शादी से ज्यादा जरूरी बेटी की गरिमा और सुरक्षा, ससुराल में हिंसा पर माता-पिता समझौता कराने के बजाय समय रहते साथ दें: दिल्ली हाई कोर्ट दिल्ली हाई कोर्ट ने 2018 के अनीसिया बत्रा सुसाइड मामले में पति मयंक सिंघवी और उसके माता-पिता को बरी करते हुए कहा कि बेटी का मायके लौटना शर्मिंदगी की बात नहीं है और परिवार को उसकी सुरक्षा को शादी बचाने से ऊपर रखना चाहिए। वैवाहिक रिश्तों में गंभीर संकट और घरेलू हिंसा का सामना कर रही महिलाओं के समर्थन में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बेहद मानवीय और दूरगामी टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि जब कोई विवाहित बेटी अपने ससुराल में लगातार प्रताड़ना या मारपीट की शिकायत करे, तो मायके वालों को उसे चुपचाप सहने या समझौते का दबाव बनाने के बजाय तुरंत उसका ढाल बनना चाहिए। बेटी अगर वैवाहिक प्रताड़ना से तंग आकर माता-पिता के घर वापस लौटती है, तो इसे परिवार के लिए किसी भी सूरत में सामाजिक शर्म या हीनता का विषय नहीं समझा जाना चाहिए। जस्टिस मधु जैन की पीठ ने वैवाहिक विवादों के संवेदनशील पहलुओं पर विचार करते हुए कहा कि एक बेटी की गरिमा और उसकी शारीरिक सुरक्षा हमेशा किसी भी विवाह को जबरन बनाए रखने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है। अदालत ने परिवारों को आगाह किया कि उन्हें अपनी बेटी की मदद के लिए किसी ऐसी दर्दनाक अनहोनी का इंतजार नहीं करना चाहिए, जिसकी भरपाई बाद में कभी न की जा सके। इसके साथ ही अदालत ने यह संतुलन भी साधा कि पति के परिवारजनों पर बिना पुख्ता साक्ष्यों के केवल रिश्तेदारी के आधार पर सामान्य आरोप लगाकर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए। अनीसिया बत्रा सुसाइड मामले में आठ साल बाद आया फैसला यह महत्वपूर्ण फैसला जर्मनी की एक अंतरराष्ट्रीय विमानन कंपनी में कार्यरत 39 वर्षीय एयर होस्टेस अनीसिया बत्रा की मौत से जुड़े आठ साल पुराने मामले की सुनवाई के दौरान आया। अनीसिया ने 13 जुलाई 2018 को दक्षिण दिल्ली के पंचशील पार्क इलाके में कथित तौर पर खुदकुशी कर ली थी। घटना के बाद मयंक सिंघवी अपनी पत्नी अनीसिया को तत्काल पास के एक अस्पताल ले गया था, जहां डॉक्टरों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया था। मृतका के परिजनों ने पति मयंक सिंघवी और उसके ससुराल पक्ष पर गंभीर प्रताड़ना, मारपीट और दहेज के लिए परेशान करने का आरोप लगाया था। मामले की कानूनी प्रक्रिया के तहत दिसंबर 2019 में सेशन कोर्ट ने मयंक के माता-पिता को दहेज हत्या और क्रूरता के आरोपों से मुक्त करने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ दायर तीन अलग-अलग पुनरीक्षण याचिकाओं पर विस्तार से विचार करने के बाद जस्टिस मधु जैन ने पति मयंक सिंघवी को भी क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया, साथ ही उसके माता-पिता को राहत देने वाले पूर्व आदेश को बरकरार रखा। मायके वालों को सामाजिक डर छोड़कर बेटी का सहारा बनना चाहिए अदालत ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था में अक्सर बेटियों पर बनाए जाने वाले वैवाहिक समझौते के दबाव का गहराई से विश्लेषण किया। अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि सामाजिक अस्वीकृति या लोकलाज के डर से माता-पिता को अपनी ही बेटी को एक सुरक्षित छत देने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। अगर कोई महिला अपने वैवाहिक जीवन में बार-बार हिंसा का सामना कर रही है, तो उसकी पीड़ा को नजरअंदाज करना या उसे केवल स्थिति से तालमेल बिठाने की सलाह देना स्थिति को और गंभीर बना देता