# सुरक्षा परिषद में भारत की भागीदारी बढ़ाने के पक्ष में रूस और चीन, ब्रिक्स सम्मेलन से निकला साझा रुख

> ब्रिक्स के नई दिल्ली घोषणापत्र में रूस और चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत और ब्राजील की भूमिका बढ़ाने की आकांक्षा का समर्थन दोहराया है, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक संस्थाओं को विशेषाधिकार के पिरामिड के बजाय साझेदारी का मंच बनाने पर बल दिया।

**Type:** article · **Category:** दिल्ली · **Published:** 2026-09-12 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/delhi/suraksha-parishada-men-india-ki-bhagidari-barhane-ke-paksha-men-russia-aura-china-brics-sammelana-se-nikala-sajha-rukha-31639 · **Language:** Hindi
**Tags:** ब्रिक्स शिखर सम्मेलन, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, नरेंद्र मोदी, ग्लोबल साउथ, भारत कूटनीति, नई दिल्ली घोषणापत्र, सुधाकर दलेला

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्थिति मजबूत कर रहे भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सक्रिय और स्थायी उपस्थिति की मांग को ब्रिक्स के मंच से नया बल मिला है। ब्रिक्स नेताओं के नई दिल्ली घोषणापत्र में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के दो प्रमुख वीटो धारक देशों, रूस और चीन ने सुरक्षा परिषद में भारत तथा ब्राजील की भूमिका को विस्तार देने की आकांक्षाओं के प्रति अपने समर्थन को फिर से रेखांकित किया है। यह समर्थन ऐसे समय में सामने आया है जब विश्व के बड़े मंचों पर विकासशील देशों की आवाज को नजरअंदाज किए जाने को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है।

## घोषणापत्र के कूटनीतिक शब्दों के मायने
घोषणापत्र में प्रयुक्त भाषा का कूटनीतिक विश्लेषण बताता है कि इसमें सीधे तौर पर स्थायी सीट देने की स्पष्ट घोषणा के बजाय भारत और ब्राजील की बड़ी भूमिका निभाने की चाहत का समर्थन दोहराया गया है। रूस और चीन सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में शामिल हैं जिनके पास वीटो की ताकत है, इसलिए दोनों का एक साझा घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करना बेहद अहम माना जा रहा है। साझा दस्तावेज में यह भी याद दिलाया गया कि ऐसा समर्थन वर्ष 2022 के बीजिंग घोषणापत्र और वर्ष 2023 के जोहान्सबर्ग दो लीडर्स डिक्लेरेशन में भी दर्ज किया जा चुका है।

ब्रिक्स शेरपा सुधाकर दलेला ने इस चर्चा को लेकर स्पष्ट किया कि पूरे सत्र के दौरान संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधारों को लेकर सदस्य देशों के बीच एक मजबूत सहमति देखी गई। उन्होंने रेखांकित किया कि सभी सदस्य देशों ने अपनी बात खुलकर रखी और इस बात पर पूरा जोर दिया गया कि वैश्विक मंचों पर ग्लोबल साउथ की सामूहिक आवाज को पहले से कहीं अधिक बुलंद किया जाना जरूरी है।

## विशेषाधिकार के पिरामिड को खत्म करने का आह्वान
शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हुए दुनिया के निर्णय लेने के तौर-तरीकों में बुनियादी बदलाव की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को वैश्विक स्तर पर तय होने वाले फैसलों में ज्यादा प्रभाव और बड़ी हिस्सेदारी दी जानी चाहिए। वैश्विक व्यवस्था की वर्तमान बनावट की तुलना उन्होंने एक पिरामिड से की, जिसमें शक्तिशाली देश शीर्ष पर बैठे हैं और उनके द्वारा लिए गए फैसलों का बोझ नीचे खड़े देशों को उठाना पड़ता है, जबकि उनके पास अपनी बात मनवाने का कोई अधिकार नहीं होता।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस व्यवस्था को बदलने की वकालत करते हुए कहा कि हमें विशेषाधिकार के इस पिरामिड को साझेदारी के एक खुले मंच में बदलना होगा। उनका कहना था कि दुनिया के विकासशील और पिछड़े देशों को केवल दूसरों के बनाए नियमों पर चलने वाला बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि अब उन्हें नियम तय करने वाली मेज पर मुख्य भागीदार की तरह बैठना होगा।

## आठ दशक पुरानी व्यवस्था पर खड़े होते सवाल
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का मौजूदा ढांचा द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1945 में तैयार किया गया था। इस व्यवस्था के तहत चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका को स्थायी सदस्यता के साथ वीटो शक्ति प्रदान की गई थी। उस दौर के बाद से अब तक करीब आठ दशक बीत चुके हैं, लेकिन स्थायी सदस्यों की इस सूची में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। दूसरी ओर, इस समयावधि में दुनिया की अर्थव्यवस्था, जनसांख्यिकी और सामरिक शक्ति के संतुलन में भारी बदलाव आ चुका है।

भारत लगातार यह तर्क देता रहा है कि विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल होने और वैश्विक अर्थव्यवस्था में लगातार बढ़ती ताकत के बावजूद उसे परिषद से बाहर रखना आज की जमीनी सच्चाइयों के विपरीत है। सुरक्षा परिषद की वर्तमान व्यवस्था समकालीन दुनिया का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती, जिससे इसकी प्रभावशीलता पर भी सवाल उठते हैं।

## ग्लोबल साउथ और विकासशील देशों की व्यापक भागीदारी
नई दिल्ली घोषणापत्र में ब्रिक्स नेताओं ने केवल सुरक्षा परिषद तक ही सुधारों को सीमित नहीं रखा, बल्कि संपूर्ण संयुक्त राष्ट्र प्रणाली को ज्यादा लोकतांत्रिक, पारदर्शी, प्रभावी और जिम्मेदार बनाने की बात कही। दस्तावेज में मांग की गई कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं, विकासशील देशों और अल्पविकसित राष्ट्रों को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के भीतर सार्थक स्थान दिया जाए।

