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  "type": "article",
  "title": "समय पर इंसाफ के लिए दिल्ली दौड़ना मजबूरी न बने: चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने अदालती प्रक्रिया में सुधार पर दिया जोर",
  "summary": "चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने अदालती मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए आत्ममंथन की जरूरत बताते हुए कहा कि न्याय की पहुंच इस बात पर निर्भर नहीं होनी चाहिए कि वादी राष्ट्रीय राजधानी तक पहुंच सकता है या नहीं।",
  "content": "देश की न्यायिक व्यवस्था में मामलों के निपटारे और मुकदमों की त्वरित सुनवाई को लेकर आत्ममंथन की जरूरत रेखांकित की गई है। भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने 1 नवंबर को इस बात पर विशेष ध्यान दिलाया कि उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की जल्द या तत्काल सुनवाई कराने के मकसद से लोगों का सर्वोच्च न्यायालय पहुंचने का चलन लगातार बढ़ता जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा उच्च न्यायालयों की संस्थागत स्वायत्तता का सम्मान किया है, जिसमें अपने मुकदमों का रोस्टर तय करने का उनका पूर्ण अधिकार भी शामिल है। इसके बावजूद, सुप्रीम कोर्ट के समक्ष ऐसे आग्रहों की बढ़ती संख्या इस बात पर विचार करने के लिए विवश करती है कि क्या मौजूदा कार्यप्रणालियों में तत्परता और तेजी लाने की गुंजाइश बाकी है।\n\nकेरल हाईकोर्ट के 75 वर्ष पूरे होने पर उठाए अहम सवाल\nकेरल हाईकोर्ट की स्थापना के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष समारोह को संबोधित करते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायिक सुधारों से जुड़े कई बुनियादी सवाल सामने रखे। उन्होंने पूछा कि क्या तत्काल सुनवाई की दरकार वाले मामलों की पहचान अधिक प्रभावी ढंग से की जा सकती है। इसके साथ ही उन्होंने मुकदमों को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की पूरी प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी और पूर्वानुमान योग्य बनाने की आवश्यकता जताई। उनका कहना था कि आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल उन गंभीर मामलों को प्राथमिकता के आधार पर छांटने में किया जाना चाहिए, जिनमें सुनवाई में तनिक भी देरी होने से पक्षकारों को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है। इसके अलावा उन्होंने यह भी सुनिश्चित करने का आह्वान किया कि किसी भी नागरिक के लिए समय पर न्याय पाना इस मजबूरी पर निर्भर न हो कि वह लंबी यात्रा करके राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली तक आ सकता है या नहीं।\n\nसंवैधानिक न्याय का आधार हैं 25 उच्च न्यायालय\nप्रधान न्यायाधीश ने संवैधानिक न्याय के व्यापक ढांचे को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत में न्याय का दायरा केवल नई दिल्ली तक सीमित नहीं है और न ही यह वहीं शुरू होकर समाप्त होता है। देश में संवैधानिक न्याय की वास्तविक ताकत राज्यों में फैले 25 उच्च न्यायालयों के सुदृढ़ नेटवर्क में बसी हुई है। इनमें से प्रत्येक उच्च न्यायालय को देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने और कानून का शासन बनाए रखने का महत्वपूर्ण संवैधानिक दायित्व सौंपा गया है।\n\nजमीनी हकीकत और आम नागरिकों से सीधा जुड़ाव\nजस्टिस सूर्यकांत ने जोर देकर कहा कि उच्च न्यायालय आम जनमानस के रोजमर्रा के जीवन और वास्तविकताओं से बेहद गहराई से जुड़े हुए हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि वे स्थानीय लोगों की शिकायतों की भाषा को भली-भांति समझते हैं, क्षेत्रीय समुदायों की विशिष्ट परिस्थितियों से परिचित होते हैं और सरकारी तंत्र की किसी भी कार्रवाई के जमीनी स्तर पर पड़ने वाले व्यावहारिक प्रभावों का सटीक आकलन कर सकते हैं। इसलिए वादियों को हर छोटे-बड़े मामले में राहत के लिए दिल्ली भागने की जरूरत न पड़े, इसके लिए स्थानीय स्तर पर ही मुकदमों की समयबद्ध सुनवाई की व्यवस्था को मजबूत करना बेहद जरूरी है।