है। अदालत ने टिप्पणी की, "शादी बचाने को उसकी सुरक्षा एवं गरिमा से अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता और उसका साथ देने के लिए किसी ऐसी त्रासदी का इंतजार नहीं करना चाहिए, जिसकी भरपाई न हो सके।" फैसले में यह भी कहा गया कि माता-पिता को यह समझना होगा कि उनके घर के दरवाजे बेटी के लिए हमेशा खुले रहने चाहिए। जब परिवार वक्त रहते हस्तक्षेप नहीं करता और बेटी को उसी हिंसक माहौल में धकेलता रहता है, तो इसके गंभीर और जानलेवा परिणाम सामने आते हैं। अदालत के अनुसार, परिवार का संबल ही किसी प्रताड़ित महिला को जीवन का सबसे बड़ा सहारा दे सकता है। पति के रिश्तेदारों को बिना ठोस साक्ष्य के फंसाने पर चिंता अदालत ने जहां एक तरफ पीड़ित महिलाओं को कानूनन पूरा संरक्षण देने की आवश्यकता दोहराई, वहीं दूसरी ओर वैवाहिक विवादों में पति के समूचे परिवार को लपेटने की बढ़ती कानूनी प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई। जस्टिस मधु जैन ने कहा कि जब भी कोई वैवाहिक मनमुटाव बढ़ता है, तो दूर-दराज के रिश्तेदारों और ससुराल वालों पर सामान्य एवं अस्पष्ट आरोप मढ़ दिए जाते हैं। फैसले में बताया गया कि एक आपराधिक मुकदमे की मार केवल अदालत की चारदीवारी और तारीखों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इससे निर्दोष व्यक्तियों का सामाजिक सम्मान, नौकरी, आजीविका और पारिवारिक ताना-बाना पूरी तरह बिखर जाता है। इसलिए कानून की यह दोहरी जिम्मेदारी है कि वह जहां वास्तविक पीड़िता को न्याय दिलाए, वहीं केवल रिश्तेदार होने की वजह से किसी भी व्यक्ति को अनावश्यक कानूनी और आपराधिक प्रताड़ना से पूरी तरह सुरक्षित रखे। आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध की कानूनी सीमाएं अदालत ने भारतीय दंड संहिता के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने के कानूनी पहलुओं को भी स्पष्ट किया। कोर्ट ने निर्धारित किया कि दो लोगों के बीच आपसी वैवाहिक कलह, घरेलू तनाव, मानसिक अशांति या लगातार बिगड़ते रिश्ते अपने आप में तब तक आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं माने जा सकते, जब तक कि आरोपी की तरफ से कोई सक्रिय, स्पष्ट और जानबूझकर की गई प्रत्यक्ष भूमिका साबित न हो। अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि कोई व्यक्ति जान देने से पहले कोई संदेश या पत्र छोड़कर अपने इस कदम के लिए किसी अन्य पक्ष को जिम्मेदार ठहराता है, तो भी महज उस संदेश के आधार पर कानूनन आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध सिद्ध नहीं हो जाता। किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए घटना के पीछे की स्पष्ट मंशा और प्रत्यक्ष उकसावे के ठोस कानूनी सबूतों का होना अनिवार्य है। इन सभी कानूनी मापदंडों का परीक्षण करने के बाद अदालत ने तीनों याचिकाओं का निपटारा करते हुए आरोपियों को राहत प्रदान की। इसका आप पर असर यह फैसला वैवाहिक हिंसा झेल रही महिलाओं और उनके परिवारों के लिए सामाजिक व कानूनी दृष्टिकोण से एक बड़ा सहारा बनकर सामने आया है। • भारत में परिवारों के लिए: समाज में बेटी के तलाक या मायके लौटने से जुड़ी हीनभावना को खत्म करने में मदद मिलेगी। माता-पिता अब सामाजिक लोकलाज के डर के बिना अपनी बेटियों को सुरक्षित पनाह देने और समय रहते कानूनी कदम उठाने के लिए प्रेरित होंगे। • वैवाहिक विवादों के मामलों में: ससुराल पक्ष के निर्दोष रिश्तेदारों को बेवजह मुकदमों में घसीटे जाने से सुरक्षा मिलेगी। पुलिस और अदालतों में बिना ठोस सबूत केवल पारिवारिक रिश्ते के आधार पर दर्ज होने वाली सामान्य शिकायतों पर सख्ती से