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  "title": "नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत की कूटनीति का दबदबा, ईरान और यूएई के तनाव के बीच बनी साझा घोषणा पर सहमति",
  "summary": "नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में भारत ने मतभेदों को सुलझाते हुए सभी सदस्य देशों को एक साझा घोषणापत्र पर सहमत करने में बड़ी कूटनीतिक कामयाबी पाई है।",
  "content": "नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 के शुरुआती दिन भारत ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मोर्चे पर एक ऐतिहासिक सफलता दर्ज की है। पश्चिम एशिया में जारी गंभीर तनाव और सदस्य राष्ट्रों के बीच तीखे मतभेदों के बावजूद, समूह के सभी देश एक संयुक्त घोषणापत्र जारी करने पर पूरी तरह सहमत हो गए हैं। इस साझा बयान में किसी भी देश का सीधा नाम लिए बिना एकतरफा सैन्य कार्रवाई और हमलों की कड़ी निंदा करने का मसौदा तैयार किया गया है। भारत की मध्यस्थता और कूटनीतिक सूझबूझ के चलते यह सहमति ऐसे समय बनी है जब ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे प्रमुख सदस्य देशों के बीच गंभीर रणनीतिक टकराव चल रहा था।\n\nदेर रात तक चली मैराथन वार्ताओं के बाद सुलझा गतिरोध\nसम्मेलन के दौरान साझा घोषणापत्र को अंतिम रूप देना आसान नहीं था। इसके लिए भारतीय अधिकारियों और ब्रिक्स शेरपाओं ने बेहद जटिल बातचीत की प्रक्रिया का नेतृत्व किया। सहमति का फॉर्मूला तैयार करने के लिए सदस्य देशों के प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई, जो तड़के सुबह 4 बजे तक चलती रही। भारत ने रूस, ब्राजील और मिस्र जैसे अन्य साझेदार देशों के साथ मिलकर अलग-अलग बैठकों का दौर चलाया ताकि हर सदस्य देश की चिंताओं को सुना जा सके और भाषा पर सर्वसम्मति बनाई जा सके।\n\nकूटनीतिक प्रयास इस बात पर केंद्रित रहे कि पश्चिम एशिया का गंभीर भू-राजनीतिक संकट ब्रिक्स के व्यापक आर्थिक एजेंडे और बहुपक्षीय सहयोग को प्रभावित न करे। भारत ने लगातार संवाद के जरिए यह सुनिश्चित किया कि सदस्य देशों के आपसी मतभेद शिखर सम्मेलन की मूल प्रक्रिया और उत्पादकता पर हावी न होने पाएं।\n\nईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच गहराता तनाव\nब्रिक्स समूह के विस्तार के बाद यह पहला बड़ा अवसर था जब सदस्य देशों के बीच आंतरिक भू-राजनीतिक तनाव खुलकर सामने आया था। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात दोनों ही ब्रिक्स के सदस्य हैं, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में चल रहे संघर्ष को लेकर दोनों के रुख पूरी तरह विपरीत रहे हैं। क्षेत्रीय संघर्ष की वजह से वैश्विक तेल आपूर्ति के सबसे अहम समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर गईं।\n\nसंघर्ष शुरू होने के बाद से ईरानी मिसाइल हमलों का सामना करने वाले संयुक्त अरब अमीरात ने अगस्त के महीने में ईरान के साथ अपने सभी तरह के व्यापारिक और वित्तीय लेन-देन पूरी तरह रोक दिए थे। इन कड़वाहटों की वजह से मई में नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में कोई साझा बयान जारी नहीं हो सका था। उस समय भारत को समूह के अध्यक्ष के रूप में केवल एक पृथक अध्यक्षीय वक्तव्य जारी करके स्थिति संभालनी पड़ी थी, जिसमें सदस्य देशों के भिन्न विचारों का उल्लेख किया गया था।\n\nभारत का संतुलित रुख और तटस्थ भाषा का फॉर्मूला\nइस शिखर सम्मेलन में गतिरोध तोड़ने के लिए भारत ने बेहद संतुलित और कूटनीतिक रूप से परिपक्व दृष्टिकोण सामने रखा। रूस के राष्ट्रपति कार्यालय क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने भी पहले टिप्पणी की थी कि दोनों देशों के मतभेद घोषणापत्र के निर्माण पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं, लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि ब्रिक्स नेतृत्व एक स्वीकार्य भाषा तलाश लेगा।\n\nसहमति बनाने के दौरान ईरान की मांग थी कि ब्रिक्स के घोषणापत्र में अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए हमलों के साथ-साथ पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंधों की खुलकर और नाम लेकर निंदा की जाए। दूसरी तरफ संयुक्त अरब अमीरात और अन्य सहयोगी इस रुख से असहमत थे। गतिरोध दूर करने के लिए भारत ने एक सर्वमान्य मसौदा प्रस्तावित किया जिसमें निम्नलिखित प्रमुख बिंदु शामिल किए गए\n\n• संप्रभुता का सम्मान: किसी भी देश का नाम लिए बिना अकारण की गई आक्रामक कार्रवाइयों की निंदा और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों की पुष्टि।\n• सैन्य बल के प्रयोग का विरोध: अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने के लिए बल प्रयोग या उसकी धमकी देने की नीति का कड़ा विरोध।\n• नागरिकों और बुनियादी ढांचे की सुरक्षा: युद्ध अथवा संघर्ष वाले क्षेत्रों में आम नागरिकों और आवश्यक नागरिक अवसंरचना की पूर्ण सुरक्षा की अनिवार्यता।