विशेष रूप से अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र के देशों को अंतरराष्ट्रीय नीतियों और आर्थिक फैसलों में निर्णय लेने की शक्ति मिलनी चाहिए। घोषणापत्र के अनुसार, जब तक विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व परिषद में नहीं बढ़ेगा, तब तक यह संस्था वर्तमान समय के गंभीर वैश्विक संकटों और चुनौतियों से निपटने में पूरी तरह सक्षम नहीं हो सकेगी।

## इसका आप पर असर
वैश्विक मंचों पर भारत का पक्ष मजबूत होने से देश के आर्थिक, रणनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव पर सीधा असर पड़ता है।

- **भारत में:** अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में भारत का प्रभाव बढ़ने से देश के आर्थिक हितों और वैश्विक व्यापार समझौतों को बेहतर सुरक्षा मिलेगी। जब सुरक्षा परिषद में भारत का कद बढ़ेगा तो सीमा पार सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मुद्दों पर देश की बात को वैश्विक मंच पर निर्णायक समर्थन मिलेगा।
- **वैश्विक स्तर पर:** विकासशील देशों के लिए नियम तय करने वाली संस्थाओं में हिस्सेदारी मिलने से बहुपक्षीय मंचों पर नीतियों का संतुलन सुधरेगा। इससे अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त, व्यापार संधियों और राहत पैकेजों में छोटे व विकासशील देशों के हितों की अनदेखी करना मुश्किल होगा।
- **कूटनीतिक साख में:** रूस और चीन जैसे वीटो संपन्न देशों के साझा समर्थन से अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में भारत की सौदेबाजी क्षमता मजबूत होगी। इससे भविष्य में अन्य वैश्विक गठबंधनों में भारत की प्राथमिकताओं को ज्यादा प्राथमिकता से सुना जाएगा।
- **प्रवासी भारतीयों पर:** वैश्विक स्तर पर भारत की स्वीकार्यता बढ़ने से विदेशों में रहने वाले भारतीय कामगारों और पेशेवरों की स्थिति और सुरक्षा को बल मिलेगा। अंतरराष्ट्रीय नीतियों में भारत के प्रभाव से वीजा, कार्य अनुमति और द्विपक्षीय समझौतों में भारतीयों के अधिकार अधिक सुरक्षित होंगे।

## ऐसा क्यों हुआ
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों की यह ताजा मांग वर्तमान भू-राजनीतिक वास्तविकताओं और ऐतिहासिक असंतुलन के टकराव से उपजी है।

- **आठ दशक पुराना ढांचा:** मौजूदा सुरक्षा परिषद 1945 के शक्ति संतुलन पर आधारित है, जब द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ था। उस समय दुनिया के अधिकांश विकासशील देश स्वतंत्र भी नहीं थे, इसलिए मौजूदा परिषद 21वीं सदी की बहुध्रुवीय व्यवस्था को प्रतिबिंबित करने में विफल रही है।
- **ग्लोबल साउथ की उपेक्षा:** अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और सुरक्षा संस्थाओं में फैसले कुछ गिने-चुने पश्चिमी और अमीर देशों के हाथ में केंद्रित रहे हैं। विकासशील देशों पर इन फैसलों का गहरा असर होता है, लेकिन उनके पास नीति निर्माण में कोई ठोस अधिकार नहीं रहा, जिसके खिलाफ अब लामबंदी बढ़ रही है।
- **भारत का उभरता आर्थिक कद:** भारत आज विश्व की सर्वाधिक आबादी वाला देश है और शीर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है। इस आर्थिक और रणनीतिक शक्ति के कारण पुरानी परिषद संरचना को यथावत बनाए रखना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुचित माना जाने लगा है।
- **ब्रिक्स मंच का रणनीतिक दबाव:** ब्रिक्स समूह विकासशील देशों के हितों को आगे बढ़ाने का एक प्रमुख मंच बन चुका है। बीजिंग 2022 और जोहान्सबर्ग 2023 के बाद नई दिल्ली घोषणापत्र ने संयुक्त राष्ट्र सुधारों पर साझा दबाव बनाने के इस सिलसिले को और तेज कर दिया है।

## सवाल-जवाब

### 1. ब्रिक्स के नई दिल्ली घोषणापत्र में भारत की दावेदारी को लेकर क्या कहा गया है?
घोषणापत्र में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत और ब्राजील द्वारा बड़ी भूमिका निभाने की आकांक्षाओं का समर्थन दोहराया गया है।

### 2. इस घोषणापत्र का समर्थन करने वाले वीटो संपन्न देश कौन हैं?
सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य रूस और चीन दोनों ने इस घोषणापत्र में अपना समर्थन दोहराया है।

### 3. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक व्यवस्था की तुलना किससे की?
उन्होंने मौजूदा निर्णय व्यवस्था की तुलना एक विशेषाधिकार वाले पिरामिड से की और उसे साझेदारी के मंच में बदलने का आह्वान किया।

### 4. सुरक्षा परिषद की मौजूदा स्थायी सदस्यता व्यवस्था कब बनी थी?
यह व्यवस्था वर्ष 1945 में बनाई गई थी, जिसमें चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका को स्थायी सदस्य बनाया गया था।

### 5. ब्रिक्स शेरपा सुधाकर दलेला ने सम्मेलन के बारे में क्या बताया?
उन्होंने बताया कि शिखर सम्मेलन की चर्चाओं में संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद सुधार को लेकर सभी सदस्यों के बीच व्यापक सहमति दिखाई दी।

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