जांच होगी। • आत्महत्या उकसावे के मुकदमों पर: वैवाहिक तनाव और आत्महत्या के लिए उकसाने के बीच कानूनी अंतर पूरी तरह स्पष्ट हो गया है। सुसाइड नोट में नाम होने भर से गिरफ्तारी या दोषसिद्धि नहीं होगी, बल्कि सक्रिय भूमिका और पुख्ता सबूत साबित करने होंगे। • घरेलू हिंसा की पीड़िताओं के लिए: महिलाओं को यह स्पष्ट संदेश मिला है कि उनकी गरिमा और सुरक्षा रिश्ते को बनाए रखने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। ससुराल में प्रताड़ना होने पर चुपचाप समझौता करने के बजाय तुरंत अपने अधिकारों और मायके के समर्थन का उपयोग करना चाहिए। ऐसा क्यों हुआ यह फैसला 2018 के चर्चित अनीसिया बत्रा सुसाइड केस में अधीनस्थ अदालत के आदेश और विभिन्न पुनरीक्षण याचिकाओं पर विस्तृत कानूनी समीक्षा के बाद आया है। • मामले की सीधी पृष्ठभूमि: 39 वर्षीय एयर होस्टेस अनीसिया बत्रा ने 13 जुलाई 2018 को दक्षिण दिल्ली के पंचशील पार्क में कथित तौर पर खुदकुशी कर ली थी। इसके बाद परिजनों ने पति मयंक सिंघवी और उसके माता-पिता पर घरेलू हिंसा, मारपीट और प्रताड़ना के आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया था। • पुनरीक्षण याचिकाओं की सुनवाई: दिसंबर 2019 में सेशन कोर्ट ने मयंक के माता-पिता को दहेज हत्या और क्रूरता के आरोपों से मुक्त कर दिया था। इस आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं की समीक्षा के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि मामले में पति और उसके परिवार के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने के ठोस सबूत मौजूद नहीं थे। • कानूनी साक्ष्यों का अभाव: अदालत ने परीक्षण में पाया कि वैवाहिक तनाव या मतभेद अपने आप में आत्महत्या का कानूनी उकसावा नहीं माने जा सकते। ठोस आपराधिक भूमिका के अभाव में अदालत ने पति मयंक को भी बरी किया और पूर्व आदेश को बरकरार रखा। सवाल-जवाब 1. दिल्ली हाई कोर्ट ने विवाहित बेटी के मायके लौटने पर क्या कहा? अदालत ने कहा कि बेटी के मायके लौटने को माता-पिता के लिए कभी भी शर्म की बात नहीं माना जाना चाहिए। शादी बचाने से ज्यादा जरूरी बेटी की गरिमा और सुरक्षा है। 2. यह मामला किस घटना से जुड़ा हुआ था? यह फैसला 13 जुलाई 2018 को दक्षिण दिल्ली के पंचशील पार्क में एयर होस्टेस अनीसिया बत्रा की खुदकुशी के आठ साल पुराने मामले में आया है। 3. अदालत ने पति मयंक सिंघवी और उसके माता-पिता पर क्या फैसला सुनाया? हाई कोर्ट ने मयंक सिंघवी को क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों से बरी कर दिया और उसके माता-पिता को आरोपमुक्त करने वाले सेशन कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। 4. पति के रिश्तेदारों को मुकदमों में फंसाने को लेकर कोर्ट की क्या टिप्पणी रही? कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवादों में केवल रिश्तेदार होने के कारण परिजनों को आपराधिक मुकदमों में नहीं फंसाया जाना चाहिए, क्योंकि इससे उनकी आजीविका और प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुंचता है। 5. आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप पर कोर्ट ने क्या कानूनी नियम बताया? अदालत ने स्पष्ट किया कि आपसी वैवाहिक कलह या किसी सुसाइड नोट में नाम होना ही उकसाने का अपराध साबित नहीं करता, इसके लिए आरोपी की सक्रिय और जानबूझकर की गई भूमिका का होना आवश्यक है। https://trendkia.com/delhi/shadi-se-jyada-jaruri-beti-ki-garima-aura-suraksha-sasurala-men-hinsa-para-mata-pita-samajhauta-karane-ke-bajaya-samaya-rahate-sat-56684 TrendKia — Har trend, sabse pehle.