\n• संवाद और कूटनीति: सभी क्षेत्रीय और वैश्विक विवादों का समाधान केवल शांतिपूर्ण बातचीत, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में निकालने पर बल।\n• नौवहन की स्वतंत्रता: वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला को सुचारू बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर निर्बाध आवाजाही का अधिकार सुरक्षित रखना।\n\nवैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका\nइस सम्मेलन में ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे प्रमुख देश शामिल हैं। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नई दिल्ली आगमन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय बातचीत से ठीक पहले यह कूटनीतिक सहमति भारत की वैश्विक साख को दर्शाती है। विभाजित दुनिया और परस्पर विरोधी हितों वाले देशों को एक साझा दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के लिए राजी करना भारत की प्रभावी अध्यक्षता और वैश्विक नेतृत्व क्षमता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।\n\nइसका आप पर असर\nब्रिक्स शिखर सम्मेलन में साझा घोषणापत्र पर सहमति बनने से भू-राजनीतिक स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को प्रत्यक्ष समर्थन मिला है।\n\n• भारत में प्रभाव: वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति मार्गों पर सुरक्षा के सिद्धांत तय होने से देश में तेल आयात स्थिर रहने की उम्मीद है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य से आपूर्ति सामान्य रहती है तो घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के दामों में अचानक होने वाली बढ़ोतरी पर लगाम लगेगी।\n• वैश्विक निवेशकों के लिए: मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच बहुपक्षीय कूटनीतिक संवाद बनने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में जोखिम कम होगा। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से नीचे आने से वैश्विक महंगाई दर को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।\n• व्यापार और शिपिंग क्षेत्र: अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों पर नौवहन की स्वतंत्रता की वकालत से समुद्री माल ढुलाई की लागत स्थिर रहेगी। निर्यातकों और आयातकों को बढ़ते फ्रेट चार्ज और बीमा प्रीमियम से राहत मिलने की संभावना बढ़ेगी।\n• वैश्विक कूटनीति: विभिन्न विरोधी खेमों के देशों को एक मेज पर लाने से बहुपक्षीय मंचों पर आम सहमति की विश्वसनीयता मजबूत होगी। इससे भविष्य में विकासशील देशों के आर्थिक और रणनीतिक मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने में आसानी होगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह कूटनीतिक सफलता इसलिए संभव हुई क्योंकि भारत ने सदस्य देशों के बीच सीधे टकराव वाले मुद्दों के बजाय साझा हितों और अंतरराष्ट्रीय नियमों को प्राथमिकता दी।\n\n• ईरान और यूएई का गतिरोध: पश्चिम एशिया में संघर्ष और ईरानी मिसाइल हमलों के कारण यूएई ने अगस्त में ईरान के साथ वित्तीय व व्यापारिक रिश्ते निलंबित कर दिए थे। दोनों देशों के अलग-अलग रुख के चलते मई में विदेश मंत्रियों की बैठक बिना किसी साझा बयान के समाप्त हो गई थी।\n• घोषणापत्र की भाषा पर असहमति: ईरान पश्चिमी प्रतिबंधों और सैन्य हमलों की प्रत्यक्ष निंदा चाहता था, जबकि अन्य सदस्य देश किसी का नाम लेकर बयान जारी करने के पक्ष में नहीं थे। भारत ने तटस्थ और संयुक्त राष्ट्र चार्टर आधारित भाषा पेश करके इस गतिरोध को खत्म किया।\n• गहन मध्यस्थता वार्ता: भारतीय शेरपाओं ने रूस, ब्राजील और मिस्र के साथ मिलकर तड़के 4 बजे तक मैराथन द्विपक्षीय बैठकें आयोजित कीं। इस निरंतर संवाद ने सदस्य देशों के बीच भरोसे की खाई को पाटने का काम किया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. नई दिल्ली ब्रिक्स 2026 शिखर सम्मेलन में क्या बड़ी सफलता मिली?\nसभी ब्रिक्स सदस्य देश एकतरफा सैन्य कार्रवाइयों की निंदा करने वाले साझा घोषणापत्र पर पूरी तरह सहमत हो गए हैं।\n\n2. ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच किस बात को लेकर विवाद था?\nपश्चिम एशिया के संघर्ष और ईरानी मिसाइल हमलों के बाद यूएई ने ईरान के साथ सभी व्यापारिक और वित्तीय लेन-देन रोक दिए थे।\n\n3. सहमति बनाने के लिए भारत ने क्या कदम उठाए?\nभारतीय अधिकारियों ने रूस, ब्राजील और मिस्र के साथ मिलकर तड़के 4 बजे तक मैराथन वार्ताएं कीं और किसी देश का नाम लिए बिना संतुलित भाषा का मसौदा पेश किया।\n\n4. इस सम्मेलन में कौन-कौन से प्रमुख देश भाग ले रहे हैं?\nशिखर सम्मेलन में ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं।",
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  "publishedAt": "2026-09-12",
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