थकों का यह समूह एक निजी परिसर के गेट और बाउंड्री वॉल को फांदते हुए सीधे जंतर-मंतर के भीतर पहुंच गया था। प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद इन प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठाते हुए जोरदार नारेबाजी शुरू कर दी थी।\n\nघटनास्थल पर तैनात सुरक्षा तंत्र ने तुरंत कार्रवाई करते हुए प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित किया। मामले में पुलिस ने जबरन सीमा में घुसने, निषेधाज्ञा के आदेशों की अवहेलना करने, पूर्व में शांति बनाए रखने के लिए भरे गए मुचलके के नियमों का उल्लंघन करने और ऑन-ड्यूटी सरकारी कर्मचारियों को उनके आधिकारिक दायित्वों को पूरा करने से रोकने जैसी विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया था। इसके बाद दोनों आरोपियों को विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया था, जहां से अदालत ने आशुतोष रांका और सौरव दास को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेजने का आदेश जारी कर दिया। इसी मामले में पकड़े गए उनके एक अन्य सहयोगी अजिंक्य शिंदे को राहत देते हुए अदालत ने 5,000 रुपये के मुचलके और छह महीने तक उत्तम आचरण व शांति बनाए रखने की शर्त पर रिहा करने का निर्देश दिया था।\n\nसुरक्षा कर्मियों के कार्य में रुकावट डालने पर पुलिस का आधिकारिक पक्ष\nइस पूरे प्रकरण को लेकर दिल्ली पुलिस की ओर से आधिकारिक विवरण जारी किया गया था। पुलिस के अनुसार, 13 अक्टूबर की सुबह सौरव दास, आशुतोष रांका, अजिंक्य शिंदे और संगठन के 11 अन्य सदस्य एक निजी अहाते का रास्ता बनाकर गैरकानूनी ढंग से जंतर-मंतर पहुंचे थे। पुलिस प्रशासन ने स्पष्ट किया कि जंतर-मंतर को पहले ही अधिकृत विरोध प्रदर्शन स्थलों की सूची से बाहर किया जा चुका है।\n\nसुरक्षा व्यवस्था का ब्योरा देते हुए पुलिस ने बताया कि मौके पर मुस्तैद सुरक्षा कर्मियों ने जब इस भीड़ को आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश की, तो प्रदर्शनकारियों ने उनके कामकाज में सीधे तौर पर बाधा उत्पन्न की। इस हंगामे के बाद मौके से सभी 14 लोगों को पुलिस ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था। पुलिस का कहना था कि इलाके में सार्वजनिक शांति व्यवस्था बिगड़ने और तय कानूनों की धज्जियां उड़ाने की लगातार कोशिशों को देखते हुए सौरव दास, आशुतोष रांका और अजिंक्य शिंदे की एहतियातन गिरफ्तारी जरूरी हो गई थी।\n\nसंस्थापक अभिजीत दिपके को मिली सशर्त जमानत और पुराना घटनाक्रम\nदूसरी तरफ, कॉकरोच जनता पार्टी के मुख्य संस्थापक अभिजीत दिपके को एसईएम अदालत पहले ही जमानत दे चुकी है। दिपके को कनॉट प्लेस में आयोजित होने वाले 'लहरा दो तिरंगा' मार्च से ठीक पहले पुलिस ने हिरासत में लिया था और फिर कानूनी प्रक्रिया के तहत प्रिवेंटिव अरेस्ट दिखाया गया था। दिपके के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 126 और 170 के तहत कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की आशंका से जुड़ा नया केस दर्ज किया गया था।\n\nसीजेपी के इन नेताओं से जुड़ा यह कोई पहला कानूनी टकराव नहीं है। इससे पहले 10 अक्टूबर को भी जब अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका पार्टी के एक अन्य विरोध कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे थे, तब पुलिस ने उन्हें दिल्ली हवाई अड्डे से हिरासत में लिया था। उस समय भी सार्वजनिक शांति भंग करने से संबंधित अलग केस कायम किया गया था और तीनों नेताओं से पूरे एक वर्ष की अवधि तक शांति बनाए रखने के वचन पत्र पर हस्ताक्षर करवाए गए थे।\n\nइसका आप पर असर\nयह घटनाक्रम राजधानी में बिना इजाजत विरोध प्रदर्शन करने और शांति व्यवस्था के नियमों का उल्लंघन करने पर होने वाली कड़ी कानूनी कार्रवाई को दर्शाता है।\n\n• भारत में: किसी भी सार्वजनिक मुद्दे पर प्रदर्शन करने वाले संगठनों और कार्यकर्ताओं के लिए तय प्रशासनिक अनुमति लेना अनिवार्य है। बिना अनुमति प्रदर्शन स्थलों पर जाने या सुरक्षा घेरा तोड़ने पर सख्त निरोधात्मक कानून और कारावास का सामना करना पड़ सकता है।