\n\nइसका आप पर असर\nयह बयान आम नागरिकों और अदालत में मुकदमा लड़ रहे वादियों के लिए समय और खर्च बचाने वाली न्यायिक प्रक्रिया की दिशा में बड़ा संकेत देता है।\n\n• भारत में: देश भर के वादियों को अपने मुकदमों की जल्दी सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के चक्कर लगाने और महंगे वकीलों पर अतिरिक्त खर्च करने से राहत मिल सकती है। अदालतों में सूचीबद्ध होने की प्रक्रिया पारदर्शी बनने से आम लोगों को सुनवाई की संभावित तारीख का पहले से स्पष्ट अंदाजा रहेगा।\n• केरल में: राज्य में 75 वर्ष पूरे कर चुके हाईकोर्ट में मामलों की त्वरित पहचान और तकनीकी सुधारों को गति मिलने की उम्मीद है। स्थानीय मुकदमों के निस्तारण में तेजी आने से क्षेत्रीय नागरिकों को राज्य स्तर पर ही त्वरित इंसाफ मिल सकेगा।\n• तकनीक का लाभ: तकनीक की मदद से उन गंभीर मामलों को अलग किया जा सकेगा जहां देरी से वादी को भारी नुकसान हो सकता है। इससे वर्षों से तारीख के इंतजार में बैठे पीड़ित पक्षों को प्राथमिकता के आधार पर राहत मिल सकेगी।\n• अदालती खर्च में बचत: वादियों को मात्र तारीख लगवाने या जल्दी सुनवाई की गुहार के लिए दिल्ली की यात्रा करने की बाध्यता खत्म होने की संभावना बनेगी। इससे लंबी कानूनी लड़ाई लड़ रहे परिवारों के आर्थिक बोझ में सीधी कमी आएगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nसर्वोच्च न्यायालय के समक्ष ऐसी याचिकाओं की बाढ़ आ गई थी जिनमें केवल राज्यों के उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की जल्द सुनवाई का निर्देश देने की मांग की जा रही थी।\n\n• सुप्रीम कोर्ट में बढ़ते आवेदन: उच्च न्यायालयों में मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने के कारण वादी विवश होकर तत्काल सुनवाई का आदेश लेने शीर्ष अदालत पहुंच रहे थे। इस बढ़ती प्रवृत्ति ने न्यायिक नेतृत्व को मौजूदा कार्यप्रणाली की कमियों पर आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित किया।\n• सूचीबद्ध करने की अस्पष्टता: कई मामलों में सुनवाई की तारीखें तय होने की प्रक्रिया पारदर्शी और पूर्वानुमान योग्य न होने से वादियों में अनिश्चितता बनी रहती थी। इसके कारण वादी स्थानीय अदालतों से निराश होकर राष्ट्रीय राजधानी की ओर रुख कर रहे थे।\n• संस्थागत स्वायत्तता का संतुलन: सुप्रीम कोर्ट उच्च न्यायालयों के रोस्टर तय करने के अधिकार में दखल दिए बिना व्यवस्था को सुगम बनाना चाहता है। इसलिए तंत्र में तकनीकी नवाचार लाकर स्थानीय स्तर पर ही त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने पर बल दिया गया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने न्यायिक व्यवस्था में किस बात पर आत्ममंथन का आह्वान किया?\nउन्होंने अदालती प्रक्रियाओं में तत्परता बढ़ाने और मामलों को सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने पर विचार करने को कहा।\n\n2. वादी किस मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख कर रहे हैं?\nवादी विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित अपने मामलों की तत्काल या जल्द सुनवाई की गुहार लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच रहे हैं।\n\n3. चीफ जस्टिस ने यह संबोधन किस अवसर पर दिया?\nउन्होंने 1 नवंबर को केरल हाईकोर्ट की स्थापना के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में यह वक्तव्य दिया।\n\n4. मुकदमों की सुनवाई में तकनीक के इस्तेमाल पर क्या कहा गया?\nउन्होंने सवाल उठाया कि क्या तकनीक उन मामलों को प्राथमिकता देने में मदद कर सकती है जिनमें देरी से अपूरणीय नुकसान हो सकता है।\n\n5. संवैधानिक न्याय को लेकर चीफ जस्टिस ने क्या राय रखी?\nउन्होंने कहा कि संवैधानिक न्याय केवल नई दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के 25 उच्च न्यायालय इसके मुख्य आधार हैं।\n\n6. हाईकोर्ट आम लोगों से किस प्रकार सीधे जुड़े होते हैं?\nहाईकोर्ट स्थानीय भाषा, क्षेत्रीय परिस्थितियों और सरकारी फैसलों के व्यावहारिक जमीनी परिणामों को गहराई से समझते हैं।",
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