\n• दिल्ली में: नई दिल्ली और मध्य दिल्ली के संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा एजेंसियां अनधिकृत सभाओं पर लगातार पैनी नजर रख रही हैं। जंतर-मंतर को अधिकृत प्रदर्शन स्थलों से हटाए जाने के बाद वहां बिना पूर्व स्वीकृति जुटने वालों पर त्वरित कानूनी बंदिशें लागू हो रही हैं।\n• नागरिकों और यात्रियों के लिए: प्रमुख सार्वजनिक और ऐतिहासिक स्थलों के आसपास अचानक होने वाले प्रदर्शनों और पुलिस घेराबंदी से आवाजाही प्रभावित हो सकती है। ऐसे मार्गों पर निकलने से पहले प्रशासनिक और यातायात परामर्श पर ध्यान देना उपयोगी रहता है।\n• कानूनी मुचलके के संदर्भ में: पूर्व में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए बांड भरने वाले लोगों को किसी भी नए प्रदर्शन में शामिल होते वक्त विशेष सावधानी बरतनी होगी। नियमों की अनदेखी पर जमानत की शर्तें रद्द होकर सीधी हिरासत का प्रावधान लागू हो सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह कार्रवाई सुरक्षा पाबंदियों की अवहेलना, अनधिकृत प्रवेश और पूर्व में हस्ताक्षरित शांति मुचलके के उल्लंघन के चलते की गई। पुलिस के अनुसार प्रदर्शनकारियों ने प्रतिबंधित क्षेत्र में कूदकर अशांति पैदा करने का प्रयास किया था।\n\n• प्रतिबंधित स्थल पर अवैध प्रवेश: प्रदर्शनकारियों ने निर्धारित विरोध स्थल की सूची से हटाए जा चुके जंतर-मंतर में निजी परिसर की दीवार फांदकर अनधिकृत रूप से प्रवेश किया। सुरक्षा कर्मियों द्वारा रोके जाने के बावजूद उन्होंने बलपूर्वक आगे बढ़ने की कोशिश की और सरकारी कार्य में बाधा डाली।\n• उच्चाधिकारी के खिलाफ नारेबाजी: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर इस समूह ने बिना अनुमति संवेदनशील क्षेत्र में सार्वजनिक नारेबाजी शुरू कर दी। इस कदम को पुलिस ने सार्वजनिक शांति व्यवस्था के लिए सीधा खतरा माना।\n• पूर्व बांड शर्तों का उल्लंघन: इससे पहले 10 अक्टूबर को हवाई अड्डे पर हिरासत में लिए जाने के बाद इन नेताओं ने एक साल तक शांति बनाए रखने के बांड पर हस्ताक्षर किए थे। तीन दिन बाद ही दोबारा उग्र प्रदर्शन में शामिल होकर उन्होंने उन कानूनी शर्तों का उल्लंघन किया।\n• कनॉट प्लेस में प्रस्तावित मार्च की पृष्ठभूमि: पार्टी संस्थापक अभिजीत दिपके द्वारा 'लहरा दो तिरंगा' मार्च के आह्वान के चलते क्षेत्र में पहले से ही सुरक्षा अलर्ट जारी था। किसी भी बड़ी अव्यवस्था को रोकने के लिए पुलिस ने त्वरित एहतियाती गिरफ्तारी का रास्ता चुना।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सौरव दास और आशुतोष रांका को किस मामले में हिरासत में लिया गया था?\nउन्हें 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर क्षेत्र में निजी परिसर की दीवार फांदकर बिना इजाजत घुसने और नारेबाजी करने के आरोप में एहतियातन गिरफ्तार किया गया था।\n\n2. अदालत ने इन दोनों नेताओं को कितने दिनों की हिरासत में भेजा था?\nविशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अदालत ने सौरव दास और आशुतोष रांका को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेजने का आदेश दिया था।\n\n3. उनके सहयोगी अजिंक्य शिंदे को किन शर्तों पर रिहाई मिली थी?\nअजिंक्य शिंदे को 5,000 रुपये के निजी मुचलके और छह महीने तक शांति व अच्छा व्यवहार बनाए रखने की शर्त पर रिहा किया गया था।\n\n4. पार्टी संस्थापक अभिजीत दिपके की कानूनी स्थिति क्या है?\nअभिजीत दिपके को कनॉट प्लेस में प्रस्तावित मार्च से पहले गिरफ्तार किया गया था, जिन्हें बाद में एसईएम अदालत से जमानत मिल गई थी।\n\n5. नेताओं के खिलाफ कौन सी मुख्य कानूनी धाराएं और आरोप लगाए गए हैं?\nउन पर जबरन प्रवेश करने, निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने, शांति मुचलके की शर्तों को तोड़ने और सरकारी कार्य में बाधा डालने के आरोप लगाए गए हैं।",
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  "category": "दिल्ली",
  "publishedAt": "2026-10-18",
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